खेत में खेलकर तैयार हो रहे नेशनल खिलाड़ी

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Image caption गांव का एक खेत ही मैरवा प्रखंड की इन लड़कियों का अघोषित स्पोर्ट्स कॉलेज है.

बेहद ग़रीबी से मुक़ाबला करतीं और सरकारी सहायता का इंतज़ार करतीं सिवान ज़िले के मैरवा प्रखंड की लड़कियां फ़ुटबॉल की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में अपना खेल दिखा रही हैं.

पटना से लगभग 180 किलोमीटर दक्षिण में स्थित लक्ष्मीपुर गांव का एक खेत ही मैरवा प्रखंड की इन लड़कियों का अघोषित स्पोर्ट्स कॉलेज है.

इस खेत के मालिक और पेशे से सरकारी शिक्षक संजय पाठक अपने बूते फ़िलहाल 80 से अधिक महिला खिलाड़ियों को फ़ुटबॉल, हैंडबॉल और एथलेटिक्स का प्रशिक्षण दे रहे हैं. वे ही उनके कोच, गाइड और मैनेजर हैं.

संजय पाठक ने ये सिलसिला साल 2009 में दो बालिका खिलाड़ियों के साथ शुरू किया था, जो आज बड़ा रूप ले चुका है.

प्रशिक्षण के महज़ दो साल के भीतर ही पुतुल कुमारी और तारा ख़ातून प्रखंड की पहली वो दो लड़कियां बनीं, जिनका चयन बिहार अंडर-16 फ़ुटबॉल टीम में हुआ.

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Image caption अमृता

साल 2011 में उत्तराखंड के हल्द्वानी में आयोजित इस प्रतियोगिता में टीम को कोई पदक तो नहीं मिला. लेकिन, जुझारू पुतुल ने अपने खेल से पहले इंडिया कैंप, गांधीनगर में जगह बनाई और उसी साल जॉर्डन में होने वाले अंडर-16 एशिया फ़ुटबॉल कॉन्फ़ेडरेशन (एएफसी) कप के लिए भारतीय टीम की सदस्य चुनी गईं.

दुर्भाग्यवश समय पर पासपोर्ट नहीं बनने के कारण वह जॉर्डन नहीं जा सकीं.

पुतुल ने बिहार को राष्ट्रीय खेलों में एक रजत और कांस्य पदक दिलवाया है. मिठाई दुकानदार रविंद्र कुमार की बेटी पुतुल का खेल अब भी जारी है.

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Image caption संजय पाठक

ग्यारहवीं में पढ़ने वाली 18 साल की फ़ुटबॉलर तारा ख़ातून के पिता सुधन अंसारी की पंचर बनाने की दुकान है.

वह बिहार टीम के सदस्य के तौर पर अलग-अलग वर्गों में राष्ट्रीय स्तर पर नौ बार हिस्सा ले चुकी हैं और उनकी टीम ने एक रजत और दो कांस्य पदक भी जीते हैं.

साल 2014 में तारा को स्कूल गेम्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया ने स्कूली वर्ल्ड कप में भाग लेने फ्रांस भी भेजा था.

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Image caption पुतुल

टीम ने तीन देशों को हराया था, लेकिन ब्राज़ील से हार गई थी. संयोग से ब्राज़ील के स्टार फ़ुटबॉलर रोनाल्डो ही उसके पसंदीदा खिलाड़ी भी हैं. ग़रीब परिवार की अमृता कुमारी को साल 2014 लोकसभा चुनाव और 2015 बिहार विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने सिवान ज़िला की ब्रांड एम्बेसडर बनाया था.

पिता शंभू प्रसाद गुप्ता गुड़गांव में सब्जी बेचते हैं. करीब 17 साल की अमृता ने पढ़ाई करते हुए अपने खेल को भी जारी रखा है.

ग्यारहवीं की छात्रा अमृता साल 2012 में पहली बार उस बिहार टीम की सदस्य रहीं, जिसने मणिपुर में रजत पदक जीता. 2013 में अमृता भारतीय टीम की सदस्य चुनी गईं. श्रीलंका में इस टीम ने स्वर्ण पदक जीता.

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Image caption तारा ख़ातून

टीम में स्टॉपर की पोज़ीशन पर खेलने वाली अमृता को 2015 में अंडर-16 भारतीय टीम का नेतृत्व करने का मौका मिला. बांग्लादेश में कप्तान अमृता ने भारत को रजत पदक दिलवाया.

वहीं स्ट्राइकर पोजीशन से खेलने वाली निशा अंडर-14 बिहार फ़ुटबॉल टीम की दो बार सदस्य रह चुकी हैं. इस टीम ने एक बार बिहार को कांस्य पदक दिलाया है. बिजली मिस्त्री रामजीत यादव की 14 साल की बेटी निशा अप्रैल, 2016 में तज़ाकिस्तान में रजत पदक जीतने वाली भारतीय टीम की सदस्य रही थीं.

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Image caption खिलाड़ियों के लिए खेत में ही है चेंजिंग रूम.

बहरहाल, बिहार में बिना सरकारी सहायता के लक्ष्मीपुर गांव में फ़ुटबॉल, हैंडबॉल और एथलेटिक्स की एक नर्सरी संजय पाठक के निजी खेत में चल रही है.

संजय पाठक कहते हैं कि खेल और खिलाड़ियों के प्रति सरकार उदासीन है. इन्हें और निखारने के लिए पौष्टिक भोजन, जिम और ट्रैक की ज़रूरत है. अगर यह सब नहीं मिला तो ये पौधे एक दिन सूख जाएंगे.

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