'बलात्कार के बाद ख़ुदकुशी करना चाहती थी, बच्ची के लिए ज़िंदा हूं'

Image caption बलात्कार की शिकार महिलाएं ईंट के भट्टे पर काम करती हैं.

दिल्ली के पास ग्रेटर नोएडा के एक ईंट भट्टे में मज़दूरी करके गुज़ारा करने वाली कमज़ोर सी रज्जो ने बलात्कार की ज़िल्लत झेलने से बेहतर ख़ुदकुशी करना समझा, लेकिन अपनी बच्ची का चेहरा देखकर इरादा बदल दिया.

रज्जो विधवा है और उन तीन मज़दूर महिलाओं में से है जिनके साथ मंगलवार की रात को कुछ अनजान लोगों ने बलात्कार किया और उनका सामान भी लूट कर ले गए. वो अपनी तीन साल की एक बेटी, भाई और पिता के साथ रहती है.

घटना के दो दिन बाद इन मज़दूरों की झुग्गियों के आसपास पहले जैसी शांति थी और ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि यहाँ तीन तीन महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया हो.

बीबीसी से बात करते हुए रज्जो न तो रोई और न ही उन्होंने किसी तरह की कमज़ोरी ज़ाहिर की.

Image caption मज़दूरों के रहने के लिए ऐसे ही झुग्गीनुमा कमरे हैं.

उन्होंने कहा,"मैंने ख़ुदकशी करने की कोशिश भी की. मैं ख़ुद तो कमरे में भी बंद कर लिया. लेकिन सब डर गए, मेरा छोटा भाई दौड़कर आया कि क्या कर रही हो. उसने कहा कि हम सब तुम्हारे साथ हैं. कुछ नहीं हुआ है."

वो कहती हैं, मैं सिर्फ़ अपनी बच्ची के लिए ज़िंदा हूं, उसी की वजह से मैं ये ज़िल्लत झेल रही हूँ."

पुलिस का कहना है कि मंगलवार रात कुछ बदमाशों ने ख़ुद को पुलिस वाले बता कर ईंट भट्टे पर काम कर रहे मज़ूदरों के घरों में लूटपाट की और महिलाओं से गैंगरेप किया.

भट्टे पर पहले की तरह सब कुछ सामान्य नज़र आता है. महिलाएं रोज़मर्रा के काम में मशग़ूल थीं. बलात्कार का शिकार हुई तीन में से एक महिला बर्तन धो रही थीं, दूसरी सब्ज़ी काटने में व्यस्त थीं.

एक और महिला कमज़ोरी और बीमारी की इंतिहा के कारण चारपाई पर लेटी थी. उसके पति जावेद ने बताया कि वो अपनी पत्नी को अस्पताल में भर्ती करवाने की हालत में नहीं हैं क्योंकि उनके पास इतने पैसे ही नहीं हैं.

तीसरी महिला हमसरी ने बताया, "दिन भर की मेहनत के बाद हम खा-पीकर सो गए थे कि रात क़रीब बारह बजे कुछ लोग आए जिन्होंने कहा कि वो पुलिसलवाले हैं. तलाशी के नाम पर वे पुरुषों को बाहर ले गए और एक-एक करके उन्हें बांध दिया. इसके बाद उन्होंने हमारे साथ बेइज़्ज़ती की. जाते हुए वो हमारे पैसे, ज़ेवर और सामान भी लूट ले गए."

Image caption एक बीमार बलात्कार पीड़िता, जिसे अस्पताल में होना चाहिए था, पैसे की कमी की वजहस से घर पर ही थी.

रज्जो कभी स्कूल जाना चाहती थी और पढ़ना-लिखना चाहती थी. "मैं पढ़ना चाहती थी, ग़रीबी की वजह से पढ़ नहीं पाई. जवानी में ही पति की मौत हो गई. यहां रहकर अपने दम पर पेट भर रही थी. मैं पहले से ही इतना परेशान थी, अब ये सब हो गया."

उन्होंने कहा, "मैं पिता के साथ रहती हूं, लेकिन किसी के भरोसे नहीं बल्कि मेहनत करके पेट भरती हूं."

रज्जो कहती हैं, "पता नहीं वो दुश्मन कहां से आ गए, एक दिन ख़ुदा उन्हें सज़ा ज़रूर देखा. उन्होंने हम सबको, बच्चों समेत बंद कर दिया. मैंने अपने भाई को आवाज़ लगाई और चिल्लाई भैया बचा लो, भैया बचा लो, लेकिन भैया क्या करते वो तो पहले ही बंधे पड़े थे."

वो वोलीं, "वो मेरे साथ ज़बरदस्ती कर रहे थे, मेरे हाथ एक डंडा आया मैंने वही उसके सिर में मार दिया. इसके बाद उसने मेरे साथ और ज़्यादती की."

उन्होंने आगे बताया, "मैं चाहती हूँ जब वो पकड़े जाएं तो मुझे ज़रूर बुलाया जाए, मैं अपने हाथ से उसे सज़ा दूंगी. जो मेरे साथ हुआ है वो किसी और के साथ न हो."

वो कहती हैं, "मैं कल पूरी रात नहीं सो पाई, ज़रा भी आहट होती तो लगता कि कोई आ गया है, मैंने सुरक्षा के लिए एक छोटा सा डंडा अपने पास रखा भी. अबकी बार मैं मर जाउंगी लेकिन अपने साथ ये नहीं होने दूंगी. मेरी बच्ची को कोई न कोई संभाल ही लेगा."

तैंतालीस साल की हमसरी भी दूसरी औरतों और मर्दो की तरह भट्ठे पर काम करती हैं. उन्होंने कहा,"उन्होंने बुढ़ापे में मेरी इज़्ज़त ख़राब कर दी. ये पाप किसी और के साथ नहीं होना चाहिए. पुलिस को बदमाशों को पकड़कर सज़ा देनी चाहिए."

ये मज़दूर पिछले लगभग पाँच सालों से यहां रहते हैं.

हमसरी के पति के सामने इस हमले को स्वीकार करने के सिवा कोई चारा नहीं है. वो कहते हैं, "हमें पहले कभी किसी तरह की दिक्क़त नहीं हुई. लूटमार का डर कभी इसलिए नहीं लगा कि हमारे पास लूटे जाने के लिए है ही क्या!"

ये पूछने पर कि क्या इस तरह खुले में जंगल में रहते डर नहीं लगता, उन्होंने कहा, "हमारी जद्दोजहद तो पेट भरने की थी, कभी सोचा ही नहीं था कि हमारे साथ ये भी हो सकता है."

Image caption पीड़ित परिवारों के कुछ बच्चे मदरसे में पढ़ते हैं, बाक़ी साथ ही रहते हैं.

बलात्कार की शिकार महिलाओं और उनके परिजनों से बात करने के बाद अहसास हुआ कि सुरक्षा से ज़्यादा उन पर भूख मिटाने की चिंता हावी है.

अब यहाँ न कोई टीवी कैमरा है, न कोई अख़बार वाला, न कोई सामाजिक कार्यकर्ता या कोई सपोर्ट ग्रुप. ईंट भट्ठे पर काम करके रोज़ी कमाने वाली ये महिलाएँ शायद ही जानती हों कि 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया बलात्कार कांड के बाद देश का क़ानून बदल दिया गया था.

उन्हें भी आस है कि बदला हुआ क़ानून उन्हें न्याय दिलवाएगा.

(पहचान छुपाने के लिए नाम बदल दिए गए हैं)

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