मूंछ पर मोमबत्ती जलाकर नाचने वाला

इमेज कॉपीरइट Samiratmaj Mishra
Image caption राजेंद्र तिवारी उर्फ़ दुकान जी

इलाहाबाद के दारागंज में रहने वाले ये हैं राजेंद्र तिवारी उर्फ़ दुकान जी. ये अपनी मूंछ पर मोमबत्ती जलाकर संगीत की विभिन्न धुनों पर नृत्य करते हैं.

अपनी इस कला का प्रदर्शन वो देश-विदेश में कई जगह कर चुके हैं. साल 1988 से ही इस कला का प्रदर्शन कर रहे हैं और उनका दावा है कि इस कला के वो अकेले कलाकार हैं.

हालांकि, दुकान जी चाहते हैं कि इस कला को मान्यता मिले और नए लोग भी ऐसा करें, लेकिन वो कहते हैं कि नई पीढ़ी में उन्हें इसे लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखती.

दुकानजी बताते हैं कि इसकी प्रेरणा उन्हें किसी साधु से मिली और तब से लेकर अब तक उन्होंने अपनी बड़ी और घनी दाढ़ी-मूंछ कभी काटी नहीं.

यही नहीं, इस कला के प्रदर्शन के लिए उन्हें अपने सभी दांत निकलवाने पड़े हैं.

इस कला को किसी और को सिखाने का प्रयास ना करने की बात पर वो कहते हैं, "कला के प्रति लोगों का रुझान अब पहले जैसा नहीं रहा. वो भी मूंछ-नर्तन के क्षेत्र में आज के बच्चे कोई स्कोप नहीं देख रहे हैं, इसलिए कोई सीखने की इच्छा भी नहीं जताता, ख़ासकर तब जब वो मेरा हाल देखते हैं."

इमेज कॉपीरइट Samiratmaj Mishra

दुकान जी दारागंज में एक किराए के मकान में रहते हैं और इसी छोटे से कमरे में उन्होंने अपना संग्रहालय भी बना रखा है. इनकी कोशिश है कि इस संग्रहालय को यदि कोई छोटी सी जगह मिल जाए और इन्हीं चीजों को समुचित तरीके से रखा जाए तो इसे देखने वाले बहुत से लोग आएंगे.

दुकान जी के छोटे से कमरे में मुश्किल से दो-तीन लोगों के बैठने की जगह बन सकती है, लेकिन इसी कमरे में दुकान जी ने न जाने कितने देशों की दुर्लभ और ख़ास चीजें सहेज कर रखी हैं.

मिस्र, इटली, थाईलैंड, जापान, चीन और न जाने कहां-कहां की बेकार दिखने वाली चीजों को दुकान जी ने इतने करीने से सजाकर इस छोटे से कमरे में रखा है, जिससे लगता है कि पूरी दुनिया उनके इस कमरे में सिमट आई है.

इस अद्भुत संग्रहालय में तमाम जगहों से इकट्ठा किए गए शंख, मूर्तियां और देवी-देवताओं की तस्वीरें मिलेंगी, तो वहीं देशी-विदेशी शराब की तमाम पुरानी ब्रांड की बोतलें भी.

इमेज कॉपीरइट Samiratmaj Mishra

यही नहीं, दुकान जी के पास गीता और क़ुरान की बेहद छोटी प्रतियां भी हैं और इनका दावा है कि ये दुनिया की सबसे छोटी गीता और क़ुरान हैं.

दुकान जी का दावा कितना सही है, ये तो पता नहीं लेकिन महज़ दो उंगलियों के बीच ये दोनों किताबें आराम से आ जाती हैं और इन्हें पढ़ने के लिए देखने की सामान्य ताक़त रखने वाले इंसान को भी लेंस की ज़रूरत पड़ती है.

दुकान जी बताते हैं कि दोनों ही चीज़ें उन्हें कई साल पहले कुंभ मेले में आए किसी व्यक्ति ने दी थी, जिसका नाम और नागरिकता अब उन्हें याद नहीं है.

इमेज कॉपीरइट Samiratmaj Mishra

दुकानजी बताते हैं, "बात 1993 की है. इधर-उधर बिखरी चीजों को देखकर मुझे लगा कि क्यों न इन्हें इस ढंग से सहेजा जाए कि बेकार दिखने और समझी जाने वाली इन चीजों को लोग देखने आएं. मेरा प्रयास तो सफल रहा, यहां मैंने तमाम दुर्लभ चीजें इकट्ठी की हैं और लोग इन्हें देखने भी आते हैं, लेकिन बिना किसी मदद के इन्हें सहेजे रखना मुश्किल हो रहा है."

इमेज कॉपीरइट Samiratmaj Mishra

उनका दावा है कि कुंभ मेले और हर साल होने वाले माघ मेले में आने वाले तमाम पर्यटक उनका संग्रहालय भी देखने आते हैं. यही नहीं, कई लोग ऐसी ही तमाम चीज़ें उन्हें देकर भी जाते हैं. दुकानजी कहते हैं कि इस संग्रहालय में ऐसी कोई चीज़ नहीं है, जिसे वो ख़रीदकर लाए हों. हर चीज़ या तो उन्हें कहीं मिल गई या फिर कोई दे गया.

इन चीजों में माचिस की तमाम तरह की डिब्बियां होंगी तो कई देशों के सिगार के नमूने. दुनिया के तमाम देशों के नए-पुराने सिक्के होंगे तो हिन्द महासागर से लेकर अरब सागर और बंगाल की खाड़ी तक से लाए गए बालू के नमूने.

यही नहीं, तमाम देशों के झंडे, तमाम तरह के डाक टिकट, बड़ी सी लौकी और कई पक्षियों के घोंसले इनके संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहे हैं.

इमेज कॉपीरइट Samiratmaj Mishra

दुकान जी बताते हैं कि दुनिया के कई देशों के लोग उनके इस संग्रहालय पर डॉक्यूमेंट्री बना चुके हैं और कई देशों की मीडिया इसे कवर कर चुकी है. तमाम अख़बारों की कटिंग और कुछ वीडियो फ़ुटेज भी हैं उनके पास है.

लेकिन इसी संग्रहालय को आगे भी सुरक्षित रखना उनके लिए मुश्किल हो रहा है.

वो कहते हैं, "शासन-प्रशासन से हमने कई बार आग्रह किया कि इसके लिए एक छोटी सी जगह मिल जाए, जहां इन दुर्लभ चीजों को सहेजा जा सके, लेकिन अभी तक कोई आश्वासन भी नहीं मिल सका है."

इमेज कॉपीरइट Samiratmaj Mishra

जिस घर में उन्होंने संग्रहालय बना रखा है वो काफी पुराना हो चुका है और इसके कारण उसे खाली करने का उन्हें नोटिस भी मिल चुका है.

दुकानजी की मुश्किल ये है कि इतने सारे सामान को लेकर कहां जाएं? और जगह न मिलने पर उनकी 25 साल की मेहनत और ये तमाम दुर्लभ और दिलचस्प चीजें बिखर जाने का डर भी सता रहा है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)