'भारत मर्दानगी दिखाए और सैनिकों की मौत को स्वीकार करे'

इस हफ़्ते भारत-पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों की बात की जाए तो भारत-पाक नियंत्रण रेखा पर दोनों ओर से की जाने वाली फ़ायरिंग, तुर्की के राष्ट्रपति तैयप अर्दोआन की पाकिस्तान यात्रा और भारत में नोटबंदी वग़ैरह छाए रहे.

पहले बात पाकिस्तान की.

हफ़्ते की शुरुआत में ही बलूचिस्तान प्रांत के ख़ज़दार ज़िले में दरगाह शाह नूरानी में आत्मघाती हमला हुआ था जिसमें 60 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

सारे अख़बारों के पहले पन्ने पर ये ख़बर रही. रोज़नामा 'दुनिया' के मुताबिक़ पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने इस हमले के पीछे भारत का हाथ बताते हुए कहा, ''दरगाह शाह नूरानी में दहशतगर्दी के ताने बाने भारत से मिलते हैं. भारत अफ़ग़ानिस्तान के ज़रिए पाकिस्तान में दहशतगर्दी करता है.''

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इसके अलावा एलओसी यानी भारत-पाक नियंत्रण रेखा पर दोनों ओर से की जाने वाली फ़ायरिंग की ख़बरें भी प्रमुखता से छपीं. रोज़नामा दुनिया लिखता है कि भारत अपने 45 जवानों की मौत को स्वीकार करे.

अख़बार 'दुनिया' पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ़ के बयान के हवाले से लिखता है कि पाकिस्तान एलओसी पर अपने सात सैनिकों की मौत की बात को स्वीकार करता है, लेकिन भारत नहीं करता.

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Image caption सरहद पर तैनात भारतीय जवान.

सेना प्रमुख के अनुसार जिस दिन एलओसी पर पाकिस्तान के सात सैनिक मारे गए थे, उस दिन के बाद से अब तक जवाबी कार्रवाई में भारत के 45 सैनिक मारे जा चुके हैं लेकिन भारत उसे नहीं मानता.

जनरल शरीफ़ के हवाले से अख़बार लिखता है, ''जिस रोज़ हमारे सात जवान शहीद हुए, उस दिन भारत के भी 11 सैनिक मारे गए थे लेकिन भारत ने इसको माना ही नहीं. भारत मर्दानगी दिखाए और अपने सैनिकों की मौत को स्वीकार करे.''

इसी बारे में अख़बार 'जंग' लिखता है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समझ में बात आ गई है कि पाकिस्तान क्या कर सकता है.

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जनरल राहिल शरीफ़ के हवाले से अख़बार लिखता है, ''मोदी को समझ है कि हम क्या कर रहे हैं और क्या कर सकते हैं और हमारी क़ाबीलियत क्या है. मोदी को हमारी बात भी समझ में आ गई है कि हिंसा से कुछ नहीं मिलेगा.''

इसके अलावा एक भारतीय पनडुब्बी के कथित तौर पर पाकिस्तान की समुद्री सीमा में दाख़िल होने की ख़बर सुर्ख़ियों में रही.

रोज़नामा ख़बरें ने लिखा, ''दुश्मन का एक और वार नाकाम, पाक नेवी ने मुल्क की समुद्री सीमा में घुसने वाली भारतीय पनडुब्बी को मार भगाया.''

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Image caption पाक नौसेना के मुताबिक़ भारतीय पनडुब्बी अपनी उपस्थिति छिपाने में नाकाम रही.

नवा-ए-वक़्त लिखता है कि रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु हथियार से लैस भारतीय पनडुब्बी का पाकिस्तान की समुद्री सीमा में घुसने की कोशिश करने का असल मक़सद ग्वादर बंदरगाह और सीपैक (चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर) को नुक़सान पहुंचाना था.

अख़बार पाकिस्तानी नेवी के एक बयान के हवाले से लिखता है कि भारतीय नेवी की इस कार्रवाई का असल उद्देश्य भारत प्रशासित कश्मीर में कथित भारतीय ज़ुल्म से ध्यान हटाना था.

अख़बार जंग लिखता है कि भारतीय नेवी ने अपनी पनडुब्बी की मौजूदगी को ख़ुफ़िया रखने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन पाकिस्तानी नेवी ने भारतीय पनडुब्बी का लगातार पीछा किया और आख़िरकार उसे पाकिस्तान की समुद्री सरहद से खदेड़ दिया.

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लेकिन भारतीय नौसेना ने ऐसे तमाम आरोपों को ख़ारिज कर दिया है. जंग लिखता है कि भारतीय नेवी के प्रवक्ता कैप्टन डीके शर्मा ने कहा है कि किसी भी भारतीय पनडुब्बी ने पाकिस्तान की समुद्री सीमा में दाख़िल होने की कोई कोशिश नहीं की और पाकिस्तान की तरफ़ से इस तरह की बात करना बिल्कुल बेबुनियाद है.

इसी हफ़्ते पाकिस्तान और चीन के बीच बनने वाला आर्थिक कॉरिडोर यानी सीपैक आधिकारिक रूप से शुरु हो गया. ये ख़बर भी अख़बारों में पहले पन्ने पर छाई रही.

प्रधानमंत्री ने इसका उद्घाटन करते हुए कहा, ''ख़्वाब हक़ीक़त बन गया, ग्वादर से चीनी व्यापार शुरु.''

नवा-ए-वक़्त लिखता है, ''सीपैक का दुश्मन, पाकिस्तान और चीन का दुश्मन.''

तुर्की के राष्ट्रपति तैयप अर्दोआन की पाकिस्तान यात्रा भी अख़बारों में छाई रही. नवा-ए-वक़्त लिखता है कि राष्ट्रपति अर्दोआन ने पाकिस्तानी संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट और अल-क़ायदा समेत भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर समस्या का ज़िक्र किया.

अख़बार के मुताबिक़ अर्दोआन ने कहा कि आईएस और अल-क़ायदा जैसे संगठन इस्लाम के नाम पर दहशतगर्दी कर रहे हैं, लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि इन संगठनों को पश्चिमी देशों का समर्थन हासिल है. कश्मीर का ज़िक्र करते हुए अर्दोआन ने कहा कि भारत प्रशासित कश्मीर में हाल की घटनाओं से ज़ाहिर होता है कि इस मसले का स्थायी हल तलाशना बहुत ज़रूरी है.

भारत से छपने वाले उर्दू अख़बारों की बात की जाए तो भारत सरकार के 500 और 100 रुपये के नोट ग़ैर-क़ानूनी क़रने के फ़ैसले से जुड़ी ख़बरें हीं सुर्ख़ियां बटोरती रहीं.

रोज़नामा जदीद ख़बर ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को सुर्ख़ी बनाते हुए लिखा है, ''नोटबंदी संगीन मसला है, दंगे फ़साद की आशंका है.''

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जदीद ख़बर ने मीडिया को वार्निंग के नाम से संपादकीय लिखा है. संपादकीय में अख़बार लिखता है कि ताज्जुब इस बात पर है कि 1975 में इंदिरा गांधी ने जब इमरजेंसी लगाई और प्रेस सेंसरशिप लागू हुई तो उसके विरोध करने वालों में भारतीय जनता पार्टी (उस समय भारतीय जन संघ) के शीर्ष नेता आगे आगे थे. लेकिन अब उसी पार्टी की सरकार में मीडिया को डराया धमकाया जा रहा है. सूचना और प्रसारण मंत्री ख़ुद मीडिया को कंट्रोल करने की बात कह रहे हैं.

अख़बार आगे लिखता है कि ऐसे समय में जब सूचना क्रांति के कारण पूरी दुनिया की मीडिया आज़ाद है, उस समय भारतीय मीडिया को कंट्रोल करने की बात करना अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं.

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