डीयू और जेएनयू की प्रोफेसर पर हत्या का मामला दर्ज

इमेज कॉपीरइट Bhoomkal Samachar

छत्तीसगढ़ के बस्तर में पुलिस ने दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर नंदिनी सुंदर और जेएनयू की प्रोफ़ेसर अर्चना प्रसाद समेत छह लोगों के ख़िलाफ़ एक ग्रामीण की हत्या का मामला दर्ज़ किया है.

पुलिस के अनुसार दरभा क्षेत्र के ग्राम नामा में शुक्रवार की रात संदिग्ध माओवादियों ने सामनाथ बघेल की हत्या कर दी थी.

सामनाथ बघेल ने अपने गांव के लोगों के साथ मिलकर माओवादियों के ख़िलाफ़ टंगिया ग्रुप बनाया था.

इमेज कॉपीरइट Bhoomkal Samachar
Image caption सामनाथ बघेल की पत्नी के साथ पुलिस अधिकारी

पुलिस के एक अधिकारी ने बताया, "सामनाथ बघेल की पत्नी की शिकायत पर तोंगपाल थाने में प्रोफ़ेसर नंदिनी सुन्दर, प्रोफ़ेसर अर्चना प्रसाद, सीपीएम नेता संजय पराते, विनीत तिवारी, मंजू कवासी और मंगल राम कर्मा के ख़िलाफ़ 302, 120बी, 147, 148, 149 ,452 और 25, 27 आर्म्स एक्ट के तहत अपराध दर्ज किया गया है."

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता संजय पराते ने इन आरोपों का खंडन किया है.

इमेज कॉपीरइट SANJAY PARATE
Image caption मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता संजय पराते

संजय पराते ने कहा, "बस्तर की पुलिस जनवादी ताक़तों और बस्तर में शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों को इस तरह के झूठे मामले में फंसाने का षडयंत्र रच रही है. लेकिन हम ऐसी कोशिशों से डरने वाले नहीं हैं."

इस साल मई में नंदिनी सुंदर समेत दूसरे लोगों ने सौतनार, नामा और कुमाकोलेंग का दौरा किया था.

सामनाथ समेत दूसरे ग्रामीणों ने कथित रूप से पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि नंदिनी सुंदर और दूसरे लोगों ने ग्रामीणों को पुलिस के ख़िलाफ़ भड़काया और माओवादियों का साथ देने के लिए ग्रामीणों को उकसाया.

इमेज कॉपीरइट SANJAY PARATE
Image caption प्रोफ़ेसर नंदिनी सुंदर और संजय पराते के साथ अन्य लोग

हालांकि नंदिनी सुंदर और दूसरे लोगों ने इन आरोपों को झूठा बताया था.

पिछले दो दशक से बस्तर में अकादमिक शोध करने वाली नंदिनी सुंदर ने बस्तर के नृविज्ञान, इतिहास, संस्कृति और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को लेकर कई किताबें लिखीं हैं.

इसके अलावा उन्होंने बस्तर के आदिवासियों से जुड़े कई मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं भी दायर की हैं.

नंदिनी सुंदर की याचिका पर ही कथित रूप से माओवादियों के ख़िलाफ़ सरकार के संरक्षण में चलने वाले हथियारबंद आंदोलन सलवा जुड़ूम को सुप्रीम कोर्ट ने बंद करने का निर्देश दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की कड़ी आलोचना की थी कि उसने आदिवासियों को निजी सेना की तरह हथियार थमा दिए थे और उन्हें ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से कथित रूप से माओवादियों के ख़िलाफ़ युद्ध के मैदान में धकेल दिया था.

इमेज कॉपीरइट Bhoomkal Samachar

इसके अलावा पिछले महीने ही सीबीआई ने नंदिनी सुंदर की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अपनी एक रिपोर्ट पेश की थी, जिससे मुताबिक साल 2011 में ताड़मेटला गांव में विशेष पुलिस अधिकारियों ने 252 आदिवासियों के घर जला दिए थे.

इसके अलावा इन गांवों में कुछ लोगों की हत्या और बलात्कार की घटनाएं सामने आई थीं.

इसके बाद पुलिस महानिदेशक ने दोषी विशेष पुलिस अधिकारियों को लाइन अटैच करने और उनकी बर्खास्तगी के आदेश दिए थे.

इसके खिलाफ़ वर्दीधारी पुलिस जवानों ने नंदिनी सुंदर और दूसरे सामाजिक और राजनीतिक लोगों के पुतला जलाए थे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)