सेना में भर्ती से ख़त्म होंगी कश्मीरी युवाओं की मुश्किल?

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जम्मू-कश्मीर में बीते तीन माह से जारी कर्फ़्यू के हालात का असर सीधे तौर पर लोगों पर पड़ रहा है लेकिन इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित सूबे के युवा हैं.

उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय दिख रहा है. भविष्य की चुनौतियां और परेशानियां सामने खड़ी हैं.

ये भी कहा जा रहा है कि उनकी बेचैनी का हल राजनीतिक ही हो सकता है. सरकार ने पुलिस बल और फ़ौज में युवाओं की भर्ती का फ़ैसला लिया है.

जिसे कश्मीरी युवाओं की समस्या से ध्यान हटाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले महीने घोषणा की थी, "सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स की बटालियन की यहीं नियुक्ति होनी चाहिए, ये फ़ैसला हाल ही में लिया गया है. 10 हज़ार एसपीओ (स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर) की भी भर्ती होगी."

कश्मीरी युवाओं को भर्ती करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.

शामिल होने की कोशिश करने वाले एक युवा ने कहा, "लंबे समय के बाद हमें एक बड़ा मौक़ा मिला है. तीन महीने से राज्य में कर्फ़्यू की स्थिति है. लेकिन लोग अपना काम कर रहे हैं. सब्ज़ी बेचने वाले अपना काम कर रहे हैं, गाड़ी चलाने वाले गाड़ी चला रहे हैं तो हम पढ़े लिखे लोग भी नौकरी चाहते हैं और सेना में भर्ती एक मौक़ा है."

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हालांकि बड़ा सवाल ये है कि क्या इससे कश्मीरी युवाओं की समस्या ख़त्म हो पाएगी? कश्मीर में बेरोज़गार युवाओं की संख्या पांच लाख से ज़्यादा है.

राज्य के भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक मोहम्मद यूसुफ तारागामी कहते हैं, "रोज़गार की बात अपनी जगह है. लेकिन इन लोगों की समस्याओं के हल के लिए राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करना बहुत ज़रूरी है. इसके विकल्प तलाशना मुनासिब नहीं होगा."

वरिष्ठ विश्लेषक अब्दुल मजीद जरगर कहते हैं, "अगर कश्मीरी युवा हिंदुस्तान की फ़ौज में भी शामिल होता है तो भी ये नहीं कहा जा सकता कि उनका मसला ख़त्म हो गया. यह एक सामान्य आर्थिक और रोजगार से जुड़ी गतिविधि है."

कई अन्य विश्लेषक भी कहते हैं कि ये कश्मीरी युवा रोज़गार के लिए इन भर्ती अभियानों में भले ही क़तार में खड़े हों लेकिन उनका मूल सवाल जूं का तूं है.

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