नज़रिया: पंजाब में किसानों को पुआल जलाने की ज़रूरत नहीं

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पंजाब में पुआल जलाने से निकले धुएं और राख ने दिल्ली में प्रदूषण के स्तर को बढाया है, इससे पंजाब सरकार का इंकार करना वाकई निंदनीय है. दिल्ली में होने वाले निर्माण कार्य और वहां चलने वाली गाड़ियों की वजह से वहां प्रदूषण पहले से ही बढ़ा हुआ है.

पंजाब से बहने वाली हवा की वजह से देश की राजधानी के ऊपर कितने नुक़सानदेह ठोस कण (पार्टिकुलेट मैटर) मौजूद हैं, इस पर विवाद हो सकता है. लेकिन इससे या इसे किसान बनाम शहरी लोगों का मुद्दा बना देने से कुछ हासिल होने को नहीं है.

पंजाब के किसानों को ख़ुद अपने लोगों के लिए वहां पुआल जलाना बंद कर देना चाहिए.

एक तो पुआल जलाना अपने आप में हानिकारक है. पंजाब के कृषि आयुक्त बीएस संधू ने बीबीसी से कहा कि एक टन पुआल में 5.50 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फ़ॉस्फ़ोरस, 1.30 किलो सल्फ़र और 25 किलो पोटैशियम होता है.

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Image caption गाड़ियों से निकला धुआं दिल्ली के प्रदषण की बड़ी वजहों में एक है

पंजाब में हर साल तक़रीबन 2.20 करोड़ टन पुआल होता है. इनमें से लगभग 1.50 करोड़ टन पुआल जला दिया जाता है. इसमें बासमती धान का पुआल भी शामिल है. इसका इस्तेमाल मवेशियों के चारा, बागवानी, खेतों की उर्वरकता बढ़ाने, मशरूम पैदा करने में, बिजलीघरों में ईंधन के रूप में और बायो गैस संयंत्र में आसानी से किया जा सकता है.

कुल मिला कर 82,500 टन यूरिया, 19,500 टन सल्फ़र और 375,000 टन पोटेशियम जला कर नष्ट कर दिया जाता है.

एक टन नाइट्रोजन मिले यूरिया की क़ीमत तक़रीबन 16,500 रुपए है. इसी तरह एक टन डाइ-एमोनियम फॉस्फ़ेट की क़ीमत 22,000 रुपए और पोटाश म्यूरिएट की क़ीमत 11,000 रुपए है. आप ख़ुद हिसाब लगाएं कि जो बेकार में जला दिया जाता है, उसका आर्थिक मूल्य क्या है.

पंजाब के किसानों को आर्थिक रूप से टिकाऊ खेती करनी चाहिए. बिजली की दर और अनाज का ख़रीद मूल्य ग़लत तरीके से तय किए जाने का नतीजा यह है कि पंजाब में ज़रूरत से ज़्यादा पानी ज़मीन के नीचे से निकाला जाता है.

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रासायनिक उर्वरक के अधिक इस्तेमाल और प्राकृतिक खाद के कम इस्तेमाल की वजह से मिट्टी कम उपजाऊ हो गई है. हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है.

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के एक हैंडबुक में कहा गया है कि सिर्फ़ 12 फ़ीसदी मिट्टी में अधिक ऑर्गनिक कार्बन बचा हुआ रह गया है.

खेती के पारंपरिक तरीके में खेत में ही पुआल की ढेर छोड़ दी जाती है. पुआल को समेटना, बांधना और बिजलीघरों तक ले जाना आर्थिक रूप से फ़ायदेमंद नहीं रह गया है. पंजाब के पुआल में सिलिका अधिक होने के कारण इससे कम कैलोरी ऊर्जा मिलती है. लिहाजा, बिजलीघरों के लिए इसकी उपयोगिता भी कम है.

किसानों को अक्टूबर के तीसरे हफ़्ते से बीच नवंबर तक का ही समय मिलता है. इसके बाद गेहूं की बुआई करने से फसल को मार्च की तपिश झेलनी पड़ती है. इससे दाने सूख जाते हैं. इससे रोज़ाना हर हेक्टेयर 23 किलो का नुक़सान होता है.

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पर्यावरण और स्वास्थ्य को नज़रअंदाज कर दिया जाए तो पुआल जलाना किसानों के लिए सबसे फ़ायदेमंद विकल्प बचता है.

एक बेहतर विकल्प है. फसल काटने वाली मशीन में ऐसा उपकरण लगा दिया जाए जो पुआल के छोटे छोटे टुकड़े करता जाए और उन टुकड़ों को समान रूप से खेत में बिखेरता चला जाए.

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने एक मशीन बनाई है. इसका नाम है 'हैप्पी सीडर'. यह पुआल के 4-5 ईंच के दर्जन भर टुकड़े कर उसे समान रूप से खेत में बिखेर देती है. यह मशीन उर्वरक डालने के साथ साथ बीज भी बोती जाती है.

पुआल नमी को सूखने से रोकता है. यह कीड़ो मकोड़ों को भी रोकता है. समय बीतने के साथ साथ मिट्टी की उर्वरकता भी बढ़ती जाती है. दूसरे छह तरीके के काम, मसलन, खेत की जुताई, बीनाई, समतल बनाना वगैरह नहीं करना पड़ता है. इससे प्रति हेक्टेयर लगभग 3,000 रुपए की बचत हो सकती है.

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ट्रैक्टरों के देश पंजाब में इस मशीन पर काफ़ी निवेश किया गया है. हल से जुताई करने पर मिट्टी अधिक समय तक धूप में रहती है और सूख जाती है. इससे खर पतवार आसानी से उग आते हैं.

जब गेहूं की फसल पक जाती है, उसी खेत में मूंग बोया जा सकता है. यह हवा से नाइट्रोजन सोखता है और उसे गांठों के रूप में मिट्टी में जमा कर देता है. मूंग कटने के बाद सीधे धान रोपा जा सकता है. इस समय हैप्पी सीडर का इस्तेमाल किया जा सकता है. दरअसल खेत में पानी वहां मौजूद खर पतवार मारने के लिए छोड़ा जाता है, धान को उतने पानी की ज़रूरत नहीं होती है.

बर्लॉग इंस्टीच्यूट ऑफ़ साउथ एशिया (बीसा) ने उत्तर-पश्चिम में फैले गंगा के मैदान में खेती की एक नई प्रणाली पर काम किया है. इस संस्थान के पास लुधियाना में 500 एकड़ में फैला फ़ील्ड स्टेशन है. वह यहां बीते चार से काम कर रही है.

इस साल बीसा हैप्पी सीडर का इस्तेमाल कर 400 एकड़ में बुआई करेगा. यह तकनीक तो एक दशक से मौजूद है, पर इसका सही प्रचार प्रसार नहीं किया गया.

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बीसा के कृषि अधिकारी ने कहा कि संगरूर ज़िले में 4,000 एकड़ में गेंहू की बुआई में हैप्पी सीडर का प्रयोग किया जाएगा. कलेक्टर अर्शदीप सिंह थिंद ने किसानों को पुआल नहीं जलाने पर राजी कराया है. ज़िले के 12,000 हेक्टेयर खेत में पुआल को जोत कर मिट्टी में मिला दिया गया है. धान के बाद आलू की खेती करने पर इससे फ़ायदा होगा.

धान के पुआल से गैस बनाया जा सकता है और उसका इस्तेमाल खाना बनाने और गाड़ी चलाने में किया जा सकता है.

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Image caption पारंपरिक खेती की ओर लौटने की कोशिश

बीबीसी ने भारत-पाकिस्तान सीमा के पास अबोहर में संपूर्ण एग्री-वेंचर के संजीव नागपाल से मुलाक़ात की. यहां सालाना 15,000 टन पुआल से गैस बनाने का संयंत्र लगाया गया है.

गैस के अलावा खाद भी बनेगा, जिसकी बाज़ार में क़ीमत 5,000 रुपए प्रति टन है. यहां ऑर्थोसिलिक एसिड भी बनेगा. मिट्टी में सिलिकन की मात्रा कम होने से इसका इस्तेमाल किया जाता है. पुआल के फर्मेंटेशन में काफ़ी मात्रा में पानी खर्च होता है. अबोहर में जल निकासी की बड़ी समस्या है.

(विवियन फर्नांडिस www.smartindianagriculture.in के संपादक हैं)

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