नज़रिया: न बदले हालात तो खेल बदल भी सकता है

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Image caption बैंक एटीएम के बार कतारों में खड़े लोग

सरकार के फैसले के बाद सड़कों पर लोगों का कश्मकश दिख रहा है, भीड़ है, लंबी लंबी कतारे दिख रही हैं. अपना ही पैसा निकालना लोगों के लिए संभव नहीं हो पा रहा है. जाहिर है कि इससे जनता को असुविधा हो रही है और विपक्ष को एक मौका मिल गया है.

विपक्ष इस बात को उछालने, जनता और सरकार का ध्यान आकर्षित करने की पूरा कोशिश करेगा. लेकिन इसके पीछे एक और राजनीति है जिस पर अभी व्यापक बहस होना बाकी है. जब भी चुनाव होते हैं, उसमें काले धन का इस्तेमाल होता है.

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इस फैसले से लगता है कि बहुत से राजनीतिक दल प्रभावित हो रहे हैं. इस फैसले के बाद शायद उनके पास उतनी मात्रा में धन नहीं रहेगा. यह देखा जाना भी चाहिए कि सत्तारूढ़ दल किस पैमाने पर पैसा खर्च करता है. क्या चुनाव में सबके लिए बराबरी के मौके थे या नहीं. इस पर भी गौर किया जाना चाहिए.

यह कहने का मतलब कालेधन का समर्थन करना नहीं है. यह उजागर करने की कोशिश की जानी चाहिए कि इस पूरे प्रकरण के पीछे राजनीतिक मकसद है. देश जबसे उदारीकरण की राह पर चला है और तब से पैसे का दिखावा करने की प्रथा बन गई है.

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Image caption कुछ जगहों पर विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं.

इस वजह से गरीब तबका अमीरों के अनुपात में खुद को गरीब समझता है. यह किसी भी देश के लिए अच्छी बात नहीं है. इसी भावना की वजह से प्रधानमंत्री के फैसले को लेकर लोगों में जनसमर्थन है. हालांकि एक तबके में इसे लेकर रोष भी है और विपक्ष इसे भुनाने की कोशिश भी कर रहा है.

मध्यम वर्ग के कारोबारियों, ऊंचे तबके के लोगों, मध्य वर्ग के एक हिस्से में इस फैसले पर रोष होगा. लेकिन गरीब लोगों में इसे लेकर भरोसा है. इनमें वे लोग हैं, जिनके पास छोटे-छोटे मकान हैं, घर में शौचालय नहीं है. इन्हें इस बात की ज्यादा गरज नहीं है कि लोगों को क्या तकलीफ हो रही हैं और बैंकों में बड़ी-बड़ी लाइनें लगी हुई हैं.

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इस तबके ने तो जिंदगी ही काट दी लाइनों में, उसे कतार में खड़े होने से क्या डर लगेगा. उसको तो इस बात से चिढ़ होती है कि इस देश की संपदा में उसको हिस्सा नहीं मिला है. आर्थिक सुधार के दौर में जो राष्ट्रीय संपत्ति बनी है, उसमें उसे हिस्सा नहीं मिला है.

भले ही ये फैसला काले धन के छह फीसदी हिस्से को ही निशाना बनाता है, लेकिन राजनीतिक प्रक्रिया में ये ब्योरे खो जाते हैं. और बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, बड़े दावे किए जाते हैं. आज के दिन प्रधानमंत्री यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने बड़े, धनी और मजबूत लोगों के साथ लड़ाई मोल ली है.

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उन्होंने यह भी कहा कि इसके चलते उनकी जान को भी खतरा हो सकता है. लेकिन गरीब लोग देखते हैं कि उनके आस-पास इतनी समृद्धि है लेकिन इसमें उन्हें कुछ मिल नहीं रहा है. वे लोग शायद इस बहलावे में आ जाते हैं.

लेकिन इस प्रक्रिया में जिनकी आमदनी पर चोट पहुंची है, उन्हें फर्क पड़ता है. इसका दूरगामी असर कितना होता है, इसके लिए इंतजार करना होगा. लेकिन 2017 के चुनाव से पहले इसका कोई सकारात्मक नतीजा देखने को नहीं मिला तो खेल बदल भी सकता है. लेकिन अभी यह अभी कहना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी.

(वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा से रोहित जोशी की बातचीत पर आधारित)

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