दिहाड़ी बिन जिनके घर हो रहा है फ़ाक़ा

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नोटबंदी का मज़दूरों पर सबसे अधिक असर हो रहा है

दिल्ली से सटे हुए ग़ाज़ियाबाद-नोएडा बॉर्डर पर सुबह के नौ बजे हैं.

आम तौर से लेबर चौक के नाम से जानी जाने वाली इस जगह पर तड़के सात बजे से दस बजे तक सैंकड़ों मज़दूर मंडराते रहते हैं काम की तलाश में.

ज़्यादातर को काम मिल जाता था और चंद बचे अपने घर वापस चले जाते हैं.

नोटबंदी लागू होने के बाद से मामला उलट चुका है क्योंकि ज़्यादातर यहीं चौराहे के किसी न किसी कोने में हाथ पर हाथ धरे बैठे मिलते हैं.

उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर से कई दशक पहले दिल्ली आए धर्मेंद्र पेशे से मिस्त्री हैं लेकिन कई दिनों से रोज़गार नहीं मिला है.

Image caption सूधन प्रसाद छपरा, बिहार के रहने वाले है.

उन्होंने बताया, "जीवन में इतनी दिक्कत कभी नहीं हुई. स्कूल में पढ़ने वाली तीन बच्चियां हैं, बूढ़े मां-बाप और पत्नी भी है. 500 रुपए के बंद होने के बाद से अब उधार का ही सहारा है".

केंद्र में आसीन नरेंद्र मोदी सरकार ने 8 नवंबर की शाम को एक चौंकाने वाली घोषणा में 500 और 1000 रुपए के नोटों पर बैन लगा दिया था.

इसके बाद से सरकार ने कुछ प्रावधान ज़रूर बनाए हैं जिनके तहत तय मात्रा में पुराने नोटों की बदली हो सकती है और एक निर्धारित रकम बैंकों या एटीएम से निकाली जा सकती है.

लेकिन लेबर चौक पर जितने भी मज़दूरों से मुलाक़ात हुई उनमें से 80% के पास न तो बैंक खाता है और न ही एटीएम कार्ड.

चाहे बढ़ई हो या पेंटर या फिर मिस्त्री, सभी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी दिहाड़ी से कमाए गए पैसों पर ही चलती है.

Image caption धर्मेंद्र पेशे से मिस्त्री हैं लेकिन कई दिनों से रोज़गार नहीं मिला है.

लगभग सभी ने दूसरे प्रदेशों से दिल्ली-ग़ाज़ियाबाद-नोएडा-गुड़गॉव का रुख इसलिए किया था क्योंकि यहाँ दिहाड़ी का रेट ज़्यादा है.

लेकिन छपरा, बिहार के सूधन प्रसाद को इस बात का डर सता रहा है कि कहीं वापस न लौटना पड़ जाए.

उन्होंने कहा, "मेरे मकान-मालिक कमरे के किराए के लिए पीछे पड़ा है. दो हफ्ते से काम मिला नहीं है तो पैसे बचे ही नहीं. खाने-पीने के लाले पड़ गए हैं और कई दफ़ा बिस्कुट के सस्ते पैकेट से काम चलाना पड़ा है. काम देने वालों के पास काम की कमी नहीं है लेकिन दिहाड़ी देने के लिए कैश रकम ही नहीं".

शाहजहांपुर के मोहम्मद इमरान की कहानी भी ज़्यादा इतर नहीं.

पेशे से पेंटर इमरान के मुताबिक, "अगर सरकार को इतना बड़ा कदम लेना ही था तो फिर गरीबों को थोड़ा समय तो दिया जाता जिससे राशन-पानी का जुगाड़ कर लेते. अब तो भूखे रहने की नौबत आ चुकी है".

Image caption मज़दूरों को लगता है कि दिक्कत कुछ दिन और रह सकती है.

हालांकि इमरान के बगल खड़े प्रेम प्रकाश ने कैश की कमी से उठने वाली दिक्कतों का ज़िक्र तो किया लेकिन साथ में कहा, "सरकार के कदम से अभी तो मैं भी परेशान हूँ. लेकिन क्या पता अच्छे के लिए ही हो".

लेबर चौक जैस भीड़- भाड़ वाली जगह पर नोटबंदी का असर सिर्फ़ मज़दूरों में ही नहीं बल्कि दुकानदारों पर भी दिखा.

छोले-कुलचे, बन-मख्खन और पूरी-सब्ज़ी की तमाम दुकान के मालिकों ने बताया कि एक सीमा के बाद उन्होंने भी अब उधार देना बंद कर दिया है.

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