काला धन: सियासी दल बग़ैर ऑक्सीजन के?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काले धन के ख़िलाफ़ कदम उठाने के बाद केंद्र सरकार और विपक्ष में बुरी तरह ठन गई है.

सरकार कहती है इस क़दम से बाज़ार से काला धन निकल जाएगा. विपक्ष का कहना है कि काले धन के ख़िलाफ़ वो भी हैं, लेकिन मोदी सरकार के इस क़दम से आम लोग परेशान हैं.

समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के अनुसार ये क़दम इमरजेंसी के समय की याद दिलाता है. वहीं बहुजन समाज पार्टी की मायावती कहती हैं कि ये वित्तीय आपात स्थिति जैसा है. क्या विपक्षी दलों के विरोध में दम है?

अब तक देश की सभी पार्टियां भ्रष्टाचार और ब्लैक मनी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती रही हैं, लेकिन इसके बावजूद चुनावों में काले धन का अंधाधुंध इस्तेमाल होता रहा है.

भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के रामनाथ झा कहते हैं कि चुनावों में काले धन का इस्तेमाल खूब होता है.

उन्होंने कहा, "सरकार के ताज़ा क़दम से चुनावों में धन लगाने, चुनावी मुहिम के दौरान पैसे खर्च करने और उम्मीदवारों को पार्टी के ज़रिए दिए गए पैसों पर काफी असर पड़ेगा."

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Image caption पुराने नोटों पर पाबंदी

मायावती का तर्क है कि भारतीय जनता पार्टी ने मोदी सरकार के ऐलान के पहले चुनावी फंड, विदेश में जमा कर दिया है.

तो क्या मायावती का आरोप परोक्ष रूप से स्वीकृति भी है कि सियासी दल चुनावों की फंडिंग में काले धन का इस्तेमाल करते हैं?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी इल्ज़ाम लगाया है कि भाजपा ने पुराने नोटों पर पाबंदी से पहले इसे ठिकाने लगा दिया है.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने तंज़ के अंदाज़ में कहा है कि मोदी सरकार के इस फ़ैसले के बाद कुछ राजनीतिक पार्टियां ज़रूर ग़रीब हो गई हैं.

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ के एक अध्ययन के अनुसार 2014 की तमाम चुनावी प्रक्रिया में 30 हज़ार करोड़ रुपये खर्च किये गए, जो देश के इतिहास का सबसे महंगा चुनाव साबित हुआ.

इसमें केंद्र सरकार और चुनाव आयोग ने सात से आठ हज़ार करोड़ रुपये खर्च किये थे. इसका अर्थ ये हुआ कि चुनाव में हुआ 75 फ़ीसद खर्च, काले धन से पूरा किया गया.

चुनाव आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार 2014 के आम चुनाव के दौरान 300 करोड़ रुपये की अवैध राशि ज़ब्त की गई, जबकि 17 हज़ार किलोग्राम नशीले पदार्थ पकड़े गए.

रामनाथ झा कहते हैं कि चुनाव में काले धन का इस्तेमाल कितना है, इसका सही से पता लगाना मुश्किल है, लेकिन ये एक गंभीर समस्या है. इसका थोड़ा बहुत अंदाज़ा 2014 के आम चुनाव में उम्मीदवारों के ज़रिए हुए खर्च से लगाया जा सकता है.

एक उम्मीदवार ने औसतन 40.30 लाख रुपये खर्च की घोषणा की. ये हर उम्मीदवार पर चुनाव आयोग के ज़रिए खर्च की सीमा से 59 प्रतिशत कम थे. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि हर उम्मीदवार ने औसतन 20 करोड़ रुपये खर्च किये थे. इस खर्च में 'कैश फॉर वोट' जैसे मामले भी शामिल थे.

सार्वजनिक किए गए आंकड़ों के मुताबिक़ 2009 के आम चुनाव में बड़ी पार्टियों ने 138 उम्मीदवारों को औसतन 14.19 करोड़ रुपये दिए थे.

इनमें से केवल 75 उम्मीदवारों ने ये बताया कि उन्हें उनकी पार्टी से पैसे मिले हैं. लेकिन उन्होंने औसतन 7.46 करोड़ रुपये घोषित किए. विशेषज्ञों के अनुसार इससे साफ़ होता है कि पार्टियों और उम्मीदवारों ने काले धन का खूब इस्तेमाल किया.

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रामनाथ झा कहते हैं कि विधि आयोग ने हाल में अपनी 255वीं रिपोर्ट में चुनाव सुधार की सिफारिश की थी, जिसमें काले धन के इस्तेमाल की रोकथाम पर ज़ोर दिया गया था.

अगले साल उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं. चुनावों पर नज़र रखने वालों का कहना है कि इन चुनावों में काले धन पर सरकार के अंकुश से सियासी पार्टियों को एक बड़ा झटका लगा है.

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