विकास रथ यात्रा: अखिलेश की या पार्टी की?

Image caption अखिलेश यादव की विकास रथ यात्रा गुरुवार से शुरू हो रही है.

क़रीब दो करोड़ रुपए की लागत से बने हाई टेक लक्ज़री बस पर सवार होकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव चुनावी यात्रा पर ज़रूर निकल रहे हैं, लेकिन उनकी पार्टी ने न तो अभी तक उन्हें मुख्यमंत्री पद का अधिकृत उम्मीदवार घोषित किया है और न ही साफ़तौर पर यह कहा गया है कि यह यात्रा समाजवादी पार्टी की है.

यही नहीं, बुधवार देर रात तक इस बात की चर्चा राजनीतिक गलियारों में छाई रही कि कार्यक्रम में पार्टी के बड़े नेता ख़ासकर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव आएंगे या नहीं.

पार्टी के उपाध्यक्ष किरण्मय नंदा कहते हैं कि ये सरकार की विकास यात्रा है, पार्टी की नहीं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि पार्टी की यात्रा गत दस सितंबर को निकल चुकी है.

किरण्मय नंदा इससे पहले एक यात्रा निकाल चुके हैं और उसे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने रवाना किया था. बहरहाल अखिलेश यादव इस यात्रा के पहले चरण की शुरुआत कर रहे हैं और गुरुवार के कार्यक्रम के तहत वो सत्तर किमी दूर उन्नाव तक जाएंगे. इस दौरान उनकी कई जनसभाएं भी होंगी.

Image caption पिता मुलायम और पुत्र अखिलेश के बीच पार्टी संबंधी नीतियों को लेकर मतभेद सार्वजनिक तौर पर देखने को मिला है.

अखिलेश का ये रथ सभी सुविधाओं से सुसज्जित तो है ही, एक मिनी सचिवालय भी इसमें बनाया गया है जहां से हर समय उन्हें सूचनाएं भी मिलती रहेंगी.

लेकिन जानकारों का कहना है कि यदि पार्टी के बड़े नेता इस कार्यक्रम में शामिल नहीं होते हैं तो सीधे तौर पर ये संदेश जाएगा कि समाजवादी पार्टी अब दो फाड़ हो चुकी है, औपचारिकताएं ही अब शेष हैं.

वहीं यादव परिवार को क़रीब से जानने वाले इटावा के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश शाक्य कहते हैं कि मुलायम सिंह इस कार्यक्रम में जाते हैं तो भी उनकी फ़जीहत होगी, नहीं जाते हैं तब तो होगी ही.

दिनेश शाक्य कहते हैं, "मुलायम और शिवपाल यदि इस कार्यक्रम में जाते हैं तो उन्हें उन तमाम नेताओं के साथ खड़े होना पड़ेगा जिन्हें कुछ दिन पहले मुलायम सिंह की सहमति से शिवपाल यादव ने पार्टी से निष्कासित किया है. और यदि नहीं जाते हैं तो इसका संदेश साफ़ है."

बहरहाल, समाजवादी पार्टी के बड़े नेता शामिल होते हैं या नहीं - ये आज पता चल जाएगा, लेकिन पूरे लखनऊ में जिस तरह से कार्यकर्ताओं के पहुंचने का सिलसिला दिख रहा है और जिस तरह पूरे शहर में इस यात्रा के पोस्टर लगे हैं, उससे लगता यही है कि अखिलेश और उनके समर्थकों को बड़े नेताओं के आने या न आने की बहुत फिक्र नहीं है.

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