समाजवादी पार्टीः कितनी बंटी, कितनी एक

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Image caption सैफ़ई में दीवाली के दिन रामगोपाल यादव के साथ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव

समाजवादी पार्टी अपनी रजत जयंती समारोह की तैयारी तो कर रही है पर इस समय शायद वह अपनी सबसे कमज़ोर हालत में है.

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव परिवार में सभी ने दीवाली अलग अलग मनाई.

दीपावली से एक दिन पहले अखिलेश यादव परिवार सहित अपने पैतृक निवास सैफ़ई चले गए. मुलायम सिंह यादव अपने छोटे बेटे प्रतीक और बहू अपर्णा के साथ लखनऊ में थे.

मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई और समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने दीवाली इटावा स्थित अपने घर में मनाई. तो मुलायम सिंह के चचेरे भाई राम गोपाल यादव, जिन्हें वे पार्टी से निकाल चुके है, सैफई में ही रहे.

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Image caption लखनऊ में दीवाली पर अपने बच्चों के साथ मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव

समाजवादी पार्टी कमज़ोर नजर आ रही है. इसके जिन नेताओं को देखकर कभी राम-लक्ष्मण की याद आती थी वे अब महाभारत के कौरव-पांडव जैसे नज़र आ रहे हैं.

इन सबके पीछे वजह क्या है?

क्या मुलायम की दूसरी पत्नी साधना के कारण ऐसा हो रहा है, जिन्हें अखिलेश समर्थक कैकेयी क़रार दे रहे हैं? क्या वे प्रतीक को समाजवादी पार्टी रुपी अयोध्या की सत्ता सौंपना चाहती हैं? क्या वे राम की तरह अखिलेश को बनवास देना चाहती हैं और मुलायम दशरथ की तरह चुपचाप उनकी बातें मान रहे हैं?

हाल की घटनाएं कुछ इसी ओर इशारा कर रही हैं. साधना का साथ दे रहे हैं शिवपाल यादव और अमर सिंह.

सत्ता और पैसा इस परिवार में कलह की मुख्य वजह है. ऐसा कहा जा सकता है कि इस कलह की शुरुआत 12 सितंबर से हुई.

12 सितंबर से शुरू हुए झगड़े के पहले चरण में मुलायम सिंह ने अखिलेश की जगह शिवपाल को जैसे ही प्रदेश अध्यक्ष घोषित किया, अखिलेश ने शिवपाल को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर किया.

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इससे पहले मुलायम के प्रिय मंत्री गायत्री प्रजापति को अखिलेश पहले ही मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर चुके थे. साथ ही उन्होंने दीपक सिंघल को मुख्य सचिव के पद से हटा दिया था. वे भी मुलायम-शिवपाल के क़रीबी माने जाते थे.

बाद में मुलायम के कहने पर मुख्यमंत्री ने शिवपाल और प्रजापति को बहाल कर दिया था. लेकिन शिवपाल प्रदेश अध्यक्ष बने रहे.

इस महाभारत का दूसरा चरण शिवपाल के अखिलेश के क़रीबी नेताओं को पार्टी से निकाले जाने से शुरू हुआ.

रामगोपाल ने मुलायम को खुली चिट्ठी लिख इसे एक नया मोड़ दिया तो शिवपाल ने रामगोपाल को ही पार्टी से निकाल बाहर किया. अखिलेश ने जवाबी कार्रवाई करते हुए शिवपाल सहित चार मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया.

इसके बाद भाई-भतीजों पर घात-प्रतिघात का यह ख़तरनाक खेल बंद दरवाज़ों से निकलकर खुले मंच पर आ गया.

अभी तक सिर्फ कहा-सुनी होती थी, इस बार मंच पर दोनों पक्षों के बीच हाथापाई की नौबत आ गई. शिवपाल ने अखिलेश के हाथों से माइक छीन कर मुख्यमंत्री पर झूठ बोलने का आरोप लगाया.

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Image caption शिवपाल यादव, समाजवादी पार्टी

मुलायम ने एक बार फिर अखिलेश पर बर्खास्त मंत्रियों को बहाल करने का दबाव बनाया. लेकिन इस बार अखिलेश के तेवर बदले हुए थे.

अखिलेश ने न सिर्फ साफ इंकार कर दिया बल्कि पिता को ना का अर्थ भी समझा दिया. ना का मतलब ना. इसी के बाद सभी ने दीवाली अलग अलग मनाई.

अखिलेश दीवाली की सुबह सैफ़ई में चाचा राम गोपाल से मिले और फिर बच्चों के साथ लखनऊ लौट आए. लेकिन पिता से मिलने नहीं गए.

नाटक के दो मुख्य पात्र इस बार साफ़ बच गए. गायत्री प्रजापति और अमर सिंह. गायत्री ने अपनी वफादारी बदलते हुए अखिलेश के पैर पकड़ लिए. वहीं, अमर सिंह चूँकि उत्तर प्रदेश सरकार में किसी ओहदे पर नहीं है, इसलिए मुख्यमंत्री उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करने में असमर्थ हैं.

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उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी साफ़ तौर पर दो हिस्सों में बंट चुकी है. शिवपाल-मुलायम पार्टी चला रहे हैं तो अखिलेश सरकार.

एक दूसरे के लोगों को इस तरह निकाला जा रहा है मानों वे किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो गए हों. शुरुआत शिवपाल ने की थी - अखिलेश के छह समर्थकों को पार्टी से निकालने की. अंत हुआ एक मंत्री पवन पांडे को पार्टी से निकाले जाने से.

हालत यह है कि पांडे पार्टी से निकाले जाने के बाद भी मंत्री बने हुए हैं. पांडे पर आरोप था कि उन्होंने शिवपाल समर्थक नेती आशु मलिक की पिटाई की थी.

हालात ऐसे बदले कि गायत्री प्रजापति अखिलेश यादव को गणेश बता रहे हैं और मुलायम सिंह यादव को शंकर.

आशु मलिक ने एक खुले पत्र में अखिलेश को 'औरंगजेब' और मुलायम को 'शाहजहाँ' बताया था. तो वहीं, प्रजापति ने कहा कि नेता जी भगवान शंकर हैं और अखिलेश जी गणेश है जबकि समाजवादी पार्टी कैलाश पर्वत है.

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असल में अखिलेश का गेम प्लान साफ़ है. सपा के 229 में से 209 विधायक उनके साथ हैं. छवि अच्छी है. युवा अभी भी उनके समर्थक हैं. बस उन्हें अपने पिता से एक ही चीज़ चाहिए. वह है फ़रवरी में होने वाले चुनाव में टिकट बांटने का अधिकार. क्योंकि पांच साल बाद होने वाले चुनाव सरकार के कामकाज का इम्तिहान होते हैं.

तो सरकार के मुखिया को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि उसकी ओर से परीक्षा कौन देगा. यानी अखिलेश की प्राथमिकता पार्टी में रहकर ही इस पर आधिपत्य जमाने की है.

अगर वे इसमें नाकाम रहते हैं तो बैकअप प्लान भी तैयार है. कांग्रेस, जद (यू), रालोद आदि कई पार्टियों से अखिलेश की बात हो रही है. वे सपा को साथ छोड़कर इन सभी के साथ मिलकर गठबंधन बनाएंगे और बसपा और भाजपा के खिलाफ तीसरे मोर्चे का नेतृत्व करेंगे.

ऐसे में सपा को अस्तित्व के संकट का सामना करना पड़ सकता है. यही वजह है कि मुलायम-शिवपाल भी अब जनता दल के सभी घटकों पर डोरे डालने में जुट गए हैं.

पिछले दो महीने में जो जो घटनाएं हुई हैं उसमें अखिलेश की छवि एक ईमानदार, मेहनती और कर्मठ मुख्यमंत्री की बनी है.

एक ऐसा मुख्यमंत्री जो अपराधियों के खिलाफ़ है, जो आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे और लखनऊ मेट्रो जैसे मेगा डेवलपमेंट प्रोजेक्ट न सिर्फ प्लान करता है बल्कि रिकॉर्ड समय में पूरा भी कर दिखाता है.

लेकिन साथ ही अखिलेश की छवि एक ऐसे मुख्यमंत्री की भी बनी है जो अपने पिता और चाचाओं के सामने साढ़े चार साल तक आदतन मजबूर था. शिवपाल ने अखिलेश के हाथ से माइक छीन कर उनकी इस छवि को और मज़बूत किया है.

वहीं, मुलायम और शिवपाल की छवि राजनीति का अपराधीकरण करने वाले, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले और एक ईमानदार मुख्यमंत्री को निजी स्वार्थ के लिए परेशान करने वाले राजनीतिज्ञों की है.

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मुलायम और शिवपाल जातिवाद और अल्पसंख्यकवाद का सहारा लेते रहे हैं. लेकिन अखिलेश के ख़िलाफ़ ये हथियार कारगर नहीं होंगे.

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