कैशलेस इंडिया: कितनी बड़ी चुनौती?

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गुजरात के इस गांव में नोटबंदी का असर नहीं है.

नोटबंदी के फ़ैसले के बाद से भारत के अधिकांश शहरी और ग्रामीण इलाकों में पैसे की कमी के कारण अफरा-तफरी का माहौल है.

मुकेश दारा सिंह खेत में काम करने वाले मजदूर हैं. लाखों भारतीयों की तरह मुकेश दारा सिंह के पास भी किसी तरह का कोई बैंक खाता नहीं है.

अब जबकि बाज़ार में मौजूद करीब 90 फ़ीसदी नोट बेकार हो चुके हैं, उनके पास पैसे का कोई दूसरा उपाय नहीं है.

Image caption मुकेश दारा सिंह

मुकेश दारा सिंह कहते हैं, "बैंकों के बाहर लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं. मेरे मालिक का कहना है कि उनके पास मेरी मजदूरी देने के लिए नकद पैसे नहीं हैं और कुछ हफ़्तों के बाद वो मुझे पैसे देंगे. लेकिन मुझे अपने बच्चों के दूध और खाना खरीदने के लिए पैसे की जरूरत है."

नकद का नहीं होना एक मसला है और बैंकों में होने वाली मारा-मारी दूसरा. दोनों ही मसलों के कारण एक साथ समस्या पैदा हो रही है.

लेकिन गुजरात का एक गांव इस समस्या से अछूता नज़र आता है. यहां के बैंकों के बाहर लंबी-लंबी लाइनें नहीं लगी हुई हैं.

अकोदारा नाम का यह गांव एक साल पहले ही कैशलेस बनने की दिशा में बढ़ चुका था. यहां सभी तरह के भुगतान मोबाइल और बैंक अकाउंट के मदद से किए जाते हैं.

इस गांव में मुख्य तौर पर दूध का व्यापार होता है. हर रोज दोपहर में यहां दूध बेचने वालों का जमावड़ा लगता है.

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दूध बेचने वाले सभी व्यापारियों को सीधे बैंक अकाउंट में भुगतान किया जाता है.

इस गांव में दूध बेचने वाले एक व्यापारी विजय पटेल का कहना है, "आसपास के दूसरे गांवों में नकद में पैसे का भुगतान होता है जिसकी वजह से इन दिनों वहां दूध व्यापारियों को पैसे नहीं मिल पा रहे हैं. इस गांव में पैसे सीधे अकाउंट में आते हैं. इसलिए यहां कोई समस्या नहीं हो रही है."

इस गांव के लोग मोबाइल से मैसेज भेजकर दुकान से सामान खरीदा करते हैं. इस कोशिश को एक निजी बैंक और गांव वाले मिलकर सफल बनाने में लगे हुए हैं.

आईसीआईसीआई बैंक के स्थानीय अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "सुविधाएं मुहैया कराना उतना मुश्किल काम नहीं है. सबसे मुश्किल काम है गांव के लोगों की मानसिकता बदलना. नकद लेन-देन ग्रामीण भारत की हमेशा से जीवन रेखा रखी है इसलिए शुरू-शुरू में लोगों को समझाने में बड़ी समस्या हुई."

Image caption श्रद्धा पटेल

इस गांव में रहने वाली श्रद्धा पटेल कहती हैं, "हम अपने पास नकद पैसे नहीं रखते हैं. हमें अगर कुछ खरीदना होता है तो हम मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए हमारे गांव के सभी लोग प्रधानमंत्री की घोषणा से ख़ुश हैं. हमें इस फ़ैसले से कोई प्रभाव नहीं पड़ा है."

अकोदारा भारत के लाखों गांवों में अकेला ऐसा गांव है जहां यह फिलहाल संभव हो पाया है. कई गांवों में तो अभी तक बैंक पहुंचे तक नहीं हैं.

ऐसे गांवों में जहां बैंक नहीं हैं, बैंकिंग कॉरेसपॉडेंट (बैंक मित्र) नियुक्त किए जाने की सरकार की योजना है. ये बैंक मित्र घर-घर जाकर लोगों के बैंकिंग से संबंधित कामों को देखेंगे.

भारत में लोगों को अभी भी क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड के इस्तेमाल की आदत नहीं हो पाई है.

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ऐसी परिस्थितियों में अकोदारा जैसे गांवों में मोबाइल फोन का इस्तेमाल तो एक हद तक सफल हो सका है.

और भारत के ग्रामीण इलाकों में मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है.

इसलिए मोबाइल कंपनी वाले दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचने की कोशिश में लगे हुए हैं. लेकिन फिलहाल देश भर में लोग काफी परेशानी महसूस कर रहे हैं.

नकद के बिना लेन-देन की यह अभी शुरुआत भर हो सकती है लेकिन पूरी तरह से इस समस्या से निपटने के लिए अभी लंबा सफर तय किया जाना बाकी है.

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