मराठा आंदोलन की लड़कियां

Image caption मराठा आंदोलन में लोग परिवार के साथ शामिल हो रहे हैं

ग्यारहवीं कक्षा की छात्रा कोल्हापुर की मानसी नितिन सरनोबत व्हाट्सऐप में इधर-उधर के मामलों पर चर्चा नहीं करती हैं. वो इसका इस्तेमाल अपनी हम उम्र लड़कियों से मराठा आंदोलन से जुड़ी जानकारियां शेयर करने के लिए करती हैं.

व्हाट्सऐप पर आंदोलन से जुड़े 200 से अधिक ग्रुप हैं. मराठा युवा आंदोलन को आगे बढ़ाने में वो इसका भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं.

महाराष्ट्र में जारी मराठा आंदोलन में लड़के और लड़कियां बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे हैं. कई शहरों में हो चुके मराठा समुदाय के मूक प्रदर्शन में लड़कियां सबसे आगे रहती हैं.

सभी ये जानना चाहते हैं कि ये लड़कियां कौन हैं जो इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं और इसका नेतृत्व भी कर रही हैं.

इस रुझान को बेहतर समझने के लिए आपको ले चलते हैं कोल्हापुर में मराठा मोर्चे की तैयारियों के बीच, जहाँ 15 अक्तूबर को कोल्हापुर के एक बड़े हॉल में लड़के-लड़कियां जमा थे.

वहाँ कई लड़कियां भी थीं और उनमें से एक थीं मानसी. माहौल में उत्साह था, जोश था. वहीं हमारी मुलाकात मानसी से हुई.

मानसी उन पांच लड़कियों में शामिल थीं जिन्हें मोर्चे की तरफ से प्रशासन को अपनी मांगों की लिस्ट देनी थी. उन्होंने मुझे बताया, "मुझे इस काम के लिए चुना गया, इस पर मुझे गर्व है."

अगस्त से जारी मराठा आंदोलन के सभी मोर्चों का नेतृत्व लड़कियों की दो टीमें करती हैं.

एक टीम का काम मोर्चे में मांगों को पढ़ कर सुनाना होता है. दूसरी टीम मांगों की लिस्ट प्रशासन को सौंपती है.

Image caption मराठा आंदोलन में महिलायें भारी संख्या में शामिल

मानसी के तत्काल आंदोलन में शामिल होने का कारण था 13 जुलाई को कोपरडी गाँव में एक 14 वर्षीय मराठा लड़की का बलात्कार और उसकी हत्या.

इसके बाद से ही मराठा समाज सड़कों पर आ गया. हालांकि उस मामले में न्याय मिलने के साथ-साथ मराठा आंदोलन आरक्षण की मांग भी कर रहा है

मानसी ने बताया, "जब मैंने कोपरडी कांड के बारे में पढ़ा तो अंदर से इतना बुरा महसूस हुआ कि मैं आंदोलन में शामिल हो गई."

इस कांड के विरोध में अपनी नाराज़गी जताने के लिए मोर्चों में वो काली टीशर्ट पहन कर आती हैं.

लेकिन 17 साल की मानसी के आंदोलन में शामिल होने की एक और बड़ी वजह है.

मानसी कहती हैं, "हम मेहनत करके परीक्षा में अच्छे नंबर लाते हैं लेकिन इसके बावजूद मराठा समाज के छात्रों को अच्छे कॉलेज में दाख़िला नहीं मिलता. पढ़ाई पूरी होने के बाद हमें नौकरी नहीं मिलती".

इसीलिए मराठों की शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण की मांग को मानसी अपनी आवाज़ दे रही हैं.

वो कहती हैं, "पुराने समय में मराठा समाज में ऊपर थे. अब हम नीचे के स्तर पर हैं. जितनी हमारी संख्या ज़्यादा है उतनी ही हमारे समाज में ग़रीबी ज़्यादा है."

Image caption मानसी सरनोबत की माँ कहती हैं आंदोलन से उनकी बेटी का आत्मविश्वास बढ़ा है

हॉल ही में मौजूद मानसी की उम्र की शिवानी भी थीं, जो अपने अंदर का जोश दबा नहीं पा रही थीं.

वो मोर्चे में भाषण देने वाली टीम में शामिल हैं.

इस आंदोलन में भारी संख्या में युवा वर्ग के जुड़ने पर वो कहती हैं, "मराठा समाज के युवा दूसरे वर्ग को मिले आरक्षण से मायूस हैं. हम चाहते हैं कि मराठा समाज को दूसरे वर्गों की तरह आरक्षण मिले."

मानसी कहती हैं कि युवाओं में नाराज़गी इसलिए है क्योंकि औरों को मिल रहे आरक्षण के कारण हमारे समाज में गुणी लोगों को भी अवसर नहीं मिलता.

Image caption मराठा आंदोलन में मर्द महिलाओं से पीछे

मानसी इस बात पर अफ़सोस जताती हैं कि मराठा समाज आज "शासक से याचक" बन गया है.

इसीलिए स्थानीय स्कूल की अध्यापिका आरती बाबूराव देवड़े भी चाहती हैं कि मराठों को आरक्षण मिले.

वो कहती हैं, "मैं एक मराठा हूँ, इसलिए इस संघर्ष में शामिल हो गई हूँ. हमें 95 प्रतिशत मार्क्स मिलने के बावजूद भी एड्मिशन नहीं मिलता. लेकिन आरक्षण वाले हमारे साथियों को 45 प्रतिशत नंबर पर भी दाख़िला मिल जाता है."

आरती खुद को आरक्षण प्रणाली का पीड़ित मानती हैं. वो कहती हैं, "मेरी मिसाल लीजिए, मुझे 12वीं कक्षा के बाद एड्मिशन नहीं मिला, इसलिए मैंने अपना फील्ड बदला. ये क्यों हुआ? ये आरक्षण के कारण हुआ. मराठा समाज को आरक्षण नहीं है इस वजह से ये हुआ."

दलितों को मिले आरक्षण के बारे में आरती कहती हैं, "हमें दूसरों का हक़ नहीं छीनना है. हम अपना हक़ मांग रहे हैं."

Image caption मराठा आंदोलन में मैराथन के लिए आरक्षण की मांग

लड़कियों के साथ महिलाएं भी मराठा मोर्चों में आगे हैं.

सच तो ये है कि इसमें लोग पूरे परिवार के साथ शामिल हो रहे हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता विलास सोनावणे कहते हैं, "ये एक बड़ी बात है. अब तक मराठा समाज की औरतें घरों पर रहना पसंद करती थीं. आंदोलन में भाग लेने की वो कल्पना भी नहीं कर सकती थीं. "

उससे भी अहम ये है कि युवतियों को 'मोर्चों का नेतृत्व' सौंप दिया गया है? क्या कारण है?

मराठा समाज के बुज़ुर्ग कहते हैं कि इसके दो कारण हैं. एक कारण ये है कि कोपरडी की पीड़ित एक 14 साल की लड़की थी जिसके बलात्कार और हत्या से मराठा युवाओं को काफी झटका लगा.

दूसरी वजह ये है कि मराठा समाज में बढ़ती बेरोज़गारी और ग़रीबी का असर आम परिवारों पर हुआ है, वो अपनी मजबूरी और बेहाली मोर्चे निकाल कर बता रहे हैं

Image caption मराठा युवा आरक्षण की मांग कर रहे हैं

युवा अपनी पढ़ाई और स्कूल को छोड़ कर मोर्चों में शामिल होते हैं.

आंदोलन में शामिल होने का फायदा ये हुआ है कि इससे उन्हें अपने अधिकारों के बारे में पता चला है.

मानसी की माँ कहती हैं कि आंदोलन में भाग लेने से उनकी बेटी का आत्मविश्वास बढ़ा है. मानसी से मिलकर इसका एहसास ज़रूर होता है.

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