अब अति पिछड़ों पर है कांग्रेस की निगाह

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लगभग तीन दशक से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सत्ता सुख से दूर रही कांग्रेस इस बार के विधानसभा चुनाव में हर हाल में सरकार बनाना या सरकार में शामिल होना चाहती है.

चाहे विकास का एजेंडा हो या फिर जातीय समीकरण साधने का, कांग्रेस हर स्तर पर ख़ुद को मज़बूत करने की कोशिशों में लगी है.

जातीय समीकरण की बात करें तो कांग्रेस ने सबसे पहले अपने पुराने और सबसे मज़बूत आधार यानी ब्राह्मणों को साधने की कोशिश की, उसके बाद किसानों को और अब बारी है अति पिछड़ों को अपनी तरफ़ करने की.

पार्टी ने पिछले दिनों बाक़ायदा घोषणा की कि वो पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित 27 फ़ीसद कोटे में अति पिछड़ी जातियों के लिए कुछ हिस्सा आरक्षित कराने के लिए संघर्ष करेगी और सरकार में आने पर वो ऐसा करेगी भी.

कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के प्रभारी ग़ुलाम नबी आज़ाद ने बताया कि राहुल गांधी को किसान यात्रा के दौरान कई जगह अति पिछड़ी जातियों के लोग मिले और उन्होंने अपनी पीड़ा उनके साथ बाँटी. यही नहीं अति पिछड़ी जातियों का एक बड़ा प्रतिनिधमंडल भी राहुल गांधी से इस बारे में मिल चुका है और इसके बाद ही पार्टी ने ये फ़ैसला किया है.

बताया जा रहा है कि ऐसा करके कांग्रेस सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी और कुछ हद तक बहुजन समाज पार्टी के कथित वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है. हालांकि पिछले कुछ समय से भारतीय जनता पार्टी भी पिछड़ों को अपनी ओर मोड़ने की कोशिशों में लगी है, लेकिन अति पिछड़ों को आरक्षण का कार्ड फेंककर शायद कांग्रेस उससे आगे निकल गई है और बीजेपी ऐसा करने की स्थिति में फ़िलहाल लगती भी नहीं है.

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि विधान सभा चुनाव में पार्टी आरक्षण के भीतर आरक्षण की इस व्यवस्था को अपने घोषणा पत्र में भी जगह देगी.

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यही नहीं, पार्टी के लिए रणनीति बना रहे प्रशांत किशोर आरक्षण की इस व्यवस्था का प्रचार प्रसार करने के लिए बाक़ायदा किसी बड़े कार्यक्रम में इसकी घोषणा करने की तैयारी में हैं. नवंबर महीने की शुरुआत में ही यह कार्यक्रम होने की बात कही जा रही है.

घोषणा पत्र में जगह देने के अलावा पार्टी इस वादे को लोगों तक पहुंचाने के लिए कुछ उसी तरह की योजना बनाएगी जैसे कि राहुल गांधी की किसान यात्रा को लोगों तक पहुंचाने के लिए राहुल संदेश यात्रा निकाली गई.

जानकारों का कहना है कि कांग्रेस पार्टी की निग़ाह क़रीब 22 फ़ीसद अति पिछड़े वर्ग के मतदाताओं पर है उसे लगता है कि यदि यह वर्ग उसकी ओर लामबंद हो गया तो आश्चर्य नहीं कि कोई बड़ा उलट-फेर हो जाए.

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश के मौजूदा सामाजिक समीकरण में भाजपा, सपा और बसपा तीनों पार्टियां अति पिछड़ों के लिए ओबीसी आरक्षण में अलग आरक्षण देने का मुद्दा उठाने से बचना चाहेंगी क्योंकि भाजपा और बसपा अभी ओबीसी को नाराज़ करने का जोखिम नहीं लेना चाहेंगी जबकि सपा के लिए ये संभव ही नहीं है."

योगेश मिश्र कहते हैं कि कांग्रेस के लिए यह क़तई घाटे का सौदा नहीं है, "ओबीसी वैसे भी कांग्रेस का कभी मतदाता नहीं रहा. लेकिन यदि ओबीसी कोटे के भीतर अति पिछड़ों को अलग से कोटा देने का वादा कांग्रेस करती है, तो यह वर्ग उसकी ओर क्यों नहीं आना चाहेगा. यदि आ गया तो कांग्रेस फ़ायदा ले जाएगी, नहीं आया तो कोई नुक़सान वैसे भी नहीं होना है."

इसी रणनीति के तहत कांग्रेस पार्टी में एक बड़े राजनीतिक कार्यक्रम के ज़रिए आरक्षण का यह पांसा फेंकने की योजना बनाई गई है. बताया जा रहा है कि इस कार्यक्रम में राहुल गांधी तो रहेंगे ही, सोनिया गांधी की मौजूदगी की भी तैयारी की जा रही है.

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पिछले दिनों लखनऊ में एक कार्यक्रम में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता मौजूद था. प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर से इस बारे में बीबीसी ने जब सवाल किया तो उनका कहना था, "आरक्षण का मक़सद पिछड़े वर्गों को समाज की मुख्य धारा में शामिल करना था लेकिन आरक्षण का लाभ पिछड़े वर्ग के सिर्फ़ कुछेक तबक़ों ने ही सबसे ज़्यादा उठाया है जबकि सर्वाधिक पिछड़े वर्ग या अत्यंत पिछड़े वर्ग पीछे रह गए."

ज़ाहिर है, राजबब्बर का सीधा निशाना समाजवादी पार्टी की ओर था क्योंकि उसके शासनकाल में ये आम धारणा होती है कि पिछड़े समुदाय का यादव वर्ग इस सरकार में और वैसे भी आरक्षण का सबसे ज़्यादा लाभ पाता है. यादव के बाद कुर्मी, लोध जैसी कुछ जातियां इससे लाभान्वित हुई हैं लेकिन बड़ी संख्या तेली, माली, कहार, कश्यप, मल्लाह, नाई जैसी उपजातियां इससे वंचित रह जाती हैं.

ग़ुलाम नबी आज़ाद नई दिल्ली में जब इस बारे में घोषणा कर रहे थे तो उन्होंने ये भी कहा कि कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र सहित क़रीब 10 राज्यों में आरक्षण के अंदर आरक्षण की व्यवस्था लागू है और इसे लागू करने में कांग्रेस की अहम भूमिका रही है.

ज़ाहिर है पार्टी घोषणा पत्र में इसे शामिल करने के बाद गांव गांव में यह संदेश भी वैसे ही देगी जैसे कि वो क़र्ज़माफ़ी के अपने पुराने निभाए वायदे का प्रचार कर रही है.

यही नहीं, अति पिछड़ों के बाद कांग्रेस के राडार पर दलित हैं और इसके लिए वो आगामी 11 नवंबर से दलित कांग्रेस यात्रा शुरू कर रही है. हालांकि राज्य भर में दलित सम्मेलन वो पिछले साल ही कर चुकी है.

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पार्टी का मानना है कि यदि कुछ वर्ग उसके साथ जुड़ गए तो वो मुसलमानों में ये संदेश देने में कामयाब रहेगी कि कांग्रेस पार्टी बीजेपी से मुक़ाबले में सक्षम है और फिर वो इधर आसानी से आ सकता है.

राहुल गांधी पिछले महीने जब उत्तर प्रदेश में किसान यात्रा के दौरान घूम रहे थे तो उन्होंने मंदिरों के साथ-साथ मज़ारों का भी रुख़ किया और कई मुस्लिम धर्मगुरुओं से भी मुलाक़ात की. ख़ासकर देवबंद में दारुल उलूम की उनकी यात्रा को इस लिहाज़ से काफ़ी अहम माना गया था.

उत्तर प्रदेश की राजनीति पर पकड़ रखने वाले पर्यवेक्षकों का कहना है कि कांग्रेस की ये रणनीति तुरंत वोटों में तो तब्दील नहीं होने वाली है लेकिन इन सबका कोई असर न हो, ऐसा कहना भी मुश्किल है.

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