'मैडम जी बाबा ने नाम लिखना सीख लिया...'

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Image caption झारखंड के इस गांव में स्कूली बच्चों को प्रौढ़ शिक्षा का टास्क दिया गया है.

मान लीजिए, आप पहाड़ों-जंगलों से घिरे किसी आदिवासी गांव के स्कूल में सुबह पहुंचे और बच्चे चहकते हुए यह कहते सुने जाएं कि मैडम जी, बाबा (पिता) ने नाम लिखना सीख लिया, तो आप चौंकेंगे ना?

लेकिन हक़ीक़त से रूबरू होते ही आप मुस्कराए बिना रह नहीं पाएंगे. दरअसल झारखंड के एक सुदूर गांव धुसरा में स्कूली बच्चों को गांव (घर के बड़े-बूढ़ों) को साक्षर बनाने के ज़िम्मा दिया जा रहा है.

अब बच्चे हंसते-खेलते ये काम पूरा कर लें और उन्हें डांट ना सुननी पड़े, इस ख्याल से ठेपा (अंगूठा) लगाने वाले बड़े-बूढ़ों ने भी स्लेट-कॉपियां थाम ली हैं. इस अभियान को कारगर बनाने में जुटे हैं स्थानीय अधिकारी, शिक्षक-शिक्षिकाएं, ग्राम प्रधान, पंचायत प्रतिनिधि और गांव के तरक़्क़ी पसंद लोग.

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Image caption धुसरा गांव की आबादी लगभग 1100 है और खेती-बाड़ी, मजदूरी पर लोग आश्रित हैं.

मनोदा सोरेन को इस बात की खुशी है कि पांचवीं में पढ़ने वाले उनके बेटे ने मां-बाबा, दोनों को नाम लिखना सिखा दिया है और अब अक्षर ज्ञान की कोशिशें जारी हैं.

हालांकि, मनोदा सीखने वालों में अकेले भी नहीं. गांव के कई लोग सरेराह ग्राम प्रधान, राशन डीलर को बताने लगे हैं कि होशियार, अब उनके नाम पर ठेपा लगाकर कोई दूसरा लाभ नहीं उठा सकता.

जमशेदपुर जिले में पटमदा के प्रखंड विकास पदाधिकारी सच्चिदानंद महतो बताते हैं कि मकसद एक ही है. साक्षरता के लिहाज़ से पूरे ब्लॉक के सबसे फिसड्डी इस आदिवासी बहुल गांव में लोग अंगूठे को अंगूठा दिखा सकें.

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Image caption धुसरा में 41 फीसदी पुरुष और महज 26 फीसदी महिलाएं साक्षर हैं.

धुसरा गांव की आबादी लगभग 1,100 है और खेती-बाड़ी, मजदूरी पर लोग आश्रित हैं. बीडीओ बताते हैं कि यहां 41 फीसदी पुरुष और महज 26 फीसदी महिलाएं साक्षर हैं. जबकि पूरे ब्लॉक का साक्षरता दर 57 फीसदी है.

उनका लक्ष्य है कि 15 नवंबर तक गांव के सभी अनपढ़ लोगों को कम से कम नाम लिखने-पढ़ने के लायक बना दिया जाए. अभियान शुरू करने से पहले उन्होंने स्कूल के बच्चों संग रैली निकाली.

पंचायत प्रतिनिधियों, स्कूल की शिक्षिकाओं के साथ बैठकें करने के बाद ग्रामीणों के साथ संकल्प सभाएं की. इस अभियान में जिला जनसंपर्क अधिकारी संजय कुमार भी शामिल हुए, जिन्होंने हाल ही में जमशेदपुर में तिरिंग गांव की पहचान बेटियों के नाम पर दिलाई है.

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Image caption 15 नवंबर तक गांव के सभी अनपढ़ लोगों को साक्षर बनाने का लक्ष्य रखा गया है.

तिरिंग गांव के हर घरों की दीवारों पर बेटियों के नेम प्लेट लगवाए गए हैं और उनमें उनकी माता का नाम भी दर्ज है. संजय कुमार कहते हैं इन अभियानों से गांवों को सशक्त बनाने के रास्ते आसान किए जा सकते हैं.

धुसरा स्कूल की शिक्षिका राधा कुमारी बताती हैं कि बच्चों को क्लास के होमवर्क के अलावा अलग से ज़िम्मेदारी दी जाती है कि वे माता- पिता के साथ अनपढ़ पड़ोसियों को भी नाम लिखना-पढ़ना सिखाएं.

इसके लिए अधिकारियों द्वारा बच्चों और ग्रामीणों के बीच अलग से कॉपी कलम, पेंसिल, किताबें बांटी गई है. कॉपी में बड़े-बड़े अक्षरों से उन लोगों के नाम लिख दिए जाते हैं और बच्चे उसी ढंग से बड़े-बूढ़ों से लिखवाते हैं.

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वो कहती है, "वह दिन दूर नहीं, जब ग्रामीण, बच्चों का दाखिला कराने या बैठकों में शामिल होने आएंगे, तो अंगूठा नहीं लगाएंगे."

गांव की साक्षर महिला अनुराधा बताती हैं कि बच्चों की वो कॉपियां मास्टरनी जी नियमित तौर पर चेक करती हैं, लिहाज़ा स्कूल से लौटते ही बच्चे यह याद कराना नहीं भूलते कि बाबा सुबह खेत चले जाओगे, इसलिए अभी बैठ जाएं हमारे साथ.

फिर जब- तब टीचर और बीडीओ साहब दरवाजे पर पहुंच जाते हैं. और शुरू हो जाती है पूछताछ. अनुराधा बताती हैं उनकी सास ने भी अब नाम लिखना सीख लिया है.

वहीं गांव के स्कूल जाने वाले छात्र-छात्राएं उन बच्चों को भी अब स्कूल चलने पर ज़ोर दे रहे हैं, जो गांव की गलियों में कित-कित, गुच्चू खेलते नजर आते हैं. छात्रा नंदनी कहती हैं कि घूंघटें ही सही, गांव की महिलाएं अब लिखती-पढ़ती मिल जाएंगी.

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धुसरा के ग्राम प्रधान गंगाधर सिंह इस मुहिम में खासी दिलचस्पी ले रहे हैं. वे बताते हैं कि ग्राम सभा की बैठकें, राशन वितरण का मामला हो या स्कूल की बैठकें, रजिस्टर में ठेपा (अंगूठा) ही ज्यादा लगते रहे हैं.

कई मौके पर ग्रामीणों की शिकायतें रहती कि उन्होंने ठेपा तो लगाया ही नहीं था फिर उनके नाम के निशान कैसै लग गए. लगता है ये अब खत्म होगा. गांववालों का मानना है कि खांटी गंवई मिजाज़ के बड़े-बूढ़ों को उम्र के इस दहलीज पर बच्चों संग लिखना-पढ़ना नागवार भी गुजरता है, लेकिन बीडीओ साहब खुद क्लास लगाने पहुंच जाते हैं, तब उन्हें बैठना ही पड़ता है.

हरिहर सिंह चाहते हैं कि इस अभियान से गांव के बेरोजगार युवकों को सरकार मानदेय देकर जोड़े, तो अच्छा होगा. गांव के हरिहर टुडू कहते हैं कि दो महीने पहले शुरू हुए इस अभियान के परिणाम अच्छे हैं.

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