जिस दुश्मन की बहादुरी की कायल थी ब्रितानी फ़ौज

Image caption नालापानी का किला उत्तराखंड में है.

दो सौ साल पहले के ऐतिहासिक नालापानी युद्ध का गवाह रहा खलंगा का किला खुद को बचाए जाने का इंतजार कर रहा है. खलंगा उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के पास है.

अंग्रेज़ों ने नालापानी के युद्ध में नेपाली सैनिकों को हराया था लेकिन अंग्रेज़ उनकी वीरता के कायल हो गए थे.

देहरादून शहर से करीब 5 किलोमीटर दूर सहस्रधारा रोड पर स्थित खलंगा किले में इस युद्ध से जुड़ा अपनी तरह का अनोखा स्मारक भी है.

स्थानीय नेपाली समुदाय के लोगों कहना है कि देखरेख के अभाव में यह किला नष्ट होने के कगार पर है. वहां के लोग कहते हैं कि इस जगह के संरक्षण की जिम्मेदारी भारत सरकार की है.

वे चाहते हैं कि उनके पुरखों की याद में बने स्मारक के हालात देखने के लिए नेपाली अधिकारी भी आएं.

Image caption नालापानी किले के देखरेख की जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग के पास है.

यह स्मारक ब्रितानी सेना की जीत और नेपाली सैनिकों की वीरता की कहानी कहता है. ब्रितानी सैनिकों ने नेपाली सैनिकों की हार के बावजूद उनकी बहादुरी को सराहा था. दो सौ साल पहले यहां भीषण लड़ाई हुई थी लेकिन आज यह एक शांत जगह है.

हालांकि सड़क पास होने की वजह से गाड़ियों का शोर-शराबा यहां की शांति को भंग करता है. इतिहासकारों का कहना है कि 1814 के अक्तूबर में हुए नालापानी युद्ध में तकरीबन 3500 ब्रितानी सैनिकों ने तोप और गोला बारूद के साथ गोरखा सैनिकों पर हमला किया था.

इस हमले में मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेस्पी सहित 800 ब्रितानी सैनिक मारे गए.

कहा जाता है कि इस युद्ध में महिलाओं और बच्चों समेत करीब 600 नेपाली सैनिकों ने नालापानी पहाड़ पर ब्रितानी फ़ौज के हमले को खुखरी, तीर-धनुष और पत्थरों से तीन बार नाकाम कर दिया था.

नेपाली इतिहासकार लिखते हैं कि इसके बाद ब्रितानी फ़ौज ने खलंगा के क़िले की पानी आपूर्ति बंद कर दी थी.

Image caption खलंगा के स्मारक में बलभद्र का नाम गलत लिखे जाने की बात कही जाती है.

पानी बंद करने के बाद नेपाली फ़ौज के कमांडर बलभद्र कुंवर ने अपनी इच्छा से नालापानी छोड़ने की घोषणा कर दी. बलभद्र कुंवर 70 सैनिकों को अपने साथ लेकर वहां से निकल गए.

इस युद्ध के बाद तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने वहाँ पर अपने जनरल जिलेस्पी और बलभद्र कुंवर की याद में वहां पर दो स्मारक बनाए जिसमें बलभद्र और उनकी फौज को 'वीर दुश्मन' कह कर संबोधित किया गया है.

बलभद्र विकास समिति के उपाध्यक्ष और भारतीय सेना के कर्नल सी. बी. थापा (रिटायर्ड) बताते हैं, "उस समय बलभद्र की बहादुरी के कारण लोगों ने गोरखा सैनिकों की वीरता को माना. आज जितने भी नेपाली पलटन हैं, वे गोरखा टोपी पहनते हैं, यह टोपी उन्हीं बलभद्र की देन है.

अंग्रेजों ने 1815 में उनकी बहादुरी देखकर गोरखा रेजिमेंट की शुरुआत की. उस वक्त की देन के कारण नेपाली लोग आज भी गोरखा टोपी और खुखरी लेकर चल सकते हैं."

Image caption अंग्रेजों ने बलभद्र की बहादुरी को सराहा था.

देहरादून के स्मारक में बलभद्र कुंवर का ज़िक्र 'बलभद्र थापा' के रूप में है. एक नेपाली इतिहासकार बताते हैं कि इसमें 'कुंवर' को 'थापा' लिखने की ग़लती हुई है.

'नालापानी के नायक' नाम से किताब लिखने वाले त्रिभुवन विश्वविद्यालय के नेपाली इतिहास संस्कृति और पुरातत्व विभाग के प्रमुख और धन बहादुर कुंअर बताते हैं, "बलभद्र कुंवर के पिता चंद्रवीर कुंवर सेनापति थे. चंद्रवीर के निधन के बाद बलभद्र के नाना अमर सिंह थापा ने दरबार में चिट्ठी लिखकर कहा कि इनको फ़ौज में कप्तानी दी जाए. जिसके बाद उन्हें 1813 में नालापानी की जिम्मेदारी दी गई."

इतिहासकार कुंवर कहते हैं कि नालापानी की लड़ाई के बाद 1824 में अफ़ग़ानिस्तान में राजा रणजीत सिंह की फ़ौज के पक्ष में लड़ते हुए बलभद्र कुंवर मारे गए.

कितने लोग तो अभी भी उनका जिक्र 'भाड़े के सिपाही' के तौर पर करते हैं क्योंकि वह अपना देश छोड़कर अफ़ग़ानिस्तान लड़ने गए थे.

बलभद्र कुंवर को अभी भी देहरादून सहित भारत में कई जगहों पर नेपाली भाषी समुदाय अपने गर्व और पहचान के तौर पर देखता है.

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Image caption नेपाली सेना ने अपने इतिहास में नालापानी की लड़ाई का जिक्र किया है.

देहरादून शहर के नज़दीक खलंगा स्मारक भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है.

उससे कुछ दूरी पर नालापानी पहाड़ पर स्थित युद्ध का मैदान अभी संरक्षण की बाट जोह रहा है.

यह वन क्षेत्र है, हालांकि देहरादून के लोगों ने बलभद्र के सम्मान में एक युद्ध स्मारक का निर्माण किया है. जिसकी भी सही तरीके से देखरेख नहीं हो पा रही है.

युद्ध स्मारक अब जीर्ण शीर्ण अवस्था में दिखाई देता है. अतीत में स्मारक के निर्माण के लिए भारत सरकार ने ज़मीन और 50 लाख रुपये दिए थे.

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पैसा ट्रैकिंग रूट के लिए दिया गया था. ट्रैंकिग रूट बनने से लोगों की दिलचस्पी इस ऐतिहासिक विरासत को लेकर बढ़ती और इसका विकास पर्यटक स्थल के रूप में होता.

Image caption बलभद्र कुंवर को नेपाली में एक वीर विभूति के रूप में देखा जाता है.

समिति के उपाध्यक्ष कर्नल सी. बी. थापा कहते हैं, "जिस जगह पर जनरल जिलेस्पी को 31 अक्टूबर, 1814 को गोली मारी गई थी, उस जगह पर उनका एक स्मारक बनाया जाए. ऐसा करने से इस जगह के विकास के लिए ब्रिटेन से भी मदद मिल सकती है और यह एक पर्यटन स्थल बन सकता है."

नेपाली सेना का इतिहास लिखने वाले सहायक रथी (नेपाली सेना का एक पद) प्रेम सिंह बस्नेत कहते हैं, "अंग्रेजों के साथ हुए नालापानी युद्ध में किले को मज़बूत करने में बलभद्र कुंवर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी."

उन्होंने बताया कि पहाड़ की ऊंचाई पर लकड़ी और पत्थर की मदद से इस किले का निर्माण किया गया था.

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Image caption नालापानी किले की यह तस्वीर पुराने नक्शे पर आधारित है.

नालापानी की रक्षा के लिए बलभद्र कुंवर ने वहां पहुंचते ही किले की कमज़ोर स्थिति देखते हुए गोरखा सैनिकों, उनकी पत्नियों और बच्चों की मदद से दिनरात एक करके इस किले को मजबूत किया था.

अंग्रेजों ने दशहरे के समय अचानक यहां हमला किया था, इस देखते हुए किले के बाहर 12 फुट ऊंची दीवार बनवाई गई थी.

Image caption नालापानी किले के संरक्षण के लिए स्थानीय लोग भारत सरकार की मदद चाहते हैं.

इस जगह के संरक्षण के लिए यहां रहने वाले नेपाली भाषी समुदाय ने अपने पुरुखों की बहादुरी का इतिहास बचाने के लिए नेपाली अधिकारियों से आग्रह किया है.

अब तक, पूर्व प्रधानमंत्री लोकेन्द्र बहादुर चंद और झलनाथ खनाल और पूर्व प्रधान सेनापति छत्रमान सिंह गुरुंग इस क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं.

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