'कमर टूट जाएगी माओवादियों की'

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सरकार के पांच सौ और हज़ार रुपये के पुराने नोट बंद किए जाने के फ़ैसले का माओवादियों पर गहरा असर होगा. छत्तीसगढ़ पुलिस का दावा है कि इससे माओवादियों की कमर टूटने वाली है.

छत्तीसगढ़ में विशेष पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी का कहना है कि पिछले साल या इस साल माओवादियों से लेवी के रूप में जो रकम वसूली गई होगी, उस पर यह कड़ा प्रहार है.

अवस्थी कहते हैं, "लेवी में वसूली गई रक़म से ही माओवादियों का पूरा साम्राज्य चलता है. पांच सौ औऱ हज़ार रुपये के पुराने नोट बंद होने का दूरगामी परिणाम होंगे और नक्सलियों को आर्थिक रूप से काफी नुकसान उठाना पड़ेगा."

छत्तीसगढ़ के 27 में से 16 ज़िले माओवाद से प्रभावित हैं. बस्तर के सात ज़िलों में तो सरकार भी मानती है कि कई इलाकों में माओवादियों की समानांतर सरकार चलती है.

माओवादियों की इस सरकार का राशन-पानी, दवा-दारू, गोला-बारुद और तमाम तरह के खर्चों का इंतजाम लेवी के रूप में वसूले गये करोड़ों रुपये से होता है.

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इस बात से कोई इंकार नहीं कि नेता और सरकारी अफ़सरों से लेकर तेंदू-पत्ता और खनिज व्यापारी तथा अलग-अलग तरह के ठेकेदार अपने काम के एवज़ में माओवादियों को पैसा देते हैं. यह रकम करोड़ों में होती है.

इसी साल मई में लोकसभा में एक शोध के हवाले से सरकार ने दावा किया था कि देश भर में माओवादी 140 करोड़ रुपये की लेवी वसूलते हैं. लेकिन छत्तीसगढ़ पुलिस का दावा है कि अकेले बस्तर में माओवादी 1500 करोड़ रुपये की वसूली करते हैं.

माओवादी मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार रुचिर गर्ग बताते हैं कि माओवादी लेवी के रुप में वसूले गये रुपयों को जंगल में सुरक्षित ज़मीन के भीतर गाड़ कर रखते हैं. फिर उसका कुछ हिस्सा अपनी पीठ पर लेकर घूमते हैं.

ज़ाहिर है, ज़मीन के भीतर गाड़ने या पीठ पर लेकर घूमने के लिये पांच सौ या हज़ार के नोट सुविधाजनक होते हैं. लेकिन अब सरकार की ओर से पुराने नोटों को बंद किये जाने से माओवादियों का यह खजाना खतरे में पड़ गया है.

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Image caption माओवादी मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार रुचिर गर्ग

रुचिर गर्ग कहते हैं, "यह स्थिति एक तरफ़ सुरक्षा बलों के लिये अवसर है और दूसरी तरफ़ उनके लिये सतर्क रहने का कारण भी. माओवादी अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिये अपने इलाके के लोगों पर दबाव बनाएंगे. वे बड़ी ज़रूरतों के लिये बैंकों और एटीएम को भी निशाना बना सकते हैं."

रुचिर गर्ग का कहना है कि माओवादियों को अपने इलाके के आम लोगों से छोटे नोट तो मिलते हैं लेकिन उन्हें बड़े नोटों की भी ज़रूरत होगी ही. ऐसे में अब माओवादी बड़े नोटों को हासिल करने की रणनीति पर काम करेंगे.

हालांकि दंतेवाड़ा से छपने वाले अख़बार इंपैक्ट के संपादक सुरेश महापात्र का कुछ और मानना है. वे कहते हैं कि माओवादियों के कामकाज का जो तरीक़ा है, उसमें माओवादी नए सिरे से वसूली करेंगे और फिर से अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत कर लेंगे.

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सुरेश महापात्र कहते हैं, "बस्तर के आईजी पुलिस शिवराम प्रसाद कल्लूरी का दावा है कि माओवादियों ने बस्तर में साढ़े सात हज़ार करोड़ रुपये बस्तर के जंगलों में दबा कर रखे हैं."

उनका कहना है, "लेकिन ये रुपये आते कहां से हैं, इस पर जब तक ध्यान नहीं दिया जाएगा, और जब तक रोक नहीं लगेगी, तब तक माओवादियों को स्थाई रूप से कोई आर्थिक नुकसान होगा, इस बात में मुझे शक़ है."

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