एम्फिबियन विमान भारत के लिए कितना अहम?

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भारत और जापान के बीच कई साल से लटके 1.6 अरब डॉलर के एम्फीबियन विमान सौदे के अंजाम तक पहुंचने की उम्मीद है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों जापान यात्रा पर हैं. वे जापान के प्रधानमंत्री के साथ मिलकर सौदे को अंतिम रूप देंगे.

एम्फीबियन विमान ज़मीन ही नहीं, पानी पर भी उतर सकते हैं, और उड़ान भी भर सकते हैं.

नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के दौरान ये समझौता हुआ तो भारत जापान से 12 एम्फीबियन हवाई जहाज़ ख़रीदेगा.

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ये विमान भारत की नौसेना, तटरक्षक, फौज और सीमा सुरक्षा बल, चारों के लिए फायदेमंद होंगे. यह भारत के सुरक्षा तंत्र को मज़बूत बनाएगा और इसके दायरे को बढ़ायेगा.

जापानी कंपनी शिनमेयवा के विमान शिनमेयवा यूएस-2 को ख़रीदेने को लेकर भी बातचीत साल 2010 से चल रही है. उम्मीद है कि इस बार सौदा पक्का हो जाएगा.

लेकिन जहां तक समझौते पर मुहर लगाने की बात है, तो वो इस दौरे में संभव नहीं होगा. क्योंकि भारत सरकार का प्रतिनिधि समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करता.

ये सौदा पक्का तभी होगा जब रक्षा मंत्रालय के अधिकारी इस पर हस्ताक्षर करेंगे. फिलहाल सौदे पर बातचीत चल रही है. इसमें टेंडर और कीमत पर बात रुकी हुई है.

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भारत की ओर से विमानों को महंगा बताने के बाद जापान ने इनकी कीमत में कमी की है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सौदे पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे पर आश्वासन देकर आएंगे कि अगले कुछ महीनों में ये फाइनल हो जाएगा.

एम्फीबियन विमान में कुछ ऐसी बेहद खास बातें हैं जिनके कारण इस विमान सौदे पर पूरे भारत की निगाह है. शिनमेयावा कंपनी का यूस-2 विमान लंबी दूरी तक जा सकता है. इसकी रेंज लगभग 4700 किमी है.

यह किसी भी स्थिति में ज़मीन और पानी दोनों पर उतर सकता है. यह पानी पर उतरने के साथ पानी से उड़ान भी भर सकता है. भारत और जापान के बीच यदि यह समझौता हुआ तो जापान के लिए यह पहला सैन्य उपकरण होगा, जिसे वह निर्यात करेगा. भारत इसका पहला निर्यातक मुल्क होगा.

एक ख़ास बात यह है कि जापान के इस एम्फीबियन विमान में आक्रमण करने की क्षमता वाले कई उपकरण और मशीनरी हैं.

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लेकिन भारत इसका इस्तेमाल अपने आक्रमण या युद्ध संबंधी गतिविधियों में नहीं कर सकता. ऐसा इसलिए क्योंकि आक्रमण और युद्धक उपकरण भारत को नहीं दिए जाएंगे.

फिर भी भारत के लिए ये विमान बेहद महत्वपूर्ण हैं. क्योंकि इससे भारतीय फौज, नौसेना की पहुंच यानी दायरा बढ़ेगा और बेहतर होगा.

इस सौदे के बाद हिंद महासागर क्षेत्र में भारत को फायदा होगा. इस क्षेत्र में नियंत्रण को लेकर भारत और चीन के बीच दबाव की स्थिति रहती है.

इन विमानों का दायरा अधिक होता है और इनमें किसी भी हालात में काम करने की क्षमता होती है.

ऐसी क्षमता वाले विमान इस क्षेत्र में न तो चीन के पास हैं, न ही इस क्षेत्र के दूसरे देशों के पास.

साथ ही सौदे पर होने वाली बैठक में विमानों को बनाने का लाइसेंस भारत को देने की बात होगी. यदि ऐसा हुआ तो भारत ऐसे विमान दूसरे मुल्कों को भी निर्यात कर सकता है.

इस सौदे पर चीन की नज़र

चीन का कहना है कि ये भारत-जापान का आपसी मसला है. लेकिन ये कहा जा सकता है कि भारत इन विमानों का प्रयोग किसी भी तरह के आक्रमण जैसे मक़सद के लिए नहीं कर सकता.

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Image caption चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ भारतीय प्रधानमंत्री मोदी.

जापानी एम्फीबियन विमान अनआर्म्ड होने के कारण इनका इस्तेमाल ज्यादातर सहायता और बचाव कार्य में होगा. जैसे पहले सूनामी के समय हुआ था.

उदाहरण के लिए यदि भारत का कोई जहाज हिंद महासागर में है और भारत से वह तीन-चार दिन दूर है. इसमें कुछ गड़बड़ी आने पर ये विमान फटाफट स्पेयर पार्ट पहुंचा सकते हैं.

चीन उन सभी सौदों को शक़ की नज़र से देखता है जो भारत दूसरे देशों से करता है. जापान, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच बने गठजोड़ से चीन बेहद फिक्रमंद है.

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)

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