'वन रैंक वन पेंशन' पर कुछ पूर्व सैनिकों की राय

70 साल के पूर्व सैनिक राम किशन ग्रेवाल की कथित आत्महत्या के बाद राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई और विपक्षी दलों कांग्रेस और आप ने सत्ताधारी भाजपा को निशाना बनाना शुरू कर दिया है.

इस सब हलचल के बीच दिल्ली में जंतर मंतर पर 'वन रैंक वन पेंशन' (ओआरओपी) की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे कुछ पूर्व सैनिकों से इस मसले पर बीबीसी हिन्दी ने उनकी राय जानी.

इन सैनिकों का कहना था कि, 'देशभक्ति की बातें करने वाली सरकार उनकी उपेक्षा कर रही है.'

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Image caption रिटायर्ड नायब सूबेदार किशनलाल बख़्शी चीन की क़ैद में रहे.

88 वर्षीय नायब सूबेदार किशनलाल बख़्शी के अनुसार, 'जब चीन से जंग शुरू हुई तो मैं चीनी सेना का सामना करने के लिए सरहद पर था. उसी दौरान मुझे युद्धबंदी बना लिया गया. मैं बारह महीने तक चीन के सिक्यांग प्रांत में युद्धबंदी रहा. चीन ने मुझे प्रताड़ित नहीं किया. मेरे साथ सैकड़ों भारतीय सैनिक युद्धबंदी थे. हम सबके साथ चीन ने बढ़िया सुलूक किया लेकिन उस हार की कसक अब भी है. इस सबके साथ उम्र के इस पढ़ाव में आकर हमें अपने हक़ के लिए सड़क पर आकर प्रदर्शन करना पड़ रहा है.'

किशनलाल 1962 की जंग लड़े थे. उन्होंने लगभग 25 वर्ष भारतीय सेना को अपनी सेवाएं दी.

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Image caption लेफ़्टिनेंट कामेश्वर पांडे भारत-पाकिस्तान की जंग में भारतीय सेना का हिस्सा थे.

देश की सेना में 31 वर्ष तक अपनी सेवाएं देने वाले लेफ़्टिनेंट कामेश्वर पांडे का देश से भरोसा उठ रहा है.

लेफ़्टिनेंट कामेश्वर पांडे के मुताबिक़, "जब मैंने फ़ौज जॉइन की तो बांग्लादेश को अलग करने की तैयारी चल रही थी. एस वक्त मैं टेक्निकल सपोर्ट में था. जब हमने बांग्लादेश अलग किया तो देश ने सिर पर बैठा लिया था. लेकिन आज सरकार ने हम फौजियों को सौतेली संतान बना दिया है. भरोसा नहीं होता कि यह वहीं देश है."

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Image caption रिटायर्ड कर्नल दिलबाग़ डबास 1971 की भारत-पाक युद्ध का हिस्सा थे.

1971 में जंग लड़े चुके कर्नल दिलबाग़ डबास को भी यही दुख है.

उनका मानना था कि,"जब फौज में था तब दुश्मन से जंग लड़ी और अब रिटायर हुआ तो देश की राजनीति से जंग लड़नी पड़ रही है."

1962, 1965 और 1971 की तीनों जंग लड़ चुके सूबेदार दलबीर सिंह को सरकार से ख़ासी निराशा है.

दलबीर के मुताबिक़, 'वही जज्बा आज भी है मगर सरकार से रवैये से नाराज़ हूं. जवानी के दिनों मैंने भारत मां की सेवा की पर आज बुढ़ापे में हम ग़ैर हो गए. हम फ़ौजियो के साथ सरकार दरियादिली नहीं दिखा रही. सरकार की बेरुख़ी दिल दुखाने वाली है.'

वन रैंक, वन पेंशन (ओआरओपी) के मुद्दे पर पत्रकारों से बात करते हुए विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह ने कहा है कि अब चार पैसे के लिए कोई कहे कि वो एक साल पहले देनी, एक साल बाद देनी थी उसके अंदर नहीं पड़ना है.

उन्होंने कहा कि जो चालीस साल पुरानी मांग थी इस सरकार ने उस मांग को पूरा किया है.

उनके अनुसार, ''उसमें कुछ त्रुटियां हैं जिसे रेड्डी कमीशन ठीक कर रहा है. उसके लिए ये सैनिक इंतज़ार नहीं कर रहे ये ग़लत है.''

1971 की जंग लड़ चुके के बी बहल का कहना था कि,"युद्ध में कौन फ़ौजी जान के बारे में सोचता है? मैंने भी नौसेना में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के तौर पर सारा जोखिम उठाया लेकिन आज जीवन के आख़िरी बेला में सरकार का व्यवहार दिल दुखाने वाला है."

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