सायरस मिस्त्री को नजरअंदाज करना टाटा के लिए संभव नहीं

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Image caption टाटा समूह अपनी सभी कंपनियों से सायरस मिस्त्री को हटाना चाहती है.

शायद आपको यह सुनकर थोड़ा अटपटा लगे कि टाटा समूह के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बावजूद सायरस मिस्त्री अब भी कंपनी के अटूट हिस्सा बने हुए हैं.

लेकिन यह करीब साढ़े छह लाख कर्मियों वाले टाटा समूह की एक ऐसी सच्चाई है जिसे पचा पाना मुश्किल है.

क्योंकि अब तक सायरस मिस्त्री के हटाए जाने के बाद दुनिया भर की मीडिया में इस अपमान और उपेक्षा को लेकर ही बातें होती रही हैं.

टाटा समूह देश का सबसे बड़ा बिजनेस समूह है. सौ से ज्यादा कंपनियों में टाटा की हिस्सेदारी है.

और अभी भी इनमें से ज्यादातर बड़ी कंपनियों की बागडोर या उनके बोर्ड में सायरस मिस्त्री शामिल हैं.

टाटा के गौरवशाली 148 साल के इतिहास में सायरस मिस्त्री का यूं हटाया जाना उसके दामन पर लगे दाग़ की तरह है.

सायरस मिस्त्री ने बोर्ड को भेजे गए पांच पन्नों के एक ईमेल में लिखा था कि लगातार उनके काम में दख़लअंदाज़ी की जा रही थी जिससे चेयरमैन पद पर उनकी स्थिति कमज़ोर हो रही थी.

सायरस मिस्त्री के हटाए जाने से जुड़ा मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ है और ऐसी हालत में उनके लिए हर रोज दफ़्तर जाकर काम करना कितना मुश्किल काम है?

कुछ लोग ऐसे हैं जिनका मानना है कि यह वाकई में आसान नहीं है.

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Image caption सायरस मिस्त्री ने रतन टाटा पर कंपनी के फ़ैसलों में दखलअंदाजी करने का आरोप लगाया था.

सिंगापुर के एनयूएस बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर कुलवंत सिंह का कहना है, "टाटा कंपनी का स्टाफ होना अपने आप में एक गर्व का एहसास देता है जो टाटा ने अपने पहले के प्रबंधकों के कायम किए गए उच्च नैतिक मापदंडों के बदौलत कमाया है. लेकिन इस मामले में जो कुछ हुआ है उसने टाटा की छवि को नुकसान पहुंचाया है. इससे टाटा समूह के मनोबल और उन पर कायम विश्वास को धक्का पहुंचेगा."

टाटा के कर्मचारियों के सामने अभी यह साफ भी नहीं हो पाया है कि उनका अगला बॉस कौन होगा. ऐसी हालत में उनके मनोबल पर जरूर असर पड़ने वाला है.

एसपी जैन स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट के अध्यक्ष नीतीश जैन कहते है, "टाटा के कर्मचारी बीच मझधार में फंसे हुए हैं. वो सिर्फ़ बाहर से तमाशा देख रहे हैं क्या-क्या हो रहा है. वे शायद ही इस मामले में दखल देना चाहेंगे. इसकी बजाए वो इतना जरूर चाहेंगे कि यह मामला जल्दी से जल्दी ख़त्म हो. लेकिन उनके पास धैर्यपूर्वक इंतज़ार करने के अलावा कोई और चारा नहीं है."

टाटा संस की बोर्ड की बैठक गुरुवार को होने वाली है जिसमें सायरस मिस्त्री के किस्मत को लेकर फ़ैसला होना है.

लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है. सायरस मिस्त्री का परिवार 1930 के दशक से कंपनी का बड़ा निवेशक रहा है और टाटा संस में उनके परिवार की 18 फ़ीसदी हिस्सेदारी है.

सबसे अहम बात यह है कि सायरस मिस्त्री का साथ देने वालों की अभी भी कमी नहीं है.

इन सब वजहों से ही इतना कुछ होने के बाद भी सायरस अभी तक टाटा केमिकल्स और इंडियन होटल्स के चेयरमैन बने हुए हैं और मशहूर ताज ब्रांड के मालिक भी.

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टाटा समूह इन सभी व्यवसायों की हिस्सेदारी खरीद सकता है लेकिन इससे इनके ऊपर क़ानूनन दावेदारी पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है क्योंकि ये क़ानूनी तौर पर ये अलग कंपनियां हैं.

इसका मतलब यह हुआ कि इन कंपनियों के बोर्ड से सिर्फ़ सायरस मिस्त्री को बाहर निकाला जा सकता है.

प्रोफेसर कुलवंत सिंह कहते हैं, "टाटा समूह के कंपनियों के बोर्ड में सायरस मिस्त्री को बाहर किए जाने को लेकर मतभेद हैं. बोर्ड के कुछ सदस्य नहीं चाहते हैं कि उन्हें बाहर निकाला जाए."

लेकिन सायरस के साथ खड़े होने वाले लोगों पर आफत भी आ सकती है.

इन सभी कंपनियों के साथ टाटा का नाम जुड़ा होना बहुत अहम है. क्योंकि लोगों के बीच टाटा का नाम और विश्वास काम करता है.

इसलिए प्रोफेसर कुलवंत सिंह का मानना है कि टाटा संस इस ट्रंप कार्ड का इस्तेमाल अपनी बात मनवाने के लिए कर सकता है.

लेकिन ऐसा लगता है कि सायरस मिस्त्री इतनी आसानी से हार नहीं मानने वाले हैं.

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Image caption दिसंबर 2011 में नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात के दौरान रतन टाटा और सायरस मिस्त्री. उस वक़्त नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे.

इस पर नीतीश जैन की राय है, "अगर वो आसानी से अपनी दावेदारी छोड़ देते हैं तो उनका साथ देने वालों को लगेगा कि वो कमजोर हैं. लेकिन अगर वो इसे आसानी से नहीं छोड़ते हैं तो उनके बीच यह संदेश जाएगा कि वो एक जुझारू इंसान हैं."

प्रोफेसर कुलवंत सिंह को लगता है कि टाटा अनावश्यक इस बात को तुल दे रही है.

वो कहते हैं, "मुझे इस बात पर ताज्जुब होता है कि वे सायरस मिस्त्री के साथ मिलकर एक समझौते पर क्यों नहीं पहुंचते हैं ताकि सायरस मिस्त्री को सम्मानजनक विदाई दी जा सके. इससे लोगों के बीच टाटा का नाम भी बचा रहेगा और यह एक बेहतर रास्ता भी होगा."

किसे पता है कि यह कोशिश हुई भी हो और नाकाम भी हो गई हो. लेकिन इन सब बातों में एक बात तो तय है कि भले ही टाटा संस सायरस मिस्त्री को सभी कंपनियों से बाहर करने में कामयाब हो जाए लेकिन उन्हें वो कभी नज़रअंदाज नहीं पर पाएंगे.

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