'पाक पर सर्जिकल स्ट्राइक करने वाला एक चैनल कम हुआ!'

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भारत में महज़ दो तरह के लोग बसते हैं. एक वे जो 'अर्णब गोस्वामी' से मोहब्बत करते हैं. दूसरे वे जिन्हें उनकी शक्ल भी देखना ग़वारा नहीं है.

हो सकता है कि एक तबक़ा और हो, जो अर्णब को जानता ही न हो, लेकिन वे बेचारे किस गिनती में आते हैं.

फिर भी आपको याद दिला दें कि अर्णब गोस्वामी न्यूज़ चैनल 'टाइम्स नाउ' के एंकर थे. अब वे चैनल छोड़कर जा रहे हैं. उनके जाने पर लोग खुशी व्यक्त कर रहे हैं और निराशा भी.

निजी बातचीत में लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं. कुछ का कहना है कि भारत में पत्रकारिता का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, तो इसे दो भागों में बांटा जाएगा: अर्णब से पहले का दौर और अर्णब के बाद का दौर.

अर्णब गोस्वामी से पहले पत्रकार सवाल पूछते थे, उसका जवाब सुनते थे और फिर सवाल पूछते थे. अर्णब के आने के बाद वह पहले सवाल पूछते हैं. फिर खुद जवाब देते हैं और अपने ही जवाब से संतुष्ट नहीं हो पाते, तो स्पष्टीकरण के लिए सवाल पूछते हैं. इस दौरान स्टूडियो में आए मेहमान को सिर्फ 'यस अर्णब' या 'बट अर्णब' कहने की इजाज़त होती है.

Image caption अर्णब गोस्वामी के चैनल छोड़ने के बाद...

अर्णब के 'टाइम्स नाउ' छोड़ने की घोषणा पर पाकिस्तान में खुशियां मनाई जा रही हैं. अब कम से कम 'टाइम्स नाउ' चैनल पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक नहीं करेगा!

अर्णब का जाना सरकार के लिए बहुत महंगा साबित हो सकता है. सरकारी हलकों में चिंता का मौहाल है. आख़िर पाकिस्तान को लेकर नीति अब कौन तैयार करेगा?

भारत के रक्षा मंत्री और सेना प्रमुख, दोनों परेशान हैं. अर्णब ने अभी घोषणा नहीं की है कि वह अब क्या करना चाहते हैं. उन्होंने केवल इतना संकेत दिया है कि खेल अब शुरू हुआ है! क्या धोनी की नौकरी भी ख़तरे में है?

कुछ लोग उनकी विदाई पर चुटकी लेते हुए यह तक कह रहे हैं कि 'टाइम्स नाउ' को चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. अर्णब एक पत्रकार नहीं, बल्कि इंस्टिट्यूशन हैं और उनके 'क्लोन' अब हर चैनल पर मौजूद हैं. उनकी जगह के लिए जितने भी उम्मीदवार होंगे, सबका साक्षात्कार एक साथ लिया जाएगा. जिसकी आवाज़ सबसे बुलंद होगी, उसे अर्णब का ताज पहना दिया जाएगा.

लेकिन अर्णब के हमदर्दों की भी कमी नहीं.

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एनडीटीवी की बरखा दत्त के लिए यह अच्छी ख़बर है. अब उन्हें अपने कार्यक्रम में बार-बार यह नहीं दोहराना होगा कि फलां चैनल पर सिर्फ अपनी आवाज़ सुनी जाती है 'और हम' उनकी तरह शोर शराबे की पत्रकारिता नहीं करते. अब वह खुद भी पत्रकारिता पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं.

अर्णब टीवी पत्रकारिता के 'एंग्री यंग मैन' हैं. कुछ अमिताभ बच्चन की तरह. न उनकी उम्र बढ़ती है और न गुस्सा कम होता है. अर्णब दोधारी तलवार हैं. उन्होंने सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे सिंधिया दोनों को नहीं बख्शा. लेकिन लोग केवल राहुल गांधी का इंटरव्यू याद रखते हैं.

क्या अर्णब अपनी बनाई छवि से दामन छुड़ा सकते हैं? वह जल्दी ही एक नए अवतार में, एक नए चैनल पर जन्म लेंगे.

जानते हैं कि अर्णब के जाने के बाद अमिताभ बच्चन की फिल्म शोले का कौन सा मशहूर डायलॉग अब हर ज़ुबान पर होगा?

...इतना सन्नाटा क्यों है भाई?

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