क्या है ओआरओपी, जिस पर घिरी है मोदी सरकार

दिल्ली में वन रैंक, वन पेंशन की मांग कर रहे एक पूर्व सैनिक ने बुधवार को कथित तौर पर आत्महत्या कर ली.

इसके बाद राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई और विपक्षी दलों - कांग्रेस और आप ने सत्ताधारी भाजपा को निशाना बनाना शुरू कर दिया है.

लेकिन क्या है वन रैंक, वन पेंशन यानी ओआरओपी की मांग?

भारतीय सेना से रिटायर हुए फौजियों की लंबे समय से पेंशन में समानता की मांग रही है. स्वतंत्रता के बाद से फ़ौज से रिटायर होने वालों को उनकी रिटायरमेंट के समय के नियमानुसार ही पेंशन मिलती रही है.

मिसाल के तौर पर अगर वर्ष 1975 में रिटायर हुए सूबेदार को 2,000 रुपए और किसी कैप्टन रैंक के अफसर को 3,000 रुपए पेशन मिलती है तो संभवत: वर्ष 1985 में इन्ही रैंकों के दो सेवानिवृत लोगों को 5,000 और 6,000 रुपए की पेंशन मिल रही होगी.

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ओआरओपी की मांग करने वालों के हिसाब से देश के लिए एक जैसी सेवा प्रदान करने वाले दो व्यक्तियों के साथ ये भेदभाव है और रैंकों के हिसाब से पेंशन में समानता होनी चाहिए.

मांग ये है कि एक निश्चित तारीख़ तय करके उस रैंक के सभी लोगों को समान या उस हिसाब से पेंशन मिले.

तो क्या पूर्व सैनिकों के भत्ते समय-समय पर बढ़ते नहीं रहे हैं?

भत्ता या एलाउंस और पेशन में बुनियादी फ़र्क बेसिक पेंशन का है. मिसाल के तौर पर जो पहले रिटायर हुए अगर उनकी बेसिक पेंशन 20,000 थी तो उनके 10 वर्ष बाद रिटायर होने वालों की बेसिक पेंशन 40,000 हो सकती है.

ओआरओपी स्कीम लागू करने में पुरानी अड़चनें क्या रहीं ?

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वन रैंक, वन पेंशन की मांग कर रहे सेवानिवृत फौजियों का आरोप रहा है कि तमाम पिछली सरकारों की ब्यूरोक्रेसी या नौकरशाहों ने फौजियों के हित को कम तवज्जो दी है.

सरकारों के सामने मुश्किल इस बात की भी रही होगी कि अगर सेना में ओआरओपी लागू कर दी तो दर्जनों दूसरी सरकारी सेवाओं में इसकी मांग तुरंत होने लगेगी. ऐसा हुआ भी है जब दूसरी सेवाओं में ऐसी मांग उठी है.

ओआरओपी स्कीम की घोषणा कब हुई?

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करीब एक वर्ष तक वन रैंक, वन पेंशन मामले पर पूर्व सैनिकों के आंदोलन और धरना-प्रदर्शनों के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने सितंबर 6, 2015 को वन रैंक वन पेंशन का ऐलान कर दिया.

हालांकि पूर्व सैनिकों का कहना था कि उनकी सभी मांगे नहीं मानी गईं और इसलिए उन्होंने अपने प्रदर्शन जारी रखे.

भारत के कई शहरों में पूर्व सैनिकों ने अपने पदक वापसी के कार्यक्रम भी आयोजित किए.

ओआरओपी स्कीम की घोषणा में सरकार के फ़ैसले की मुख्य बातें क्या थीं?

1. ओआरओपी का फ़ायदा एक जुलाई 2014 से लागू माना जाएगा और ओआरओपी साल 2013 के आधार पर निर्धारित किया जाएगा.

2. रक्षा मंत्री के मुताबिक वन रैंक वन पेंशन यानी ओआरओपी लागू करने से 10,000 करोड़ रुपए ख़र्च होंगे. ये ख़र्च भविष्य में और भी बढ़ेगा.

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3. पेंशन हर पाँच साल में निर्धारित की जाएगी. हालांकि, पूर्व सैनिकों का कहना रहा है कि वन रैंक वन पेंशन उनका अधिकार है इसलिए इसका रिव्यू सालाना होना चाहिए.

4. जो सैनिक स्वेच्छा से रिटायरमेंट (वीआरएस) लेते हैं उन्हें ओआरओपी नहीं मिलेगा. इसमें युद्ध में घायल होने के कारण रिटायर होने वाले सैनिक शामिल नहीं होंगे.

5. बढ़ी हुई पेंशन चार अर्धवार्षिक किस्तों में अदा की जाएगी. सैनिकों की विधवाओं को बढ़ी हुई पेंशन एक किस्त में ही दी जाएगी.

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6. सरकार के मुताबिक सिर्फ़ एरियर देने पर ही 10-12 हज़ार करोड़ ख़र्च होंगे.

7. रिटायर होने वाले कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखने के लिए एक सदस्य का न्यायिक आयोग गठित किया गया जिसकी रिपोर्ट सरकार के पास है हालांकि अभी सार्वजनिक नहीं हुई है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कहा भी था कि ओआरओपी स्कीम की पहली किस्त में सरकार क़रीब 5,000 करोड़ रुपए खर्च करने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है.

लेकिन ओआरओपी आंदोलन की अगुवाई करने वाले मेजर जनरल सतबीर सिंह ने बीबीसी हिंदी को बताया कि उनकी सात मांगों में से उन लोगों ने कम से कम चार को नामंज़ूर कर दिया है.

ओआरओपी स्कीम पर सरकारी अधिसूचना को न मानने वालों का कहना है कि सरकार को जल्द से जल्द स्कीम की गलतियां सुधार कर इसे दोबारा लागू कर देना चाहिए.

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