बैंक मित्र हैं मोदी ही मुहिम के 'असली अगुआ'

इमेज कॉपीरइट Reuters

भारत के ग्रामीण इलाकों में पिछले तीन साल में तक़रीबन 25 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं. लेकिन इन खातों को चालू रखना बैंकों के लिए निहायत ही मुश्किल साबित हो रहा है.

पूरे मामले की पड़ताल कर रहे हैं आतिश पटेल.

धरमबीर सिंह ग्रामीण बैंकिंग एजेंट हैं. वे हरियाणा के गांव जोंधी में हैं. हाथ में पकड़ी मशीन ने जब महिला की पहचान दो बार नहीं की, उन्होंने उनके दाएं अंगूठे को ज़ोर से अपने सिर पर रगड़ा. कुछ सेकंड बाद उन्होंने जब फिर कोशिश की, मशीन पर उस महिला की पहचान हो गई और लेनदेन पूरा हो गया.

वे कहते हैं, "मैंने यह कारगर ट्रिक सीख ली है."

'बैंक अनपढ़ लोगों को एटीएम कार्ड नहीं देता'

'बैंक के लिए नेत्रहीन अनपढ़ क्यों हैं?'

इमेज कॉपीरइट Thinkstock

उस महिला ने कुछ तुड़े मुड़े नोट उन्हें पकड़ा दिए. उनके सेविंग्स अकाउंट में ये पैसे जमा हो जाएंगे.

बैंकों को ग्रामीण इलाक़ों तक पंहुचाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुहिम के तहत उन्होंने 18 महीने पहले अपना अकाउंट खुलवाया था.

एक करोड़ खाते हैं शक के दायरे में

आपके बैंक से कितना अलग है पेमेंट बैंक?

ख़ैर, वह तो आसान काम था. अब ध्यान इस पर दिया जा रहा है कि ये अकाउंट चालू रहें और उनका इस्तेमाल होता रहे. पहले की मुहिम में यह नहीं हो सका था. यह मुहिम सफल होती है या नाकाम, यह सिंह जैसे लोगों पर निर्भर है.

धरमबीर जैसे हज़ारों लोग भारत के बड़े बैंकों से जुड़े हुए हैं. इन्हें "बैंक मित्र" या "बैंकिंग करेसपॉन्डेंट" कहा जाता है.

वे खाता खोल देते हैं, पैसे जमा करा देते हैं और निकाल देते हैं. वे कभी-कभी बीमा या दूसरी तरह के लेन देन भी कर देते हैं. वे अमूमन अपने घर या दुकान से ही काम करते हैं, वे कभी कभी गांव गांव घूमते भी हैं.

Image caption बैंकिग लेनदेन पूरा करते हुए धरमबीर सिंह

बैंक किसी कंपनी को अपना करेसपॉन्डेंट बनाता है. वह कंपनी लोगों के व्यक्तिगत खाते की व्यवस्था देखता है. मसलन, धरमबीर को ही लें. वे सार्वजनिक क्षेत्र के ओरियन्टल बैंक ऑफ़ कॉमर्स के लिए काम करते हैं, लेकिन "फ़िनोपेटेक" नाम की कंपनी ने उन्हें अपने यहां नौकरी दी है.

इन एजेंटों को बैंकों का 'सड़क पर पैर' माना जाता है. ग्रामीण इलाकों में कैश मशीन लगाने या शाखा खोलने की तुलना में इनसे काम करवाना सस्ता है.

साल 2014 में बैंकों से सबको जोड़ने की मोदी की मुहिम शुरू होने के बाद से अब तक 1,26,000 बैंक एजेंट नियुक्त किए गए हैं.

इमेज कॉपीरइट EPA

शोध से पता चला है कि जिन जगहों पर ये एजेंट सक्रिय हैं, वहां घरेलू जमा में महत्वपूर्ण इजाफ़ा हुआ है.

इनसे काफ़ी सहूलियत भी होती है.

70 साल के चेतराम शर्मा को कैश मशीन से जूझना पड़ा है, लाइन में लंबा इंतज़ार करना पड़ा है और कई बार तो वे घंटों लाइन में खड़े रहे हैं.

लेकिन अब बैंक करेसपॉन्डेंट उनके दरवाज़े पर खड़ा है.

ज़्यादातर विशेषज्ञ यह मानते हैं कि ये बैंकिंग एजेंट सबको बैंकिग की सुविधा देने की मुहिम के महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. पर एजेंट आधारित बैकिंग सिस्टम की पुरानी समस्याओं को ठीक करने की ज़रूरत है.

भारत में एजेंट आधारित बैंकिंग दस साल से है. मोदी की मुहिम शुरू होने के पहले ही बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है.

पर यह व्यवस्था पूर्वी अफ़्रीका जैसे जगहों की तरह काम नही कर रहा है. ये व्यवस्था अब भी आर्थिक रूप से कामयाब और टिकाऊ होने की संघर्ष कर रही है.

दिल्ली के इंडिकस सेंटर फ़ॉर फ़ाइनेंशियल इनक्लूज़न के अर्थशास्त्री सुमिता काले कहती हैं, "इसकी एक वजह यह है कि सबको वित्तीय सुविधाएं देने की बात हमेशा से ही जनादेश रही है. इसे हमेशा बैंकों पर थोपा ही गया है."

वे आगे जोड़ती हैं, "जब भारत में कोई जनादेश होता है, वह सिर्फ़ काग़ज़ पर होता है."

गांव के ग़रीब लोग मजदूर के रूप में कमाने वाली दिहाड़ी इन बैंकों में जमा कराते हैं. इससे शहरी ग्राहकों की तुलना में गांव का व्यवसाय कम आकर्षक होता है.

काले कहती हैं, "यही वजह है कि भारत के बैंक एजेंट बैंकिंग को लेकर सही मायनों में उत्साहित कभी नहीं हुए."

वित्तीय सेवा सबको देने के मामले में सलाह देने वाली कंपनी माइक्रोसेव ने अक्टूबर 2014 से दिसंबर 2015 का अध्ययन किया.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

इसने पाया कि सरकारी कार्यक्रमों को लेकर काम करने वाले एजेंटों के बीच में ही काम छोड़ देने के मामले में "चिंताजनक" बढ़ोतरी हुई.

दिसंबर 2015 में पंजाब और महाराष्ट्र में 42 फ़ीसद बैंकिंग एजेंटों ने काम छोड़ दिया. इसकी वजह यह थी कि उन्हें बहुत ही कम कमाई हुई या नुक़सान उठाना पड़ा.

ये एजेंट बीच में काम न छोड़ें, इसके लिए ज़रूरी है कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि उन्हें अच्छा मुनाफ़ा हो.

सरकार चाहती है कि कल्याणकारी योजनाएं के पैसे सीधे खातों में जमा हो जाएं. इसी कारण वह चाहती है कि हर घर के पास एक खाता हो. सरकार का मानना है कि इससे भ्रष्टाचार कम होगा और अरबों डॉलर बचेंगे.

विशेषज्ञों का कहना है कि इन सरकारी लेनदेनों से इन एजेंटों की कमाई काफ़ी नहीं होती है और इसे बढ़ाए जाने की ज़रूरत है.

फ़िलहाल, इन्हें बतौर कमीशन लेनदेन का एक फ़ीसद और अधिकतम 10 रुपए प्रति लेनदेन मिलता है. विशेषज्ञों का कहना है कि कमीशन बढ़ा कर कम से कम 3 फ़ीसद किया जाना चाहिए.

मुनाफ़ा महत्वपूर्ण है और एजेंटों को इसी के बल पर काम करने का हौसला मिल सकता है.

Image caption इन एजेंटों के बल पर ही भुगतान बैंक ग्रामीण इलाक़ों में अपने पैर पसार पाएंगे

इसके अलावा देर से भुगतान, बैंकों का पूरा समर्थन नहीं मिलना और उनके कामकाज का पूरा प्रचार नहीं होना भी, ऐसी शिकायतें हैं, जिन्हें दूर करने की ज़रूरत है.

माइक्रोसेव के सहायक निदेशक अनिल कुमार गुप्ता कहते हैं, "गांव के ग्राहकों तक पंहुचने में काफ़ी वक़्त लगा. यह इन बैंकिंग एजेंट की मदद से ही मुमिकन हुआ."

भुगतान बैंक यानी पेमेंट बैंक जब ग्रामीण इलाक़ों में काम शुरू करेंगे, बैंकिंग करेसपॉन्डेंट व्यवसाय में महत्वपूर्ण बदलाव होंगे.

ये एजेंट सामान्य बैंक की सभी सेवाएं ग्राहकों को दे सकेंगे. उन्हें सिर्फ़ कर्ज देने की इजाज़त नहीं होगी.

काले कहती हैं, "जब यह नेटवर्क फैलेगा, आप पाएंगे कि लोग एक बैंक से दूसरे बैंक जाने लगेंगे और प्रतिस्पर्धा तेज़ हो जाएगी."

वे आगे जोड़ती हैं, "जब ऐसा होगा, आप यह उम्मीद कर सकते हैं कि नियमित बैंक भी ग्रामीण इलाकों में ये सेवाएं देने के लिए आगे आएंगे."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे

संबंधित समाचार