नोटबंदी के दौर में किसान की टका से भेंट नहीं

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नोटबंदी के इस दौर में क्या आपने किसी किसान से बात की है? नहीं की है तो करिएगा. एटीएम के आगे क़तारबद्ध देश की बातें हर तरफ़ हो रही है लेकिन बिन खाद-बीज के खेतिहर किसानों की बहुत ही कम बात हो रही है.

बिहार के पूर्णिया ज़िले की किसानी मक्का की खेती पर आश्रित है. मक्का के बीज की बुआई 15 नवंबर तक हो जानी चाहिए थी लेकिन इस बार नोटबंदी के कारण बड़ी संख्या में किसानों ने अबतक बुआई नहीं की है.

मेरे गाँव के सुखदेव मक्का की खेती के लिए खेत तैयार करने के बाद जब बीज ख़रीदने के लिए शहर गए तो बीज दुकानदार ने इस बार उधार देने से साफ़ इंकार कर दिया.

सुखदेव बता रहे थे, "मेरा बेटा हाल ही में दिल्ली से आया है. वो तीस हज़ार रूपए लाया था, सभी हज़ार के नोट. मैं दो एकड़ में मक्का की खेती करता हूं. लगभग 25 हज़ार रूपये ख़र्च होते हैं दो एकड़ की खेती में. लेकिन इस बार बेटे की मेहनत की कमाई मैं खेत में नहीं लगा पा रहा हूं. अपना पैसा ही अपना नहीं लग रहा है."

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सुखदेव जैसे लाखों किसान हैं, जो इस बार खेती में पिछड़ चुके हैं. हम इस वक़्त खेत को समय दें या फिर बैंक की क़तार में खड़े होकर नोट बदलें और खाता में पैसा जमा करें.

गाँव के बुज़ुर्ग इस्माइल चाचा ने कहा कि इस बार हम सब बिना खेती किए ही हार चुके हैं.

उन्होंने कहा, "हर साल मौसम की मार पड़ती है लेकिन इस बार हमें सरकार की मार ने तोड़ दिया. तुम ही बताओ यदि हम सब खेती न करें तो क्या करें? इस बार देखना हम सब कहीं के नहीं रहेंगे. छोटे नोट के अभाव में आलू के खेतों में ख़रपतवार ख़त्म करने वाली दवा नहीं दे पा रहे हैं किसान. मक्का की खेती तो चौपट हो ही चुकी है."

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अपनी सुनाऊं तो नक़दी के अभाव में इस बार खेत की जुताई भी ठीक ढंग से नहीं करवाई है.

ट्रेक्टर की जुताई के लिए प्रति घंटा हमें 600 रुपए देने होते हैं. छोटे नोट के अभाव में इस बार खेत को ढंग से तैयार नहीं करवा सके हैं. यही वजह है कि अभी से किसान कह रहा है कि फ़सल उत्पादन प्रभावित होने वाला है. हर साल यदि एक एकड़ से हमारी कमाई तीस हज़ार रूपए होती थी तो इस बार पंद्रह हज़ार रुपए से कम ही हमें खेत देने वाला है.

मक्का के अलावा आलू की खेती को भी बहुत मार पड़ी है. किसान की जो परेशनियाँ है उसे कोई समझने को तैयार नहीं होता है. हम खाद-बीज के दुकानों का चक्कर लगा रहे हैं और बस भाग्य का रोना रो रहे हैं. सब्ज़ी की खेती में हम ख़ूब मेहनत करते हैं लेकिन इन दिनों जब हमें खाद-पानी देना है तब हम परेशान हैं.

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Image caption देश के दूसरे हिस्सों में किसानों को फ़सल का ख़रीददार नहीं मिल रहा है.

यह किसान जहाँ से आप लोगों को अपनी बात सुना रहा है, वहाँ मक्का की खेती से हम पक्के मकान का सफ़र तय करते आए हैं. पहले मक्का, जूट और बाँस ही हमारे लिए एटीएम था लेकिन अब कहानी ही उलट गई है.

पूर्णिया ज़िले की एक कहावत है -"आवरन देवे पटुआ, पेट भरन देबे धान, पूर्णिया के बसैया रहे चदरवा तान. " लेकिन अब नोटबंदी के इस दौर में यह मुहावरा बदल गया है.

किसानों को जो समस्याएँ हो रही है उस पर सरकार को विचार करना चाहिए क्योंकि सारी लड़ाई अन्न की है. ऐसे में हमारे गाँव की एक पुरानी कहावत याद आ रही है - "मारो मन, सुँघाओ पेट, तब करो टका से भेंट..."

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