पेरिस समझौते का भारत पर क्या होगा असर?

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पेरिस जलवायु समझौता शुक्रवार से लागू हो रहा है. कई साल तक चली जटिल बातचीत के बाद बीते दिसंबर को इस पर दस्तख़त कर दिए गए.

इसका मुख्य मक़सद दुनिया के औसत तापमान को औद्योगिक युग के पहले के तापमान से दो डिग्री नीचे लाना है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि ज़बरदस्त तूफ़ान, सूखे और समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी जैसे ख़तरनाक जलवायु परिवर्तनों से बचने के लिए यह ज़रूरी है.

जलवायु वैज्ञानिक इसके लिए र्ईंधन पैदा करने, परिवहन, खेती बाड़ी और रिहाइश के लिए जंगल काटने से जो ग्रीन हाउस गैस बनते हैं उसे ज़िम्मेदार मानते हैं.

ये गैसें, ख़ास कर कार्बन-डाइऑक्साइड, सूर्य की गर्मी को सोख लेती हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन की मुख्य वजह यही है. इसलिए यह ज़रूरी है कि क़रार पर दस्तख़त करने वाले देश अपने यहां कार्बन-डाईऑक्साइड के उत्सर्जन में महत्वपूर्ण कटौती करें.

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इस क़रार को लागू करना बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि कोयला, पेट्रोल, गैस जैसे फ़ॉसिल फ़्यूल के इस्तेमाल में कटौती करने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. लेकिन विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि पारंपरिक ईंधन से साफ़ नए ईंधन के इस्तेमाल की ओर बढ़ना काफ़ी सस्ता और टिकाऊ होगा.

संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों का कहना है कि इसका मतलब यह है कि जलवायु समझौता अब अंतरराष्ट्रीय क़ानून बन जाएगा. जिन देशों ने इस पर दस्तख़त किए हैं, उन्हें कार्बन-डाईऑक्साइड में कटौती करने के अपने वायदे के मुताबिक काम करना ही होगा.

90 से ज़्यादा देशों ने इसे अपने विधायिका से पारित करवा लिया है. यह संख्या बढ़ती ही जा रही है क्योंकि पेरिस सम्मेलन में मौजूद सभी 197 देशों ने इस क़रार को स्वीकार कर लिया था.

लेकिन यह क़रार क़ानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं है. यह दस्तख़त करने वाले देशों की इच्छा पर निर्भर है. जलवायु परिवर्तन सचिवालय ने 1990 के शुरू से ही कई दौर की बातचीत आयोजित की. उसके अधिकारी हर देश के कामकाज की समीक्षा करेंगे.

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यह कैसे किया जाएगा, यह अभी भी तय नहीं है. अगले हफ़्ते मोरक्को में होने वाले जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में इस पर बातचीत की जाएगी और नियम क़ानून तय किए जाएंगे. मोरक्को में होने वाले सम्मलेन की कार्यकारी सचिव पैट्रिशिया एसपीनोज़ा और मोरक्को के विदेश मंत्री सलाहेदीन मज़ूआर की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि साल 2018 तक यह काम पूरा हो जाना चाहिए.

इस बयान में यह भी कहा गया है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और यह साफ़ हो सकेगा कि हर कोई इसमें अपनी काबिलियत के मुताबिक़ योगदान करे.

पेरिस जलवायु समझौता अब तक सबसे तेज़ी से लागू होने वाले क़रारों में एक है. शुरू में समझा जाता था कि यह साल 2020 तक लागू हो जाएगा, पर कुछ लोगों का कहना है कि कई देश इसे उस समय तक लागू नहीं करेंगे. इसे लागू करने के लिए 55 फ़ीसद ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार कम से कम 55 देशों का होना ज़रूरी है.

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उम्मीद से हट कर, चीन, अमरीका, भारत और यूरोपीय संघ के देश जैसे बड़े गैस उत्सर्जकों ने इस क़रार को अपने यहां पारित करवा लिया है. यह समझा जाता था कि साल 2020 तक इसे लागू करने से यह दिक्क़त होगी क्योंकि 2015 से 2020 तक की क़रार में छूट का जो समय होगा, उस दौरान पहले से ज़्यादा कार्बन जमा हो जाएगा. इसे साफ़ करना और अधिक मुश्किल होगा.

पिछले हफ़्ते ही विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने चेतावनी दी कि वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर 400 पीपीएम से ज़्यादा हो चुका है और "कई पीढियों" तक यह कम नहीं हो सकेगा. इसने यह भी कहा कि 2016 में पहली बार पूरे साल यह स्तर से ऊपर रहेगा.

पेरिस समझौता लागू होने के एक दिन पहले ही संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने एक रिपोर्ट में कहा कि ग्रीनहाउस गैसों का स्तर सीमा से एक चौथाई ज्यादा होने ही वाला है. इसने यह भी कहा कि औद्योगिक युग के पहले के तापमान से दो डिग्री नीचे का तापमान हासिल करने के लिेए जितना ग्रीन हाउस गैस छोड़ जाना चाहिए, साल 2030 में उससे 12 से 14 गीगाटन अधिक ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन होगा.

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यूएनईपी के उत्सर्जन रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि साल 2030 में कार्बन उत्सर्जन 56 गीगाटन तक पंहुच जाने से दुनिया के तापमान में 2.9 से 3.4 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो जाएगी. यूरोपय संघ का पूरा परिवहन और विमानन सेक्टर साल भर में लगभग एक गीगाटन कार्बन का उत्सर्जन करते हैं.

ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन करने वाले प्रमुख देशों में भारत है और इसने इस क़रार को पारित भी कर दिया है. लिहाज़ा, कार्बन उत्सर्जन में कटौती करन इसकी बड़ी ज़िम्मेदारी होगी.

तीसरा सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाले इस देश ने स्वेच्छा से एक योजना बना कर पेरिस समझौते में पेश किया था. इसने यह भी कहा था कि यह 2005 के स्तर से जीडीपी के हिसाब से उत्सर्जन में 20 से 25 प्रतिशत तक की कटौती करने में यह कामयाब होगा.

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वृहस्पितवार को संयुक्त राष्ट्र से जारी एक रिपोर्ट में इसकी पुष्टि कर दी गई है. लेकिन इसमें यह भी कहा गया कि स्वेच्छा से कटौती करने के प्रस्ताव से तापमान को दो डिग्री सेल्सियस नीचे रखने में मदद नहीं मिलेगी. यह भी कहा गया है कि इन योजनाओं से साल 2030 में सुरक्षित स्तर से 25 प्रतिशत अधिक गैस उत्सर्जन होगा. इससे तापमान 3.4 डिग्री बढ़ जाएगा.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में सभी देशों से कहा गया है कि वे कार्बन उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य बढ़ाएं.

भारत की दिक्क़त यहीं शुरू होती है. इसने हमेशा यह तर्क दिया है कि इसे विकास का एजेंडा भी लागू करना है और कोयला और पेट्रोल जैसे ईंधन में में कटौती की ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से विकसित देशों की होनी चाहिए.

धनी देशों का इसके उलट यह तर्क है कि चीन और भारत तेज़ी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाएं हैं और ये सबसे अधिक उत्सर्जन भी करते हैं. इसलिए उत्सर्जन में इनकी कटौती किए बग़ैर कोई फ़ायदा नहीं होगा.

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पहले यह समझा जाता था कि भारत पेरिस समझौते को पारित कराने में देर कर रहा है. पर जब चीन और अमरीका ने इसे पारित कर दिया, भारत पर भी दवाब बढ़ा, ऐसा नहीं करने की स्थिति में क़ानून बनाने की प्रक्रिया में भारत शामिल नहीं हो पाता.

संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों का कहना है कि मोरक्को में उत्सर्जन में कटौती से जुड़ा क़ानून बनाया जाएगा, लेकिन यह बहुत मुश्किल काम होगा.

भारत के ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने ट्वीट किया, "ह्वाइट हाउस की सड़कों पर दिन में भी बत्तियां जलती हैं और हमसे कोयला इस्तेमाल पर कहा जा रहा है."

भारत ने सौर ऊर्जा और पवन चक्की लगाने की महात्वाकांक्षी योजनाएं बनाई हैं. पर इसने अगले कुछ सालों में कोयला उत्पादन दुगना करने की योजना भी तो बनाई है.

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