एटीएम बनाने वाला भारत में पैदा हुआ था

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बैंकिंग की परिभाषा बदल देने वाले ऑटोमेटेड टेलर मशीन या एटीएम आजकल बड़े पैमाने पर ख़ाली हैं जिसकी वजह से हमारी जेबें भी ख़ाली हो गईं हैं.

लेकिन ज़रा पल भर थमकर कल्पना कीजिए कि अगर एटीएम ही ना होते, तो क्या होता? और जब दहशत कम हो, तो शुक्रिया अदा करिए एटीएम देने वाले जॉन शेफ़र्ड-बैरन का.

बैरन का जन्म उसी भारत में हुआ, जहां इन दिनों एटीएम से कामयाब होकर लौटना ओलंपिक मेडल जीतने सरीखा है.

Image caption उत्तरी लंदन के एनफील्ड में कैश डिस्पेंसर इस्तेमाल करते बैरन

बैरन का जन्म 23 जून, 1925 को शिलॉन्ग में हुआ, जो आज मेघालय में है, लेकिन तब असम का हिस्सा हुआ करता था.

स्कॉटलैंड से ताल्लुक़ रखने वाले उनके पिता उत्तरी बंगाल में चटगांव पोर्ट कमिश्नर्स के चीफ़ इंजीनियर थे.

वो साल 2010 में दुनिया छोड़ गए, लेकिन नहाते हुए उनके दिमाग़ में आए एक विचार ने इंसानी ज़िंदगी और पैसे का खेल पूरी तरह बदल दिया.

Image caption जॉन शेफ़र्ड-बैरन

साल 1967 में दुनिया की पहली एटीएम मशीन लंदन के एक बैंक में लगी. टीवी सिरीज़ 'ऑन द बसेज़' के रेग वार्ने एनफ़ील्ड में बारक्लेज़ बैंक से पैसा निकालने वाले पहले शख़्स बने. उस वक़्त इसे 'होल इन द वॉल' कहा गया.

रिज़र्व बैंक के मुताबिक़ देश भर में 56 सरकारी और निजी बैंकों के दो लाख से अधिक एटीएम हैं. इनमें एक लाख से अधिक ऑनसाइट और एक लाख से कुछ कम ऑफ़साइट एटीएम हैं.

ऑनसाइट एटीएम के मायने उन मशीनों से हैं, जो बैंक शाखा में या उसके साथ लगी हैं, जबकि ऑफ़साइट एटीएम बैंक शाखा से अलग या स्टैंडअलोन मशीनें हैं. लेकिन सभी कम पड़ने लगीं.

साल 2007 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में शेफ़र्ड बैरन ने कहा था, "दिमाग में विचार आया कि मेरे पास ब्रिटेन या दुनिया में कहीं भी पैसा निकालने का कोई तरीक़ा होना चाहिए. चॉकलेट बार देने वाली मशीन की तरह, जिसमें से चॉकलेट के बजाय पैसा निकले."

बारक्लेज़ के चीफ़ एग्ज़िक्यूटिव ने शैफ़र्ड के साथ क़रार किया और काम शुरू हो गया. तब तक प्लास्टिक कार्ड इजाद नहीं हुआ था, सो इस मशीन में चेक इस्तेमाल होते थे.

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Image caption साल 1967 में मशीन इस्तेमाल करतीं एक महिला

इन चेक में कार्बन 14 लगा होता था, जो मशीन पहचानती थी और पर्सनल आइडेंटिफ़िकेशन नंबर यानी पिन की मदद से चेक जांचती थी. मशीन उस वक़्त अधिकतम 10 पाउंड निकालती थी.

पिन चार अंकों का क्यों बना, इसका राज़ भी शैफ़र्ड ने बताया. उन्हें छह अंक वाला अपना आर्मी नंबर याद था, लेकिन पत्नी कैरोलीन ने उनकी एक नहीं चलने दी.

शैफ़र्ड ने बीबीसी को बताया था, "पत्नी ने कहा कि उसे सिर्फ़ चार अंक ही याद रहते हैं, इसलिए उसकी वजह से पिन में चार अंक ही विश्व मानक बन गए."

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