जेब में नोट फिर भी भूखा रहने को मजबूर यह बच्चा!

ब्लड कैंसर से पीड़ित दस साल के अपने बच्चे को लेकर महावीर सिंह उत्तर प्रदेश के जेवर से दिल्ली के एम्स अस्पताल आए हुए हैं. वो पिछले 18 तारीख़ से अपने बच्चे को लेकर एम्स में हैं.

लेकिन आज यह बच्चा सुबह से भूखा है. उसने सिर्फ़ चाय पी है.

इस बच्चे की दादी का कहना हैं, "सुबह से पांच सौ का नोट कोई नहीं ले रहा है जिस कारण से खाने के लिए कुछ नहीं ख़रीद पा रहे हैं. बच्चे को भूखा रहना पड़ रहा है. अब खुले पैसे ही नहीं है कि बच्चे के लिए कुछ खाने को ख़रीद लाएं."

बच्चे के मामा जोगेन्द्र चौहान बताते हैं कि बच्चे का इलाज तो चल रहा है लेकिन 500 और 1000 के नोट बंद करने के सरकार के फ़ैसले से दवाई वग़ैरह ख़रीदने में बड़ी परेशानी हो रही है.

Image caption महावीर सिंह

वो बताते हैं, "दवाई के लिए मेडिकल स्टोर जाने पर कोई 500 और 1000 के नोट नहीं ले रहा है जिससे काफ़ी दिक्क़तें आ रही हैं. मेडिकल स्टोर वालों का कहना है कि जिन दुकानों का सरकारी अस्पताल के साथ संबंध है सिर्फ़ वहीं ये नोट ले सकते हैं. हम निजी दुकान वाले नहीं ले सकते हैं."

जोगेन्द्र चौहान घर से दूर दिल्ली के एम्स अस्पताल में हैं. ऐसे में वे खाने-पीने और दूसरी चीज़ों के लिए होटल और बाज़ार पर ही निर्भर है.

वो बताते हैं, "जब हम खाने के लिए होटल पर जा रहे हैं तो वहां भी कोई नोट नहीं ले रहा है. ऑटो वाले पांच सौ का नोट होने की वजह से कही ले नहीं जा रहे हैं."

Image caption जोगेन्द्र चौहान

पांच सौ के बदले तीन सौ या चार सौ देने की बात की जा रही है. इस बात की तस्दीक़ इस बच्चे के मामा और पिता दोनों करते हैं.

बच्चे के पिता कहते हैं कि क्या करें, मजबूरी है. यही करना पड़ेगा.

वहीं बच्चे के मामा जोगेन्द्र चौहान बताते हैं, "जब मैं टेस्ट के लिए अस्पताल के अंदर बैठा हुआ था तब एक सज्जन किसी को फोन पर कह रहे थे कि कोई चार सौ के बदले पांच सौ का नोट देता है तो ले लेना."

आगे वो कहते हैं कि हमलोग बाहर से आए हैं और जो कोई भी बाहर से आया हैं वो सब बड़े नोट ही लेकर आया होगा. उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.

कैंसर से पीड़ित इस बच्चे के परीजन बच्चे को सड़क पर लेकर रहने को मजबूर हैं.

खुले पैसे के अभाव में ये लोग गुरुद्वारे से शाम में आने वाले लंगर के इंतज़ार में बैठे हुए हैं.

Image caption बच्चे की दादी

जोगेन्द्र चौहान कहते हैं, "खुले पैसे जब नहीं है तो होटल में तो खा नहीं सकते हैं इसलिए गुरुद्वारे से आने वाले लोगों का इंतज़ार करना पड़ रहा है. वो लोग गाड़ी में खाना लेकर आते हैं."

लेकिन जोगेन्द्र चौहान सरकार के इस फ़ैसले पर यह भी कहते हैं कि अगर इससे वाक़ई में भ्रष्टाचार ख़त्म होता है तो थोड़ी-बहुत परेशानी आम लोगों को झेल लेनी चाहिए.

वहीं मुरादाबाद से एम्स इलाज के लिए आए ज़ुबैर बताते हैं, "जब हम होटल पर खाने के लिए गए तो हमारे पास दो हज़ार रुपये थे लेकिन 500 और 1000 का नोट होने की वजह से होटलवाले ने खाना देने से इनकार कर दिया. मेरे पास दो सौ रुपये खुले थे जो ख़र्च हो गए. अब मेरे पास ख़र्च करने के लिए कुछ नहीं है."

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