नोटबंदी की ख़बर से ऊबने का है इंतज़ार?

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क्या अब नोटबंदी की ख़बरें देख कर या पढ़ कर ऊब चुके हैं और दूसरी तरह की ख़बरें देखना और पढ़ना चाहते हैं?

शायद अभी नहीं. अभी तो लोगों की नोटबंदी से परेशानियां कम नहीं हुई हैं.

लेकिन एक सप्ताह या दस दिनों के बाद बैंकों और एटीएम के सामने से लोगों की क़तारें छोटी होने लगें तो? कैश की उपलब्धता बेहतर हो गयी तो?

तो भाई ऐसी सूरत में कुछ नहीं कहा सकता कि मीडिया का ध्यान किस खबर पर केंद्रित होगा. अगर बैंकों के सामने क़तारें कम हुईं और कोई बड़ी खबर सामने आई तो इस बात की पूरी संभावना है कि मीडिया नयी खबर पर ध्यान केंद्रित करेगी.

पिछले कुछ महीनों की घटनाओं पर नज़र डालें तो इसकी संभावना और भी पुख्ता हो जाती है.

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कश्मीर की हिंसा

जुलाई में एक कश्मीरी चरमपंथी युवा की पुलिस एनकाउंटर में होने वाली मौत से कश्मीर में हिंसा भड़की. युवा सड़कों पर आए. सुरक्षा कर्मी और पत्थर बाज़ी करने वाले युवाओं में झड़पों का एक लंबा सिलसिला शुरू हुआ.

कथित तौर पर सुरक्षा कर्मियों के पेलेट गन से दर्जनों प्रदर्शनकारियों की आँखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गयी. हुर्रियत कांफ्रेंस ने हड़ताल बुलाई जो अब भी जारी है. हिंसा के दौरान सैकड़ों कश्मीरी पंडित घाटी से भागे जो आज भी जम्मू में प्रदर्शन कर रहे हैं. घाटी में ज़मीनी सतह पर हालात बहुत बदले नहीं हैं लेकिन मीडिया आगे बढ़ चुकी है. इसकी प्राथमिकताएं अब दूसरी ख़बरें हैं

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Image caption सरहद पर तैनात भारतीय जवान

एलओसी पर झड़पें

भारत सरकार ने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के अंदर घुस कर ''चरमपंथी ठिकानों'' पर हमले का दावा किया जिसे मीडिया में सर्जिकल स्ट्राइक कहा गया. उसकी कवरेज कई दिनों तक 24 घंटे होती रही.

एलओसी पर झड़पें आज भी जारी हैं. बुधवार से पाकिस्तान के जनरल राहिल शरीफ़ ज़ोर-शोर से कह रहे हैं कि उनकी फ़ौज ने कम से कम 11 भारतीय जवानों को मार दिया है.

खबर सच हो या दावों पर आधारित हो मीडिया को पहले भी किसने रोका है इसे कवर करने से. केवल इस बार ऐसा नहीं हुआ है

यूनिफॉर्म सिविल कोड और ट्रिपल तलाक़

विधि आयोग ने जब समान नागरिक संहिता के बारे में जनता से सुझाव माँगा तो ये एक बड़ी खबर बनी.

मीडिया ने ट्रिपल तलाक की शिकार मुस्लिम महिलाओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय और उनसे जुड़ी ख़बरों को पूरी तरह से जगह दी. मामला आज भी वहीं है. ट्रिपल तलाक़ आज भी जारी है. लेकिन मीडिया के लिए अब ये खबर बासी है

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Image caption नजीब अहमद की माँ अब भी उनकी तलाश में

जेएनयू छात्र नजीब अहमद का ग़ायब होना

अक्टूबर में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र नजीब अहमद लापता हो गए. ये खबर कई दिनों तक सुर्ख़ियों में रही. विश्वविद्यालय के छात्रों से लेकर नजीब के परिवार वालों के विरोध की ख़बरें मीडिया में छायी रहीं. नजीब का पता अब तक नहीं चला है. लेकिन मीडिया में इस पर अब चर्चा नहीं हो रही है

राजदीप सरदेसाई जैसे भारतीय टेलीविज़न मीडिया के जाने माने पत्रकार अक्सर कहते सुने गए है कि वो वही ख़बरें चलाते हैं जो जनता सुनना चाहती है. मीडिया के दूसरे बड़े संपादक भी इसी तरह के दावे करते हैं. लेकिन इसकी तह तक जाएँ तो लगता है कि अगर कोई मुद्दा अधिक तूल पकड़ता है तो मीडिया अक्सर इससे ऊबने लगती है, बेज़ार होने लगती है. मीडिया जान बूझ कर इसका शिकार नहीं होती. ये इस माध्यम के स्वभाव में है.

बेशक ये पेशे की कमज़ोरी भी है और इसकी मजबूरी भी. आठ नवंबर की शाम से मीडिया इस खबर को 24 घंटे चला रही है. दस दिन से अधिक का समय मीडिया के लिए एक लंबा समय होता है. लेकिन नोटबंदी पर इस समय मीडिया का फोकस इतना गहरा है कि मुस्लिम धर्म गुरु ज़ाकिर नाइक की संस्था पर केंद्रीय सरकार के ज़रिये लगाई गई पांच साल की पाबंदी जैसी अहम ख़बर को भी इसने लगभग नज़र अंदाज़ कर दिया.

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विपक्ष को खतरा इस बात का है कि मीडिया में इसको लेकर कभी भी थकावट पैदा हो सकती है, जिसे अंग्रेजी में ''फटीग फैक्टर'' कहते हैं. विपक्ष के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार प्रधानमंत्री इस ''फटीग फैक्टर'' के इंतज़ार में हैं.

उन्होंने कहा, "उन्हें (प्रधानमंत्री को ) को पता है कि एक बार कोई और बड़ी खबर आयी तो मीडिया का ध्यान उस तरफ केंद्रित हो सकता है. नोटबंदी को लागू करने में सरकार की हो रही आलोचना भी कम हो जायेगी और मोदी जी राहत की सांस भी ले सकते हैं"

पिछले साल माइक्रोसॉफ्ट के एक अध्यन में दावा किया गया था कि मनुष्य के ध्यान की अवधि 10 सालों में 12 सेकंड से घट कर 8 सेकंड रह गयी है.

मीडिया की अवधि कितनी है? एक दिन? कुछ दिन? कुछ हफ्ते? या अगली बड़ी खबर तक? सच इन्हीं प्रश्नों में छिपा है.

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