झारखंड: जन-धन खाताधारियों पर नक्सलियों और पुलिस की नज़र

इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha
Image caption झारखंड पुलिस ने जारी की अपील.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जन-धन खातों की तारीफ़ अक्सर करते हैं, लेकिन इन खातों पर अब जांच एजेंसियों की नज़र है.

कहा जा रहा है कि 500 और 1000 के नोट बंद होने के बाद जन-धन खातो में अवैध पैसे जमा कराए जा रहे हैं. झारखंड में तो पुलिस ने इस मामले में लोगों को आगाह किया है कि वे अपने खातों का ग़लत इस्तेमाल नहीं होने दें.

पुलिस का कहना है कि नक्सली भोले-भाले ग्रामीणों को गुमराह कर उनके जन-धान खातों में लेवी की रक़म जमा कर रहे हैं, ताकि उन पैसों को वैध बनाया जा सके. पुलिस का कहना है कि नक्सली ऐसा करने के लिए लोगों को धमकी भी दे रहे हैं.

इस मामले में झारखंड पुलिस के प्रवक्ता एमएस भाटिया ने कहा कि नक्सल प्रभावित इलाक़ों में लोगों को सतर्क कर दिया गया है.

उन्होंने कहा कि इसके लिए पुलिस की टीम भी गठित की गई है, ताकि बैंकों पर नज़र बनी रहे. इस टीम में सीआरपीएफ़ के पुलिस अफ़सरों को भी शामिल किया गया है.

पुलिस का दावा है कि जन-धन खातों के इस्तेमाल की उन्हें ख़ुफ़िया जानकारी मिली थी.

इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha
Image caption पुलिस का नक्सलियों से लेवी की रकम ज़ब्त करने का दावा है.

पुलिस ने बैंकों को भी सतर्क कर दिया है कि कोई बड़ी रकम लेकर आए, तो वे तत्काल पुलिस को सूचित करें.

पुलिस का कहना है कि नोटबंदी के कारण नक्सलियों ने लेवी में जो करोड़ों की रक़म वसूली थी, वह बर्बाद हो जाएगी. इसे रोकने के लिए वे जन-धन खातों का इस्तेमाल कर रहे हैं.

हाल ही में झारखंड पुलिस ने अपने अभियान में नक्सलियों से लाखों रुपये ज़ब्त करने का दावा किया था.

पिछले हफ्ते रांची पुलिस ने दावा किया था कि उसने नक्सलियों के 25 लाख 38 हज़ार रुपये बैंक में जमा कराने की कोशिश में जुटे एक पेट्रोल पंप संचालक समेत चार लोगों को गिरफ़्तार किया था.

रांची के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कुलदीप द्विवेदी का दावा है कि ये कारोबारी, पीपुल्स लिब्रेशंस फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएलएफआइ) के सुप्रीमो दिनेश गोप के पैसे लेकर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की स्थानीय शाखा में जमा कराने पहुंचे थे.

पुलिस का कहना है कि जांच में यह बात सामने आई है कि कई नक्सली, ठेकेदारों के संपर्क में हैं और लेवी के पैसे बचाने की कोशिशों में जुटे हैं.

इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha
Image caption बैंको पर है पुलिस की नज़र.

नक्सली मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार सुरजीत सिंह का कहना है कि नोटबंदी और पुलिस की चौकसी से नक्सली संगठनों को कम और उनके बड़े नेताओं को ज़्यादा नुक़सान हो सकता है.

उन्होंने कहा, ''हथियारबंद दस्तों द्वारा कारोबारियों और सरकारी योजनाओं से बतौर लेवी लिए गए पैसे का बड़ा हिस्सा उनके कमांडरों या चीफ़ के पास जाता है, जबकि मोर्चे पर वे नहीं होते हैं.''

नक्सल प्रभावित ज़िला गुमला के एक पंचायत प्रतिनिधि तिंबू उरांव ने कहा, ''बेशक ग्रामीणों पर पैसे जमा करने का दबाव है. इस मामले में लोग पुलिस से भी डरे हैं क्योंकि उन पर पुलिस की भी नज़र है. पंचायत प्रतिनिधि ग्रामीणों को समझा रहे हैं कि बीपीएल रातोंरात अमीर न बनें वरना सरकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित रह जाएंगे.''

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)