#100Women मोहनलालगंज में महिला सांसदों का बोलबाला क्यों?

उत्तर प्रदेश के मोहनलालगंज शहर की किसी चाय की दुकान पर अगर महिला सांसदों का ज़िक्र छेड़ दें तो बात घूमफिर कर रीना चौधरी पर आ जाती है.

1998 और 1999 में इस सीट से लोकसभा पहुंची थीं. लेकिन उससे पहले उन्होंने विधानसभा क्या, ज़िला स्तर का चुनाव भी नहीं लड़ा था.

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चाय की चुस्की लेते हुए आशाराम याद करते हैं कि रीना चौधरी महज़ 27 साल की थीं जब इन्होंने पहली बार उनका भाषण सुना था.

वो कहते हैं, "मुझे आज भी याद है, मैं तब कॉलेज में था. वो सहमी सी सटेज पर आईं थीं, और ठीक से कुछ बोल भी नहीं पाई थीं, पर लोगों को उनकी गरमजोशी पसंद आई."

रीना चौधरी अकेली नहीं हैं. उनके अलावा सात और महिला सासंद मोहनलालगंज से अलग अलग समय पर जीत चुकी हैं.

मोहनलालगंज, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटी, आम सी दिखने वाली ग्रामीण लोकसभा सीट है. यहां औरतें ज़्यादातर खेती या दिहाड़ी मज़दूरी करती हैं.

वो नौकरीपेशा नहीं हैं और ना ही बड़ी तादाद में कॉलेज की पढ़ाई पूरी करती हैं.

फिर भी ये वो सीट है जहां देश में अब तक हुए 16 लोकसभा चुनावों में से सबसे ज़्यादा, आठ बार महिला सांसद जीती हैं.

ये बहुत अहम है क्योंकि अब भी कुल 543 में से क़रीब आधी लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां से कभी भी कोई महिला सांसद नहीं चुनी गई है.

तो मोहनलालगंज ने आठ बार औरतों को क्यों चुना?

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रीना चौधरी मोहनलालगंज से दो बार लोकसभा का चुनाव जीत चुकी हैं.

वैसे तो पंसकुरा और इंदौर की लोकसभा सीटों ने भी आठ बार महिला सांसद चुनी हैं, पर ये हर बार गीता मुखर्जी और सुमित्रा महाजन रहीं.

इनसे अलग मोहनलालगंज ने ऐसी औरतों को चुना जो नामी गिरामी नहीं थीं, हालांकि संपन्न परिवारों से ताल्लुक ज़रूर रखती थीं.

रीना के पिता सरकारी अफ़सर थे और 'नेताजी' मुलायम सिंह यादव से अच्छी पहचान थी. एमए, एलएलबी कर चुकी रीना के मुताबिक, बस जब उन्हें टिकट दिया गया तो उन्हें कोई अंदाज़ा नहीं था कि वो जीत जाएंगी और इस सीट पर समाजवादी पार्टी का कब्ज़ा हो जाएगा.

शायद रीना की जीत में कुछ हाथ उनसे पहले भारतीय जनता पार्टी से सांसद रहीं पूर्णिमा वर्मा का भी रहा हो.

1993 में बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के वक्त राजनीति में आईं पूर्णिमा 1996 में सांसद बनीं. इसका बड़ा श्रेय वो इलाके की तथाकथित ऊंची जाति की औरतों को देती हैं.

पूर्णिमा बताती हैं, "उस दौर में ये औरतें राजनीति का हिस्सा तो बनना चाहती थीं पर इनके घर से कोई इन्हें वोट डलवाने ही नहीं ले जाता था, मैंने घर-घर जाकर इनके परिवारों से अपील की कि वो इन्हें वोट डालने ले जाएं."

महिला सांसदों के चुने जाने की शुरुआत हुई 1962 में तीसरी लोकसभा से, जब गंगा देवी जीतकर आईं. तब ये कांग्रेस पार्टी का गढ़ था.

गंगा देवी तीन बार जीतीं और उनके बाद कांग्रेस की ही कैलाशपति भी 1980 में एक बार सासंद चुनी गईं.

इसके बाद तीन लोकसभा चुनाव पुरुष ही जीते, पर सीट कांग्रेस से जनता पार्टी और फिर भारतीय जनता पार्टी की ओर खिसक गई.

हिंदुस्तान अख़बार में स्थानीय पत्रकार अखिलेश द्विवेदी के मुताबिक, 1996 में जब एक बार फिर मोहनलालगंज से महिला सांसद चुनी गईं, तब वहां भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता अटल बिहारी वाजपेयी की लहर थी.

दविवेदी कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में नेता से भी ज़्यादा ज़रूरी जाति और पार्टी हो जाती है. इन औरतों को सही समय पर मैदान में उतरने का भी फ़ायदा हुआ है."

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मोहनलालगंज से सांसद रहीं पूर्णिमा वर्मा की बात.

मोहनलालगंज सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. पूर्णिमा वर्मा के मुताबिक उन्हें और उनके बाद मोहनलालगंज से जीतीं समाजवादी पार्टी की रीना चौधरी और सुशीला सरोज को इसका फ़ायदा ज़रूर हुआ है.

वो कहती हैं, "अनुसूचित जाति से उभरीं महिला नेताओं की तादाद बहुत कम है, ऐसे में पार्टी जब हमें टिकट देती है तो बहुत अच्छा संदेश जाता है."

लेकिन पार्टी के टिकट देने और महिला के चुनाव जीतने के आगे का रास्ता उतना आसान नहीं रहा है.

रीना चौधरी के मुताबिक उनके दो बार सांसद चुने जाने के बाद भी उन्हें उनकी पार्टी ने तीसरी बार टिकट नहीं दिया जिसकी वजह से उन्होंने पार्टी छोड़ दी.

उनका आरोप है, "मैं लोगों के बीच जाकर उनकी परेशानियां सुनकर फ़ैसले लेने लगी थी, मुझसे उमर में ज़्यादा पर ओहदे में कम रहे पुरुषों ने मुझे साज़िश कर हटवा दिया."

रीना चौधरी के हाथ से निकली सत्ता फिर एक पुरुष के हाथ में गई और 2009 में फिर एक औरत के पास लौटी.

मिसरिख़ लोकसभा सीट से सांसद रह चुकीं सुशीला सरोज मोहनलालगंज से सांसद चुनीं गईं.

लंबे समय से पार्टी के महिला मोर्चा की अध्यक्ष रहीं सुशीला उत्तर प्रदेश में विधायक भी रह चुकी हैं.

पिछले लोकसभा चुनाव में जब देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो उसी 'लहर' में मोहनलालगंज की सीट भी उसी पार्टी के एक पुरुष के पास चली गई है.

18 लाख मतदाताओं वाली मोहनलालगंज लोकसभा सीट में पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं. रोज़गार का सबसे बड़ा हिस्सा खेती बाड़ी से ही आता है.

राष्ट्रीय औसत (1000 : 943) से कम हर 1000 लड़कों के मुकाबले यहां 906 लड़कियां ही हैं.

महिला सासंदों ने उनकी ज़िंदगी कितनी बदली ये जानने के लिए कल पढ़ें #100Women में राजनीति और महिलाओं पर इस विशेष सीरीज़ की दूसरी कड़ी.

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