’माड़-भात, जंगली साग ही सही, पर नमक चाहिए ना’

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"माड़-भात के साथ जंगली साग खा रहे हैं, पर नून- तेल भी तो ज़रूरी है, और उसे ख़रीदने के लिए छुट्टे पैसे चाहिए ना? अब उन पैसों के लिए सोचना पड़ रहा है. जीने लायक़ खेती नहीं और मज़दूरी का भारी संकट है. कब तक पैसा-कौड़ी का झमेला ठीक होगा, पता नहीं."

रांची से क़रीब 50 किलोमीटर दूर, पहाड़ की तराई में बसे बेती गांव के रमेश लोहरा ने अपनी बात कुछ यूं रखी.

उनकी बग़ल में बैठे रंथू बेदिया ने दबी जुबां में कहा, "तमकूल (तंबाकू) का भी टोटा होने लगा है."

नोटबंदी का असर शहरों-क़स्बों से ज़्यादा गावों में बसे आदिवासी परिवारों पर भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है, जिनकी जिंदगी रोज़ की कमाई और उससे जलने वाले चूल्हे पर टिकी है.

इन आदिवासी इलाको़ों में हफ्ते के हाट-बाज़ार से ख़ुदरा सामान ख़रीद कर घर-गृहस्थी खींचने का चलन है.

जब हम दोपहर के वक्त बेती गांव पहुंचे तो लोगों के चेहरे पर उदासी साफ झलक रही थी.

एक युवा साबू मुंडा ने कहा, "हमारी पीड़ा तो सदियों से पहाड़ों-जंगलों की खुली हवा में ही गुम होती रही है."

गंधिया करमाली, शंभु करमाली के साथ-साथ कई अन्य परिवारों की पीड़ा है कि सरकारी योजना के तहत छोटे तालाब की खुदाई के पैसे वक्त पर मिल जाते, तो शायद इतनी दुर्दशा नहीं होती.

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उनका कहना है कि सरकारी योजना के तहत पैसे लेने के लिए वो कई दिनों तक भटकते रहे और अब तो 'साहब तक भी पहुंच नहीं है.'

वो हताशा भरे स्वर में बुदबुदाती हैं- "ई कमीशन (परसेंटेज) ग़रीब का कभी पीछा नहीं छोड़ेगा….पांच सौ वाला दू ठो नोट था, उसमें भी परचून दुकान वाला सौ रुपया काट लिया. हम बोले, ले लो बाबा, ग़रीब रहकर ही जी लेंगे, तुम अमीर रहो.''

डापुलटोली गांव की सुमन बेदिया बताती हैं, "पहले का रखा धान था, सो पेट की भूख मिट रही है. लोटनी, चकोड़, बेंग (जंगलों में पाए जाने वाला) साग सुखाकर रखती हूं लेकिन अब तो नून-तेल का भी संकट पैदा हो गया है. पहले कई परिवार पत्थर तोड़ने का काम करते थे. फिलहाल वह काम बंद है. कहीं से 500 का नोट का इंतज़ाम हो गया, तो राशन-सौदा लेने जाने पर साहूकार पूरे का सामान ख़रीदने को कहता है और पांच सौ का नहीं लिए, तो पचास रुपए कमीशन काटता है."

बीसा गांव के झगड़ू बेदिया की चिंता यह है कि गांव में बिजली आना सपना ही रहा, अब ढिबरी जलाने के लिए केरोसिन तेल का संकट गहरा गया है.

वो कहते हैं कि शहर जाकर मज़दूरी के बाद क्या गारंटी कि खुले पैसे ही मिलेंगे, क्योंकि कई लोग शहर जाकर ख़ाली हाथ लौट चुके हैं.

रूपो उरांव बताती हैं, "बैंक में 1500 रुपए जमा रखे हैं, पर सुना है कि 2000 का नोट देता है. अब कोई छीन-झपट लिया, तब क्या करेंगे?"

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गांवों के दौरे में ये देखने को मिला कि धान की कटाई और अगली फ़सल लगाने का काम बुरी तरह प्रभावित हो रहा है.

खूंटी इलाक़े के गुटीगड़ा गांव के किसान सुखराम मुंडा कई दिनों से बैंक का इसलिए चक्कर लगा रहे हैं कि उनके खेतों में धान कटाई करने वाले मज़दूर तुरंत पैसे भुगतान करने पर जोर दे रहे हैं.

इसी इलाक़े के पंचायत प्रतिनिधि पैलुस सोय का कहना है कि जब तक पांच सौ और एक सौ रुपए के नोट सामान्य ढंग से नहीं मिलेंगे, गांवों की परेशानी बढ़ती जाएगी.

शहरों की परेशानी तो साहब की नज़र में होती है, पर जंगलों-पहाड़ों की तराई में रहने वाले आदिवासियों की चिंता कौन करे?

बैंकों में लगी लंबी क़तारों ने उन ग़रीब बुजुर्गों की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं, जो वृद्धापेशन के लिए कई किलोमीटर चलकर बैंक पहुंच रहे हैं और दोपहर तक भूखे-प्यासे लाइन में खड़े रहने के बाद खाली हाथ लौट रहे हैं.

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बंगाल जाने के रास्ते में पड़नेवाले एक बैंक के सामने भीड़ में धक्का खाते मिले विकलांग धुरई मुंडा. उनकी पत्नी संवरिया बताने लगीं कि उनकी ज़िंदगी इसी पेंशन से चलती है, पर दो दिन से बैंक आकर ख़ाली हाथ लौट रहे हैं.

मोहरी देवी सुबह आठ बजे ही घर से निकली थीं. दस बजे बैंक तक पहुंच गईं पर लंबी क़तार देखकर धम से जमीन पर बैठ गईं. वो सामने वाले युवक बार-बार यह कहते रही थीं, "कंठ सूख गया है, पानी है तो पिला दो बाबू..."

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