क्या भारत में पूरा होगा टेरीज़ा मे का सपना?

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टेरीज़ा मे की भारत यात्रा से क्या हैं उम्मीदें?

ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे भारत दौरे पर हैं. उनके साथ बड़ी संख्या में राजनयिक, सलाहकार, व्यवसायी और मीडिया के लोग आ रहे हैं.

यह ब्रिटेन की नई प्रधानमंत्री की यूरोप के बाहर पहली द्विपक्षीय बैठक होगी. भारत दौरा उनके उस मिशन का पहला पड़ाव है, जिसके तहत वो 'दुनिया में ब्रिटेन की नई भूमिका तय' करना चाहती हैं.

और इसके लिए सबसे पहले भारत को क्यों चुना गया?

भारत, दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था वाला देश है. यहां की जीडीपी दर सात फ़ीसदी से ज्यादा है और भारत के पास सवा अरब उपभोक्ताओं का एक बड़ा और मज़बूत बाज़ार है.

दोनों देशों के बीच संबंधों को रेखांकित करने वाले कई बिंदुओं पर विचार किया जा सकता हैं, फिर चाहे भारत और ब्रिटेन के बीच लंबे समय से चले आ रहे रिश्ते हों या दोनों की ऐतिहासिक साझेदारी.

भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली आपसी सहयोग और भविष्य की योजनाओं को लेकर पहले ही काफी बातें कह चुके हैं, बशर्ते ये योजनाएं और बातें महज़ कूटनीतिक दांव-पेच बनकर ना रह जाएं.

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इसकी भनक एक शीर्ष भारतीय राजनयिक के साथ मुलाकात के दौरान लगी, जब उन्होंने टेरीज़ा मे के दौरे को 'देर से लिया गया फ़ैसला' कहा.

ब्रिटेन में लोग चाहते थे कि यह दौरा दिसंबर में हो. भारतीय राजनयिक ने मुझसे कहा, "यह ब्रिटेन की अंदरूनी राजनीति से जुड़ा फ़ैसला है, ना कि हमारे मुताबिक़."

ब्रिटेन के कहने पर व्यापारिक सौदों को लेकर अनौपचारिक बातचीत पहले ही शुरू हो चुकी है.

यूरोपीय संघ के नियमों के मुताबिक़ ब्रिटेन यूरोप का हिस्सा रहते हुए औपचारिक रूप से कोई व्यापारिक सौदा नहीं कर सकता. लेकिन अब वो यूरोपीय संघ से जल्दी से जल्दी बाहर आकर नई संभावनाएं तलाशना चाहता है.

भारतीय राजनयिक का कहना था, "हम सालों से ब्रिटेन के साथ द्विपक्षीय सौदा करने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन अब इस सौदे में भारत के लिए बहुत कुछ नहीं रह गया है."

वो बता रहे थे कि भारत का बाज़ार 1990 के दशक के शुरुआती दौर तक बाहर के देशों के लिए बंद था और अब भी विदेशी समानों के आयात को लेकर कई तरह की पाबंदियां हैं. जबकि ज़्यादातर विकसित देश व्यापार पर पाबंदियों में कटौती कर रहे हैं.

उन्होंने आगे कहा, "इन बाधाओं के बावजूद भारत अच्छा कर रहा है, तो इसका मतलब यह हुआ कि किसी भी सौदे पर हस्ताक्षर करने से पहले इससे कहीं और ज्यादा रियायत की उम्मीद होगी."

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यूरोपीय संघ के साथ भी कुछ इसी तरह की समस्या थी.

पीटर मैंडेलसन जब 2007 में यूरोपीय संघ के ट्रेड कमिशनर थे, तब उन्होंने यूरोपीय संघ और भारत के बीच मुक्त व्यापार की बात कही थी.

इसके बाद नौ सालों तक 16 बार औपचारिक बातचीत हुई, लेकिन इस दिशा में बहुत कम आगे बढ़ा गया.

कोरिया में ब्रिटेन के पूर्व राजदूत रह चुकें और सालों तक भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक परिषद के कर्ता-धर्ता सर थॉमस हैरिस कहते हैं, "भारत लगातार अकाउंटिंग, बीमा, बैंकिंग और क़ानूनी सेवाओं पर पाबंदियां हटाने का विरोध करता रहा है. ये ब्रिटेन के काफी मजबूत सेक्टर हैं और इन्हीं सेक्टरों में वो भारत के साथ व्यापार के दरवाजें खोलना चाहता है."

आगे वो कहते हैं, "भारत, ब्रिटेन के साथ द्विपक्षीय वार्ता में उन बातों पर सहमत होगा, जिन बातों पर वो यूरोपीय संघ के साथ सहमत नहीं हुआ था, ये बात समझ से परे है. "

और अब तो ब्रिटेन में भारतीय प्रवासियों के वीज़ा का मसला और पेचीदा हो चुका है.

पिछली व्यापारिक बातचीत के दौरान यूरोप ने प्रोफेशनल लोगों के लिए और ज़्यादा वीज़ा देने से जुड़ा भारत का अनुरोध ठुकरा दिया था.

ऐसे हालात में टेरीज़ा मे की सरकार को भारत के इस दौरे से शायद ही कुछ फ़ायदा हो.

उनकी सरकार की नीति अप्रवासियों की संख्या में कमी करने की रही है.

पिछले महीने कंज़रवेटिव पार्टी के सम्मेलन में गृह मंत्री अंबर रुड ने ब्रिटेन वाले विदेशी कामगारों और छात्रों की तदाद को कम करने की बात कही थी.

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वित्त मंत्री फिलिप हैमंड ने उसके बाद ब्रिटेन जाने वाले पेशेवर कामगारों के प्रति थोड़ा नरम रवैया बरतने का इशारा किया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक पूर्व सलाहकार ने एक भारतीय अख़बार से कहा, "ब्रिटेन, भारत जैसे देशों को यह संदेश देना चाहता है कि हम आपके साथ व्यापार तो करना चाहते हैं, लेकिन हम आपके लोगों को नहीं चाहते."

जब इस बयान के बारे में एक ब्रितानी राजनयिक को बताया गया तो वो परेशान हो गए.

उन्होंने सलाह देने वाले लहज़े में कहा, "सरकार को अपनी नीति ज्यादा साफ़ तौर पर सामने रखने के लिए कोई रास्ता तलाशना होगा. "

टेरीज़ा मे की भारत यात्रा उनकी पहली बड़ी परीक्षा है. नतीजे जल्द सामने होंगे.

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