छठ के गीतों में बेटी की कामना

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सांझ के देबई अरघिया, और किछु मांगियो जरूर,

पांचों पुत्र एक धिया (बेटी), धियवा मंगियो जरूर.

रोहतास के नोखा गांव का अंकित छठ के ऐसे ही गीत सुनते हुए बड़ा हुआ है. वो कहता है, "बहुत अच्छा लगता है जब मां के मुंह से ये गीत सुनता हूं. इस गीत में बेटी को सूर्य भगवान से मांगा जा रहा है और ये ही इस महापर्व की ख़ासियत है."

19 साल का अंकित जो बात कह रहा है वो हाल के सालों में छठ के मौके पर बड़ी शिद्दत के साथ रेखांकित की जा रही है. छठ के पारंपरिक गीतों में छठी माता से बेटी देने की प्रार्थना की जाती है. एक गीत जो बहुत लोकप्रिय है, उसके बोल है -

रूनकी झुनकी बेटी मांगीला, पढ़ल पंडितवा दामाद

छठी मइया दर्शन दींही ना आपन. ( खेलती कूदती बेटी और पढ़ा लिखा दामाद चाहिए)

इस बारे में बात करते हुए लोकगायिका चंदन तिवारी कहती हैं, "आप देखें हमारे यहां जब आशीर्वाद में कहा जाता है दूधो नहाओ पूतो फलो या फिर पुत्रवती भव. यानी बेटी की कामना कहीं नहीं है. लेकिन छठ में बेटी की भी कामना है और धनवान नहीं बल्कि पढ़े लिखे दामाद की कामना व्रती करती है."

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छठ के मौके पर नीतू कुमारी नूतन का

छठ मुख्य रूप से बिहार-झारखंड में मनाया जाता है. बहुत पवित्रता के साथ मनाए जाने वाले इस पर्व में डूबते और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है.

इस महापर्व और स्त्रियों की भूमिका के बारे में हिंदू धर्म के जानकार पंडित रामदेव पाण्डे बताते हैं, "छठ के बारे में तो कहा ही जाता है कि इस व्रत को पहली बार सतयुग में राजा शर्याति की बेटी सुकन्या ने रखा था. इसलिए इसमें स्त्री स्वर की प्रधानता है. कोई ऐसा पर्व नहीं है जिसमें बेटी की कामना हो, छठ व्रत में ये कामना है. दुर्गापूजा में भी नारी की पूजा होती है लेकिन वहां बेटी की कामना नहीं है."

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छठ के गीतों में सभी तरह का काम करने वाले लोगों की बेटियों का जिक्र है. एक गीत के बोल है-

छोटी रे मोटी डोमिन बेटी के लामी लामी केश,

सुपवा ले आइहा रे डोमिन, अरघ के बेर

छोटी रे मोटी मालिन बेटी के लामी लामी केश,

फुलवा ले आइहा रे मलिन, अरघ के बेर …..

वरिष्ठ साहित्यकार और लोकगायक शांति जैन कहती है, ''आप इन गीतों को देखिए इसमें ऊंच नीच, छोटे बड़े सभी तरह के भेदभाव टूटते हैं. जातीय जकड़नें टूटती हैं. एक तरफ साक्षात देवता होते हैं और दूसरी तरफ पूजा की सारी सामग्री प्रकृति से ली हुई जिसको बनाने में समाज के सभी वर्गों की जरूरत है. इसी पर्व में आप डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते है, इसी में आप बेटी देने की प्रार्थना करते है. बाकी किसी पर्व में ऐसा कहां है ?"

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ये जातीय और धार्मिक जकड़नें किस तरह टूटती है इसका ज़िक्र वरिष्ठ मैथिली लेखिका उषा किरण ख़ान करती हैं.

वो बताती हैं, "हमारे यहां तो मुसलमान औरतें भी छठ करती हैं. बस वो छठ के पकवान नहीं पकाती हैं, सिर्फ फल और सब्जियां ही चढ़ाती हैं. जब हम छोटे थे तो हमने उनसे पूछा कि वो पकवान क्यों नहीं पकाती है, तो उन्होंने बड़े भोलेपन से इसका जवाब दिया कि हमारा छुआ वो( भगवान) नहीं खाएंगे इसलिए. इस एक बात से आप समझे कि पर्व कितना व्यापक है."

अपनी शूटिंग में व्यस्त छोटे पर्दे की लाली यानी रतन राजपूत छठ के मौके पर पटना नहीं आ पा रही है. रतन राजपूत ने भी कुछ साल छठ व्रत किया था. फोन पर बातचीत में वो कहती हैं, "औरत के बिना तो सब कुछ अधूरा है. वो अगर अपने महत्व को समझ जाए तो औरत को बढ़ने से कौन रोक सकता है."

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