ग़रीब ही सबसे ज़्यादा क्यों सहें इसकी मार?

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करेंसी नोटों पर रोक लगने के तीसरे दिन, शुक्रवार को भी, बैंक और एटीएम के सामने लंबी क़तारें लगी रहीं, परेशान और चिंतित लोग 500 और 1000 रूपयों के पुराने नोट बदलने और छोटे नोट हासिल करने की कोशिश करते नज़र आए.

सरकार के बड़े-बड़े दावों और वादों की तो दूर, बैंकों और एटीएम में कैश तेज़ी से खत्म हो जा रहे हैं और लोगों के न रुकने वाले काम भी थमे पड़े हैं. कैश विड्राव करने की सीमा ने मसले को और पेचीदा बना दिया है.

लोगों के अंतिम संस्कार के लिए पैसे न जुटा पाने और अस्पताल और डाक्टरों की फ़ीस जमा न कर पाने की कहानियां सामने आ रही हैं.

मैं जहां कभी भी गया वहां लोग रोज़मर्रा के कामों के लिए भी पैसे न हो पाने की मजबूरी की बाते कहते और कुढ़ते मिले.

मैं ख़ुद के साथ हुआ वाक़या बताता हूं, जब मेरे एक भले पड़ोसी ने अपने कार्ड का इस्तेमाल कर मुझे 400 रूपये दिए, शायद मेरे चेहरे पर आ गए परेशानी के भाव को देखने के बाद. एटीएम मशीन ने मेरा कार्ड एक्सेप्ट करने से मना कर दिया था.

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दोस्त और साथ काम करने वाले एक दूसरे को उधार देकर मदद करने की कोशिश कर रहे हैं. कैश से ख़ाली बैंकों और एटीएम के बार-बार चक्कर काटने के बाद लोग जैसे दुआओं के सहारे जी रहे हैं.

टैक्स देने वाले ईमानदार कर्मचारियों और कम आय वाले जहां मुश्किलों से दो-चार हैं, वहीं एक तबक़ा फ़ैसले का धता बताते हुए पास पड़े धन से सोना और सामान ख़रीदने का रास्ता तलाश रहा है, जिनकों वो बाद में बेचकर नफ़ा बना सके.

एक ऐसे देश में जो भ्रष्टाचार के दलदल में गले तक डूबा हुआ, नए-नए आइडियाज़ की कोई कमी नहीं है.

दिल्ली एनसीआर इलाक़े के एक मोबाइल दुकान के मालिक ने मुझे कि एक आदमी तीस लाख रुपये लेकर आया और दुकान में मौजूद सारे आईफ़ोन ख़रीदने की पेशकश की.

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बिहार के नेता एक गहने की दुकान में गए और दो करोड़ रुपये के सोने के गहने ख़रीद लिए. कोलकाता में डेंगू के एक मरीज़ ने अस्पताल के चालीस हज़ार रुपये के बिल का भुगतान कथित तौर पर सिक्कों में अदा किया.

'डिस्काउंट घोटाले' भी जारी हैं. कुछ लोग पुराने 500 और 1000 के नोटों को कम क़ीमत पर बदलने के काम में लग गए हैं.

पुराने बेकार हो गए नोटों को कम क़ीमत पर ख़रीदा जा रहा है. कहा जा रहा है कि बाद में टैक्स देकर भी वो मुनाफ़े में रहेंगे.

दिल्ली के एक बिल्डर ने दिहाड़ी के अपने मजदूरों को एडवांस में ही दो साल की मज़दूरी पुराने नोट की शक्ल में थमा दी है. अब ये मज़दूरों की सिरदर्दी है कि वो नोटों से नए नोट कैसे हासिल कर सके.

कुछ लोग पुराने नोटों को ठिकाने लगाने के लिए दोस्तों और रिश्तेदारों से पूछ रहे हैं कि क्यो वो ये पैसे उनके अकाउंट में जमा करवा सकते हैं.

और सबसे दिलचस्प वाक़या तो ये है कि एक डॉक्टर का जिसके घर में कुछ कैश पड़े थे, उन्होंने सोचा बैंक में जमा करवा देंगे, तभी उन्हें पता चला कि उनकी बीवी के पास तो उनसे छह गुणा ज्यादा कैश घर में रख छोड़ा है.

रिज़र्व बैंक ने आश्वस्त किया था कि नए नोटों का बड़े पैमाने पर बंदोबस्त कर लिया गया है और लोगों को दिक्क़त नहीं पेश होगी लेकिन बैंकों में कैश तेज़ी स ख़त्म हो जा रहे हैं. इससे अंदाज़ा लग सकता है कि दूर-दराज़ के गांवों में क्या हालत होगी.

अगर बैंक जल्दी से जल्दी कैश का बंदोबस्त नहीं कर सके तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के - 'क्रांतिकारी क़दम' की हवा निकल जाएगी.

चंद महीनों में पंजाब और उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं. बीजेपी इस तैयारी में है कि इस फ़ैसले को काले धने के ख़िलाफ़ एक कारगर लड़ाई के रूप में पेश करे. लेकिन पार्टी को उपजे हालात में लेने के देने भी पड़ सकते हैं.

ये जो हालात पैदा हो रहे हैं उसकी एर बड़ी वजह है भारत में बड़े पैमाने पर कैश का इस्तेमाल. नब्बे फ़ीसदी लेन-देन यहां नक़द पैसे से होता है.

भारत में जीडीपी का 12 फ़ीसदी नकद रक़म के रूप में मौजूद है जो कि ब्राज़ील, मेक्सिको और दक्षिण अफ़्रीका से चार गुणा ज्यादा है.

आधे से ज्यादा भारतीयों के पास अभी भी अपना बैंक अकाउंट नहीं है और तीस करोड़ लोगों के पास किसी तरह का कोई सरकारी पहचान पत्र नहीं है.

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Image caption एटीएम के बाहर लगी क़तार.

बाज़ार में मौजूद नक़दी का 85 फ़ीसद 500 और 1000 के नोट की शक्ल में है.

टैक्स से बचने के लिए भी कुछ लोग बड़े पैमाने पर कैश रखते हैं. इसमें राजनेता, बिल्डर, डॉक्टर, वकील और सफेदपोश शामिल हैं. काला धन संपत्ति, रियल एसटेट और गहनों के रूप में मौजूद है.

इसके अलावा देश के बाहर बैंकों में भी बड़े पैमाने पर काला धन जमा है.

एक अनुमान के मुताबिक़ भारत के काले धन की अर्थव्यवस्था यहां की जीडीपी से 20 फ़ीसदी ज्यादा है. लेकिन किसी को नहीं पता है कि इसमें कितनी संपत्ति के रूप में है और कितनी नक़दी.

लेकिन कम आय वाले लाखों लोग को रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए नक़द की ज़रूरत होती है. कई बार इस तबक़े के लोग ऐसे इलाक़ों में रहते हैं जहां बैंक नहीं होते.

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फ़ैसले के समर्थकों का कहना है कि कुछ दिनों की अफ़रा-तफ़री तो होगी लेकिन काला धन पर कंट्रोल पाया जा सकेगा. लेकिन बहुत सारे लोग सवाल कर रहे हैं कि टैक्स देने वाले ईमानदार और गरीब लोग ही सबसे ज्यादा क्यों इसकी मार सहें?

भारत में इससे पहले दो बार 1946 और 1978 में बड़े नोटों को बंद किया जा चुका है.

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