सिमी 'एनकाउंटर' पर उठ रहे हैं सवाल

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भोपाल के पास सोमवार तड़के जेल से कथित तौर पर फ़रार हुए स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (सिमी) के आठ सदस्यों के मारे जाने पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं.

पुलिस ने कहा है कि ये आठों लोग एक मुठभेड़ में मारे गए. लेकिन विपक्ष ने मध्य प्रदेश सरकार और पुलिस के दावों पर सवाल उठाए हैं.

मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव ने कहा है कि आठों लोगों का दीपावली की रात फ़रार होना और फिर भोपाल के पास ही आठ-नौ घंटे तक छिपे रहना शक पैदा करता है.

उनके सवाल हैं:

  • जब केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर पूरे देश में हाई अलर्ट रखे जाने की बात कही गयी थी, जिसमें दीपावली पर्व को लेकर स्पष्ट निर्देश थे तब राज्य सरकार ने उन निर्देशों की अनदेखी क्यों, किसलिए और किसके निर्देश पर की?
  • जेल मैन्युअल के अनुसार किसी भी जेल में आठ से अधिक दुर्दांत अपराधियों को नहीं रखा जाना चाहिए, तो राजधानी की जेल में एक साथ 35 आतंकवादियों को क्यों रखा गया?
  • कुछ वर्षों पूर्व सिमी आतंकवादियों के खंडवा जेल से फ़रार हो जाने की घटना से भी सरकार ने सबक क्यों नही लिया?
  • हाई अलर्ट के दौरान 35 आतंकवादियों को रखे जाने वाली जेल की सुरक्षा मात्र 2 सिपाहियों के भरोसे क्यों, कैसे और किसलिए रखी गई?
  • जेल से फ़रार होने के बाद आतंकवादियों ने 8 से 9 घंटे तक भोपाल के ही नज़दीक रहने का निश्चय क्यों किया? प्रदेश की सीमा से बाहर भागने के लिए 8 से 9 घंटे पूर्णतः पर्याप्त होते हैं.
  • फ़रार हुए लोगों को आधुनिकतम हथियार कहाँ से और किससे प्राप्त हुए? आईजी भोपाल का यह बयान कई रहस्य और आशंकाओं को जन्म दे रहा है.
  • इस घटना और गहरे षड्यंत्र के नेपथ्य में कौन कौन सी आंतरिक शक्तियां शामिल हैं?

भोपाल के केंद्रीय कारागार देश की सबसे सुरक्षित जेलों में से एक है. पुलिस के मुताबिक़ सोमवार तड़के दो से ढाई बजे के बीच आठ क़ैदी भाग गए और ये प्रतिबंधित संगठन सिमी के सदस्य थे.

आठ घंटे बाद सोमवार 11 बजे ख़बर आई कि पुलिस ने सभी को मार दिया है.

फिर टीवी चैनलों पर इस घटना का कथित मोबाइल फ़ुटेज दिखाया गया जिसमें कुछ लोग ज़मीन पर गिरे दिखाई दे रहे हैं और बंदूक लिए सुरक्षाकर्मी आसपास हैं. हालांकि इस फुटेज की सत्यता की पुष्टि नहीं की जा सकी है.

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फुटेज में एक सुरक्षाकर्मी गोली चलाता प्रतीत हो रहा है और लोग मोबाइल पर वीडियो बना रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने भी अपने ट्वीट में इस मुठभेड़ पर टिप्पणी करते हुए कहा है, ''भगवान जानता है कि मैं फर्ज़ी मुठभेड़ और परदे के पीछे के अभियानों के बारे में काफी कुछ जानता हूं. लेकिन अपने अनुभव से भी मुझे लगता है कि ये मुठभेड़ पुलिस के अनाड़ीपने से भरपूर है. इशरत मुठभेड़ से तुलना करें तो भी. ''

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया कि इस बात की जांच होनी चाहिए कि क्या ये लोग "सरकारी जेल से भागे या फिर किसी योजना के तहत भगाए गए."

हालाँकि भाजपा नेता आरके सिंह ने इसे 'विकृत सोच' बताया है.

मध्यप्रदेश के गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह भी इस बारे में कुछ भी बोलने से बचत रहे. बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से हुई बातचीत में उन्होंने सारे सवालों को ये कहकर टाल दिया कि इस बारे में मीडिया से बात करने के लिए पुलिस को ही अधिकृत किया गया.

लेकिन विनीत के बहुत आग्रह के बाद उन्होंने पहले तो ये कह दिया कि जेल विभाग उनके पास नहीं है.

जब उनसे पूछा गया कि बहुत सारे राजनेता इस मुठभेड़ पर सवाल उठा रहे है तो उन्होंने कहा कि ये देश की सुरक्षा का मामला है और इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि वे सभी उनके शब्दों में आतंकवादी थे लेकिन जब बीबीसी ने उनसे पूछा कि अभी तो उनका मामला अदालत में था और उनका जुर्म साबित नहीं हुआ था तो उनका कहना था कि वे जेल तोड़कर पहले भी भागे थे.

एमआईएम नेता असदउद्दीन ओवैसी के सवाल पर उनका कहना था, ''ओवैसी तो ये भी कह सकते हैं कि जेल के गार्ड को भी हमलोगों ने ही मार दिया है.''

कुछ और अनुत्तरित सवाल

भोपाल का सेंट्रल जेल देश के सबसे सुरक्षित जेलों में से है. इसे सबसे पहला आईएसओ 9000 का प्रमाणपत्र मिला था.

राज्य गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह ने टीवी चैनल एनडीटीवी को बताया कि क़ैदियों के हाथों में चम्मच और प्लेट्स थीं जिससे उन्होंने पुलिसकर्मियों पर हमला किया और भाग गए.

ये बात नई नहीं है कि जेल के भीतर क़ैदी चम्मच और प्लेट को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. लेकिन फिर भूपेंद्र सिंह का कहना है कि पुलिस के पास कोई विकल्प नहीं इसलिए उन्हें गोली मार दी गई.

इस दावे पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं.

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मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस कांड के बाद जेल के कई वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित किए जाने की घोषणा कर दी है. उन्होंने इसे 'आपराधिक लापरवाही' बताया और कहा कि मामले के तार बाहर से जुड़े हैं.

एनडीटीवी ने भोपाल के पुलिस अधिकारी योगेश चौधरी के हवाले से बताया कि इन आठ अभियुक्तों के खिलाफ़ आतंकी घटनाओं, देशद्रोह और चोरी के मामलों में अदालत में मुक़दमा चल रहा था और इन सभी को जेल के एक ही कमरे में बंद करके रखा गया था.

सरकार और सरकारी आधिकारियों की ओर से आए बयानों के बावजूद कुछ सवाल हैं जिनके जवाब अभी तक नहीं मिले हैं:

  • क्या 35 से 40 फ़ीट दीवार को चादर की मदद से फांदा जा सकता है औऱ क्या ये चादरें इतना वज़न उठा सकती हैं?
  • एक ही बैरक में सभी अभियुक्तों को साथ क्यों रखा गया?
  • अगर अभियुक्तों को भागना था तो रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड की ओर जाना चाहिए था न कि ऐसे इलाके में जो गांव है?
  • कथित मुठभेड़ के दौरान इन अभियुक्तों के पास कैसे हथियार थे? और वो हथियार कहाँ से आए?
  • क्या इन्हें ज़िंदा पकड़ने की कोशिश की गई थी?

एमआईएम नेता असदउद्दीन ओवैसी सवाल उठाते हैं, ये सभी आठ लोग पूरे कपड़े पहने हुए थे, उनके पांव में जूते थे, कलाई में घड़ी और बैंड थे, उन्होंने बेल्ट पहनी थी. उन्होंने बीबीसी को बताया कि उन्होंने ये बातें मृत व्यक्ति की मीडिया में दिखाई गई फ़ुटेज के आधार पर कहीं.

वो कहते हैं, "अंडरट्रायल को ये सब चीज़ें नहीं दी जातीं." उन्होंने इस मामले कि निष्पक्ष जांच की मांग की है.

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ओवैसी ने कहा कि अगर जेल के सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे थे तो ये चिंता की बात है. ऐसा कैसे हो सकता है?

उन्होंने सवाल उठाए कि कुछ अन्य चरमपंथी घटनाओं के हिंदू अभियुक्त भी इसी इलाके से हैं और उन्हें पुलिस अभी तक पकड़ नहीं पाई है.

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