न्यायपालिका का बोझ कम होना चाहिए: मोदी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि न्यायपालिका पर काम का बोझ कम होना चाहिए.

दिल्ली हाईकोर्ट के 50 साल पूरे होने पर दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए मोदी ने कहा कि अदालत का ज़्यादातर समय तो उन मामलों को निपटाने में लगता है जिसमें सरकार एक पक्ष होती है.

इस मौक़े पर उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस की तर्ज़ पर भारतीय न्यायपालिका सेवा बनाए जाने की वकालत की.

उन्होंने कहा कि मुक़दमों की संख्या को कम किया जा सकता है कि अगर सभी मामलों की ठीक तरह से विचार विमर्श के बाद ही अदालत में मुक़दमा दायर किया जाए.

उनका कहना था, ''न्यायपालिका सबसे ज़्यादा समय तो हम पर देती है. हम का मतलब मोदी नहीं बल्कि सरकार है.''

इस बारे में कोई पक्का आंकडा तो नहीं है लेकिन एक अनुमान के मुताबिक़ भारत भर में अदालतों में जितने केस हैं उनमे से कम से कम 46 फ़ीसदी मामलों में सरकार एक पार्टी है.

क़ानून मंत्रालय के ज़रिए 2010 में तैयार किए गए एक मसौदे के तहत कई राज्यों ने अदालत में जाने के फ़ैसले को लेकर अपनी नीतियों में बदलाव किया है लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक इस पर कोई पहल नहीं की है.

देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल की जन्म तिथि के मौक़े पर उनको याद करते हुए मोदी ने कहा कि ऑल इंडिया सर्विस के अधिकारी योजनाओं और नीतियों को लागू करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच में कड़ी का काम करते हैं.

उन्होंने कहा कि इसी तरह से ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस के बारे में भी बहस होनी चाहिए, हालाकि ये विवादास्पद ज़रूर है.

लेकिन कुछ राज्यों और हाईकोर्टों के विरोध के बारे में मोदी ने कहा कि प्रजातंत्र में बातचीत बहुत ज़रूरी है.

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