'हवा से सांस घुटती है लेकिन पेट की मजबूरी'

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Image caption दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बढ़ा हुआ है.

दिल्ली में प्रदूषण के कारण कोहराम मचा हुआ है. आलम ये है कि शहर में हर जगह धुंआ है, स्कूलों को बंद करना पड़ा है, भवन निर्माण पर रोक लगा दी गई है, सड़कों पर पानी छिड़का जा रहा है, लोग मास्क खरीद रहे हैं और एअर प्यूरिफ़ाइर लगा रहे हैं.

लेकिन उन लोगों का क्या जो घंटों सड़कों पर बिताते हैं. बीबीसी ने ऐसे ही कुछ लोगों से बात की.

'सांस घुटती है'

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करण की उम्र 17 साल है. दिल्ली के कनॉट प्लेस में वह जूते पॉलिश का काम करते हैं.

मेरा नाम करण कुमार है. मेरी उम्र 17 साल है. मैं सुब से शाम तक दिल्ली के कनॉट प्लेस में जूते पॉलिश करने का काम करता हूं. ये काफ़ी थका देने वाला काम है और खुले में धुएं के बीच इतने घंटे लगातार काम करना आसान नहीं है.

मैं सुबह आठ बजे से शाम सात बजे तक काम करता हूं लेकिन काम पर निर्भर करता है कि मैं यहां कितने घंटे काम करूंगा. अगर काम जल्दी हो जाता है तो जल्दी निकल जाता हूं. यहां कनॉट प्लेस में बहुत धुँआ रहता है कि लेकिन पिछले तीन दिनों में प्रदूषण से हवा का स्तर बहुत खराब हुआ है.

मेरी आंख जलने लगती है, उसमें दर्द होने लगता है. आंख में ज़्यादा दर्द होता है तो आंख मसल लेता हूं. उससे थोड़ा ठीका हो जाता है लेकिन थोड़ी देर में जलन फिर शुरू हो जाती है. ऐसा करते करते पूरा दिन निकल जाता है और फिर मैं घर चला जाता हूं.

सोचता हूं कि रुमाल या किसी कपड़े से नाक बंद कर लूं लेकिन ऐसा करने से सांस घुटने लगती है इसलिए उसे उतार लेता हूं. मम्मी पापा बोलते हैं कि चेहरे पर कुछ बांध लो लेकिन मैं नहीं बांधता हूं.

'बीमार होने का खतरा'

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उर्मिला गजरा बेचती हैं. दिल्ली की ख़राब आबोहवा का खामियाज़ा उन्हें भी भुगतना पड़ रहा है.

मेरा नाम उर्मिला मैं कनॉट प्लेस में गजरा बेचती हूं. मैं गजरा 20 रुपए में खरीदती हूं और 30 या 35 रुपए में बेचती हूं. मैं अलीगढ़ की रहने वाली हूं और पिछले डेढ़ साल से यहां गजरा बेच रही हूं.

मेरे पति बीमार हैं इसलिए मैं सुबह आठ बजे यहां गजरा बेचने आ जाती हूं और रात 11 बजे तक यहां रहती हूं. यहां बहुत धुंआ रहता है और पिछले कुछ दिनों से प्रदूषण से यहां बैठना मुश्किल हो गया है.

यहां बैठने से सांस लेने में बहुत परेशानी होती है, बीमार होने का खतरा रहता है. यहां सांस लेने में भी बहुत तकलीफ़ होती है लेकिन हम क्या कर सकते हैं. ऐसे ही बैठे रहते हैं. यहां बहुत धुंआ आता है और बहुत समस्या है.

'बस झेल रहे हैं'

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सिकंदर कान की सफाई का काम करते हैं. दिल्ली के ख़राब मौसम का असर उनकी रोज़ी-रोटी पर भी पड़ा है.

मेरा नाम सिकंदर है. मैं कान सफ़ाई का काम करता हूं. मैं ये काम 10-12 साल से कर रहा हूं. मैं राजस्थान का रहने वाला हूं. बढ़ते वायु प्रदूषण से आंखे जलने लगती हैं, ऐसा लगता है कि किसी ने आंखों में कुछ डाल दिया हो.

ऐसे में हम जैसे लोग क्या करें. मजबूरी में हम जैसे लोग बस झेल रहे हैं. मैं कभी चेहरे पर रुमाल नहीं बांधता हूं लेकिन अगर आप खाली पेट हों तो प्रदूषण शरीर में जल्दी घुसता है.

अगर आपका पेट भरा हो तो प्रदूषण का असर नहीं होता. ये नई बात है. ये बात मुझे पुराने लोगों ने बताई है जो कहते हैं कि अगर आपका पेट खाली हो तो तरह-तरह की परेशानी हो जाती है. इसलिए मैं सुबह अच्छे से खाकर आता हूं और दिन भर अच्छे से पानी पीता हूं ताकि प्रदूषण शरीर में न घुसे.

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