#100Women: ड्राइवर की पत्नी को बना दिया सरपंच

किसी इलाके से बार-बार महिलाएं सांसद का चुनाव जीतें तो क्या इससे मान लिया जाए कि वहां कि औरतों की ज़रूरतों को पूरा किया जाने लगेगा? उनकी ज़िंदगी संवर जाएगी? समाज में उनका रुतबा बढ़ जाएगा?

अब तक सबसे ज़्यादा आठ बार महिला सांसद चुननेवाले मोहनलालगंज में मैंने यही पड़ताल करने की कोशिश की.

सोचा कि एक महिला ग्राम प्रधान से मुलाकात करती हूं. साल भर पहले चुनी गई लक्ष्मी रावत को ढूंढ़ने निकली.

प्रधान का घर पूछते - पूछते एक बड़े बंगले के सामने पहुंची तो वो लक्ष्मी नहीं बल्कि शंकर यादव का घर निकला.

पता चला कि शंकर यादव पूर्व प्रधान हैं और जब ये पद महिलाओं के लिए आरक्षित हुआ तो पिछले साल उन्होंने अपने ड्राइवर की पत्नी को लड़वा कर जितवा दिया.

Image caption लक्ष्मी रावत मोहनलालगंज के एक गांव की ग्राम प्रधान हैं.

ज़ाहिर था कि गांववालों के लिए प्रधान अभी भी शंकर यादव ही थे. तो इस बार प्रधान की जगह लक्षमी रावत के नाम से घर पूछा तो एक छोटे से इंटों के घर तक कोई ले गया.

सजी धजी शरमाती हुई लक्ष्मी मिलीं. बिना संकोच के बताया कि सरपंच का सारा काम उनके पति और उनके मालिक ही देखते हैं.

लक्ष्मी ने कहा, "हम उनपर पूरा विश्वास करते हैं, वो सही कागज़ हमारे पास भेजते हैं और हम उसको आगे बढ़ा देते हैं, बाहर का सारा काम वो ही देखते हैं, कुछ बहुत ज़रूरी हो तो बुलवा भेजते हैं."

लक्ष्मी ने बताया कि वो पांचवी तक पढ़ी हैं इसलिए ये सब काम समझ नहीं पातीं.

मैं निकलने लगी तो अपनी साल भर की बेटी को गोद में लेकर बोलीं, "इसे पढ़ाऊंगी, ताकि ये तो कुछ जान बूझ पाए."

'कॉलेज पास होता तो हम लड़कियां रोज़ स्कूल जातीं'

लक्ष्मी के गांव से निकल मैं पास के खुजेता गांव की ओर निकली तो वहां पानी भर रही कुछ औरतों ने बुलाया और पूछने लगीं कि मैं वहां कयों आई हूं.

मैंने बताया तो पानी की बालटी किनारे, परेशानियों का गुबार फूट पड़ा.

रानी रावत बोलीं, "सासंद कोई भी चुन कर आईं हों, यहां रोज़गार कोई नहीं लाया, सालों से दिहाड़ी मज़दूरी कर घर चला रहे हैं, किसी तरह बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं, पर उनकी ज़िंदगी में भी क्या बदलेगा?"

मां की बातें सुन पास खड़ी नेहा रावत की मुस्कान जाती रही. दबी आवाज़ में बताया कि स्कूल पास है तो 11वीं तक की पढ़ाई कर पाई है पर कॉलेज तो शहर में है और रास्ते का किराया और फ़ीस के लिए मां-बाप के पास पैसे नहीं हैं.

मैंने पूछा पढ़ पाईं तो क्या बनाना चाहोगी? तपाक़ से बेली, "प्रधान बनूंगी, पर लक्ष्मी रावत जैसी नहीं, शंकर यादव जैसी - ताक़त वाली असली प्रधान."

नेहा की साफ़ सोच और ऊंची उड़ान से मैं दंग थी. लगा कहीं कुछ तो बदल रहा है. औरतें राजनीति की सीढ़ी चढ़ सकती हैं, ये कल्पना तो लड़कियों के ज़हन में जगह बना पा रही है.

अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित मोहनलालगंज सीट, राज्य के पिछड़े इलाकों में से एक मानी जाती है.

Image caption मोहनलालगंज से सांसद रह चुकीं सुशीला सरोज

2009 से 2014 तक यहां सासंद रहीं सुशीला सरोज मानती हैं कि वहां लड़कियों को पढ़ाने का चलन कम है और प्रधान बनने के बाद भी औरतें अपने मर्दों को ही सत्ता की सारी ताक़त दे देती हैं.

वो बताती हैं, "मैंने अपने कार्यकाल में प्राइवेट डिग्री कॉलेज तो खुलवाए पर पूरे चुनाव क्षेत्र में सिर्फ़ लड़कियों के लिए कोई सरकारी डिग्री कॉलेज अभी तक नहीं है."

ना लड़कियों का कॉलेज, ना बड़ा सरकारी अस्पताल और ना ही रोज़गार देनेवाली कोई बड़ी फैक्टरी - राजधानी लखनऊ से 20 किलोमीटर की दूरी पर फैले मोहनलालगंज क्षेत्र की ये हालत अजीब लगती है.

पर ये भी सच है कि यहां अंदर के गांवों तक पक्की सड़कें बनी हैं, जगह-जगह हैंडपंप हैं और औरतें कम से कम वोट डालने में तो पीछे नहीं हैं.

कुछ गांव ऐसे हैं जहां अभी तक बिजली नहीं है पर कई ऐसे हैं जहां हाल के सालों में ट्रांसफर्मर लगाए गए हैं. छिबऊखेड़ा के लोग सांसद सुशीला सरोज की वाहवाही करते नहीं थकते क्योंकि उनकी बदौलत ही गांव में साल 2013 में बिजली आई.

करीब 100 घरों के इस गांव में पहले किराए पर कार की बैटरी लेकर टीवी चलाने या मोबाइल चार्ज़ करने जैसी ज़रूरतें पूरी की जाती थीं.

अब घरों में बल्ब और पंखे लग गए हैं. अपने घर के बाहर चारपाई पर मां के साथ बैठी प्रियंका यादव अपने फोन में गाने सुनती मिलती है.

प्रियंका गांव की उन दो लड़कियों में से एक है जो दूर शहर के कॉलेज जाकर एम.ए. की पढ़ाई कर रही हैं.

वो बताती हैं, "मैं इसीलिए जा पा रही हूं क्योंकि मुझसे एक साल बड़ी मेरी दोस्त शशि ने एक साल ख़ाली बैठ मेरा इंतज़ार किया ताकि हम दोनों को एक दूसरे का साथ हो और हमारे मां-बाप हमें कॉलेज भेजने में सुरक्षित महसूस करें."

Image caption तस्वीर में छात्रा प्रियंका यादव अपनी मां के साथ दिखाई पड़ रही हैं.

फिर कहती है कि आगे जाकर तो उसकी भी बस शादी कर दी जाएगी. पर जबतक मां-बाप मान रहे हैं, वो पढ़ रही है.

एक आंगनवाड़ी वर्कर और उसकी सहायिका के अलावा प्रियंका के गांव में कोई भी औरत किसी तरीके का रोज़गार नहीं करती.

मां थोड़ा किनारे होती हैं तो हिममत कर प्रियंका मुझसे पूछती है कि मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई कहां से की?

जब जवाब देकर मैं पलटकर पूछती हूं कि वो भी दिल्ली चल पढ़ाई करना चाहेगी क्या?

तो उसके होठों पर हल्की सी मुस्कान बिखर जाती है. उन दबे होठों की मज़बूरी और उन चमकती आंखों की उम्मीद के बीच ही कहीं है मोहनलालगंज की औरतों की कहानी.

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