करेंसी संकट पर पत्रकार उर्मिलेश का नज़रिया

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राजनीतिक एजेंडे अपनी जगह पर होते हैं लेकिन सरकार के कामकाज का मुद्दा बिलकुल अलग होता है. कहीं न कहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूरी रणनीति तो है लेकिन उनकी सरकार के कामकाज की विचारधारा में विरोधाभास उभरकर सामने आ रहा है.

पुराने नोटों की वापसी के मुद्दे पर विपक्षी दलों के साथ सामंजस्य या समन्वय स्थापित करने की जरूरत नहीं समझी गई. प्रधानमंत्री मोदी को शायद यह लगता है कि विपक्ष को रौंदते हुए उनका चुनावी विजयी रथ सरकार के कामकाज के दौरान भी दिखाई पड़ता रहे. मुझे लगता है कि यह भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में एक नए ट्रेंड को रेखांकित करता है.

क्योंकि जब चुनाव के दौरान ये कहा जाता है कि आप कांग्रेस मुक्त भारत चाहते हैं. यह किसी राजनीतिक पार्टी के पक्ष या विपक्ष की बात नहीं है. लेकिन अगर कांग्रेस के 'कुकर्मों' की बात की जाए तो कांग्रेस के 'सुकर्मों' की बात भी करनी पड़ेगी. क्योंकि कांग्रेस का आजादी की लड़ाई में बहुत बड़ा योगदान रहा है. आप उससे इनकार नहीं कर सकते हैं.

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ऐसे में आप सिर्फ अतीत के गड़े मुर्दों को उखाड़े और कहें कि हम 70 सालों के करप्शन का हिसाब 70 महीनों में कर लेंगे तो आपको ये भी देखना होगा कि 150 साल का इतिहास क्या है. इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने से भविष्य की बेहतर बुनियाद नहीं रखी जा सकती. प्रधानमंत्री मोदी को यह बात समझनी चाहिए.

और भारतीय लोकतंत्र के लिए यह बहुत जरूरी है. प्रचंड और भारी बहुमत से जीता हुआ देश का बड़ा नेता उदार हृदय के साथ व्यापक सोच लिए सामने आए और सरकार के कामकाज के जो अहम अजेंडे हैं, उनपर ध्यान दे.

पूरी दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री और तमाम लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं कि भारत जैसा महादेश जिसके पास इतनी संभावनाएं हैं, वो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में क्यों इतना पिछड़ा है. लेकिन अगर ये सब मुद्दे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अजेंडे में नहीं हैं तो फिर मुझे दाल में कुछ काला नजर आता है.

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कहीं न कहीं उनके पूरे एजेंडे से ऐसा लगता है कि वह बदले की राजनीतिक मुहिम पर हैं. 8 नवंबर को 500 और 1000 रुपये के नोट चलन से हटाने की मोदी की घोषणा और इस पर की गई बयानबाजी को लेकर भी सवाल उठे हैं. इस तरह की भाषा किसी लोकतांत्रिक देश के चुने हुए प्रधानमंत्री की नहीं हो सकती है. इस तरह की भाषा में कोई बादशाह ही बोलता है.

जिस तरह से प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर बोल रहे हैं, उसमें लोकतंत्र की भावना गायब है. किसी विचार-विमर्श के लिए कोई जगह नहीं है. लोगों को एक साथ लेकर चलने की बात नहीं दिखाई देती. चिंता इस बात की है कि प्रचंड बहुमत के साथ चुना हुआ देश का प्रधानमंत्री कहीं लोकतंत्र की विरोधी दिशा में तो नहीं जा रहे हैं.

अब तो आम लोग भी यह कह रहे हैं कि अगर इस देश में कालेधन की समस्या इतनी ही बड़ी है तो उसके लिए देश की संपूर्ण आबादी को क्यों पीसा जा रहा है. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हर आदमी क्यों पिस रहा है. इनमें मजदूर हैं, किसान हैं, मध्य वर्ग के लोग हैं, छोटे कारोबारी हैं. ये क्यों पिस रहे हैं.

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लाखों लोगों के काम के घंटे क्यों बर्बाद किए जा रहे हैं. इस देश में विपक्षी दलों द्वारा ऐसा कोई धरना प्रदर्शन, ऐसी हड़ताल नहीं हुई है जिसमें देश को स्थगित कर दिया गया हो. ऐसा भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए भी कभी नहीं किया था जिस तरह से इस बार मौजूदा सरकार अपनी योजना को अमल में लाने के लिए कर रही है.

ऐसा लगता है जैसे पूरा भारत ठहर सा गया है. जिस तरह से इस योजना को लागू किया जा रहा है वह आम लोगों के लिए बेहद परेशानी भरा है. लोग अस्पतालों में मर रहे हैं क्योंकि वहां करेंसी नोट तो हैं लेकिन वह लिए नहीं जा रहे हैं. प्राइवेट अस्पतालों में कोई सुनवाई नहीं हो रही है. इस पर प्रधानमंत्री मोदी को विचार करना चाहिए.

किसी भी देश में समस्याओं को हल करने में पूरे मंत्रिमंडल को विचार करना चाहिए न कि किसी व्यक्ति विशेष का. विपक्ष भी सरकार के कामकाज का एक पक्ष होता है. उसकी बात भी सुनी जानी चाहिए.

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Image caption बैंक के बाहर कतारों में खड़े लोग

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)

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