नोटबंदी से संकट में पड़ेगी अर्थव्यवस्था: कौशिक बासु

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Image caption ब्लैक मनी और भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए इंडिया ने 500 और 1000 के नोटों को बैन किया है

भारत में नाटकीय रूप से 500 और 1000 के नोटों को रद्द किए जाने के कदम को कौशिक बासु ने भारतीय अर्थव्यवस्था को झटका देने वाला बताया है.

विश्व बैंक के पूर्व चीफ़ इकोनॉमिस्ट कौशिक बासु ने कहा कि भारत में 500 और 1000 के रुपयों को रद्द करना अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है. प्रोफ़ेसर बासु ने कहा कि इससे फायदे की जगह व्यापक नुक़सान होगा.

पिछले हफ्ते भारत ने भ्रष्टाचार और अवैध रूप से नकदी रखने वालों को काबू में करने के लिए 500 और 1000 के पुराने नोटों को रद्द करने का फैसला किया था. लेकिन इस फ़ैसले से कम आय वाले ज़्यादातर लोग, व्यापारी और बचत करने वाले साधारण लोग जो नकदी अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं, वे बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं. सरकार के इस फैसले से बैंकों के बाहर भगदड़ की स्थिति है.

बैंकों और एटीएम के बाहर घबराए हुए लोगों की भारी भीड़ जुट रही है. ये या तो रद्द होने वाले नोटों को बदलवाने के लिए पहुंच रहे हैं या फिर अपनी ज़िंदगी चलाने के लिए पैसे निकालने के लिए आ रहे हैं. लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है. रविवार को सरकार ने कैश निकालने की सीमा बढ़ा दी थी.

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Image caption विश्व बैंक के पूर्व चीफ इकनॉमिस्ट कौशिक बासु

ख़राब अर्थव्यवस्था

बड़े नोटों को रद्द करने का फ़ैसला भ्रष्टाचार पर चोट करने के इरादे से लिया गया है. इसके साथ ही सरकार को लगता है कि इस फ़ैसले से अरबों डॉलर की बेहिसाब रकम को अर्थव्यवस्था से खींचा जा सकता है. भारत के कुल करेंसी प्रसार में इन दो नोटों की मौज़ूदगी 80 प्रतिशत से ज़्यादा है.

ऐसे में इस बदलाव से भारत की कैश संचालित अर्थव्यवस्था पर भारी ख़तरा मंडरा रहा है.

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विश्व बैंक के पूर्व चीफ़ इकनॉमिस्ट कौशिक बासु का कहना है, ''भारत में गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) अर्थव्यवस्था के लिए ठीक था लेकिन विमुद्रीकरण (नोटों का रद्द किया जाना) ठीक नहीं है. भारत की अर्थव्यवस्था काफ़ी जटिल है और इससे फायदे के मुक़ाबले व्यापक नुक़सान उठाना पड़ेगा.''

प्रोफ़ेसर बासु पूर्ववर्ती यूपीए सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार थे और अभी न्यूयॉर्क कोर्नेल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं.

प्रोफ़सर बासु का कहना है कि एक बार में सबकुछ करने के बावजूद ब्लैक मनी के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि अब इसकी मौज़ूदगी संभव नहीं है. कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस कदम का सीमित असर होगा. लोग नई करेंसी के आते ही तत्काल ब्लैक मनी ज़मा करना शुरू कर देंगे. इनका कहना है कि इसकी क़ीमत चुकानी होती है.

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Image caption बैंकों के बाहर लगी लोगों की लंबी कतार

इन अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़ सैकड़ों हज़ारों आम लोगों को पास नकदी है लेकिन यहां से ब्लैक मनी बाहर नहीं आएगी. इन्हें प्रताड़ित होने का डर है. इन्हें लगता है कि वे सामने आएंगे तो इन्हें फंसा दिया जाएगा. इन्हें नहीं पता है कि कैसे निपटना है. इसलिए यह संभव है कि कुल मनी सप्लाई में अचानक कटौती हो जाए लेकिन इसका असर अर्थव्यवस्था पर साफ दिखता है.

अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक का कहना है कि सरकार के इस कदम से साफ है कि उन्हें पूंजीवाद की समझ नहीं है.

उनका कहना है, ''आमतौर पर इस स्थिति में पूंजावादी व्यवस्था में नए बिज़नेस की ओपनिंग होती है ताकि पुरानी करेंसी को नई करेंसी में तब्दील किया जा सके. इस हालत में लोग सामने आकर प्रस्ताव देंगे कि आप मुझे 1000 का नोट दीजिए और आपको इसके बदले 800 या 700 रुपये दिए जाएंगे. इसके परिणामस्वरूप ब्लैक मनी पर काबू पाने के बजाय काले धंधों का प्रसार बढ़ता है.'

प्रभात पटनायक ने यह बात 'द वायर' न्यूज वेबसाइट में एक लेख में कही है.

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Image caption भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यतः नकदी आधारित है

हालांकि विवेक दहेजिया जैसे अर्थशास्त्री इससे असहमत हैं कि नोटों को रद्द किए जाने का कदम भारी जोख़िम भरा है.

उनका कहना था, 'भारतीय अर्थव्यवस्था का संचालन मॉनेटरी पॉलिसी के तहत हो रहा है. इसे हम इन्फ्लेशन लक्षित संचालन के रूप में जानते हैं. यदि प्रचलन की करेंसी का एक हिस्सा और डिमांड डिपॉज़िट नष्ट हो जाते हैं तो रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया इसकी पूर्ति कर सकता है. इसे अर्थशास्त्र की भाषा में ओपन मार्केट ऑपरेशन कहा जाता है. इसे इस रूप में समझ सकते हैं- मान लीजिए कि किसी व्यक्ति के स्वामित्व वाले नकदी गोदाम में आग लग जाती है और पैसे का प्रसार थम जाता है तो ऐसी स्थिति में सेंट्रल बैंक के अर्थशास्त्री पैसे का प्रसार बढ़ाने के लिए कहते हैं.''

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दहेजिया कहते हैं, 'इसी तरह किसी का बेहिसाब अवैध पैसा नष्ट होता है उसे नई करेंसी नहीं दी जाती. यह एक तात्कालिक उपाय होता है जिसमें पुराने नोटों के बदले नया नोट दिया जाता है. इसका ग्रोथ, इन्फ्लेशन और अन्य कारकों पर मीडियम और लॉन्ग टर्म का प्रभाव नहीं पड़ता. काले धन पर एक बार टैक्स से संभव है कि वह भविष्य में काले धन पर चोट करे क्योंकि आने वाले वक्त में भी विमुद्रीकरण की आशंका बनी रहती है.'' ज़ाहिर है इस पर भी लोगों की राय बंटी है कि नोटों को रद्द करना सही है या गलत.

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