'कई लोग महिलाओं को काम करते देख ही नहीं सकते'

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बॉलीवुड में कम क्यों हैं महिला गीतकार?

रात के 12 बजे गीतकार अन्विता दत्त लिखती हैं,"सुनो, अभी भी मैं एक संगीत सत्र में हूं, क्या हम कल बात कर सकते हैं?"

गायिका, गीतकार और संगीतकार सोना मोहापात्रा रात 12.30 बजे मैसेज करती हैं,"मैं सुबह आठ बजे से एक कॉन्सर्ट के लिए यात्रा कर रही हूं, मुझे माफ़ करना, जवाब नहीं दे सकी."

और दोपहर 12 बजे बीबीसी के स्टूडियो पहुंची गीतकार कौसर मुनीर कहती हैं,"एक गीत के सिलसिले में कल रात भर नींद नहीं आई और अभी सुबह पांच बजे आँख खुली, थोड़ी-थोड़ी सोई-सोई लग रही हूं न?"

इन तीनों महिलाओं के मैसेज अलग-अलग हैं लेकिन इनकी बातों से ज़ाहिर है कि ये काम में गले तक डूबी हैं, अपने काम में मस्त और जो एक बात इन्हें जोड़ती है वो यह है कि ये तीनों बॉलीवुड में 'दुर्लभ' महिला गीतकार हैं.

बॉलीवुड या हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अक्सर यह आरोप लगता आया है कि यह पुरुष प्रधान है.

हीरो को हीरोइन से ज़्यादा पैसे मिलते हैं, मेकअप दादा हो सकता है दीदी नहीं, महिला फ़िल्म निर्दशक गिन चुन के कुछ ही हैं और अगर बात करें महिला गीतकारों की तो यह उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं.

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50 के दशक में सरोज मोहिनी नैय्यर, माया गोविंद, जद्दनबाई वहीं 90 के दशक में रानी मलिक और आजकल अन्विता दत्त, कौसर मुनीर और सोना मोहापात्रा या रश्मि-विराग (जोड़ी) जैसे नाम ही सामने आते हैं, तो क्या महिला गीतकारों के लिए बॉलीवुड खुला हुआ नहीं है?

इस बात पर जहां फ़िल्मी संगीत से जुड़े पुरुषों की अलग राय है वहीं ख़ुद महिला गीतकार ऐसा नहीं मानती, उनके अनुसार महिलाओं की कमी बॉलीवुड ही नहीं लगभग सभी क्षेत्रों में है.

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बीबीसी से बात करते हुए जानी मानी महिला गीतकार कौसर मुनीर कहती हैं,"नहीं, मैं ऐसा नहीं कह सकती कि बॉलीवुड पितृसत्तातमक है. लोकप्रिय धारावाहिक जस्सी जैसी कोई नहीं लिखने के दौरान मुझे निर्देशक विजयकृष्णन आचार्य ने अपनी फ़िल्म का एक गीत 'फ़लक तक' लिखने का मौका दिया था. उस वक़्त वो टशन फिल्म बना रहे थे."

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Image caption कौसर मुनीर

वो बताती हैं, "ये मौका मुझे मिला क्योंकि उन्होनें देखा कि मैं लिखने का शौक़ रखती हूं और क़ाबिलियत भी. मैंने कोई जेंडर कार्ड नहीं खेला. हां मैं मानती हूं कि लोग महिलाओं को इस रोल में स्वीकार नहीं करते, उन्हें लगता है कि हम सिर्फ़ लड़कियों का हिस्सा लिखती हैं, या फिर हम इस काम को शौकिया कर रही हैं और हमारा मुख़्य काम घर संभालना है, जो कि एक आम सोच भी है."

मशहूर गीतकार जोड़ी जतिन-ललित के ललित पंडित इस पर कहते हैं, "इसमें कोई दो राय नहीं है कि महिला गीतकारों की हमारे पास कमी है, गिने चुने नाम है और अभी अन्विता, कौसर और रश्मि विराग की जोड़ी को छोड़ दो तो कोई भी महिला लगातार नहीं लिख रही है."

ललित कहते हैं, "गीत संगीत का मामला जरा लंबा समय लेता है, कई बार रात हो जाती है, रात से सुबह हो जाती है, हफ़्तों बाहर रहना पड़ता है और हमारे यहां महिलाओं के ऊपर घर परिवार की ज़िम्मेदारी इतनी ज़्यादा होती है कि वो इस प्रेशर को सह नहीं पाती."

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ललित की बात में एक उदाहरण जोड़ते हुए कौसर कहती हैं, "मेरी 15 साल की बेटी है, मेरी कोशिश रहती है कि मैं उसे सुबह लंच पैक कर के दूं. लेकिन फिर प्रीतम जैसे संगीतकारों के यहां काम शुरू ही 12 बजे होता है, अब आप या तो रात स्टूडियो में बिता सकते हैं या घर पर. भारतीय समाज में महिलाओं को कुछ ज़्यादा ही ज़िम्मेदारियां निभानी होती हैं ऐसे में हां, महिला गीतकारों के लिए मुश्किलें हैं."

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Image caption ललित पंडित

लेकिन गीतकारों के मामले में बॉलीवुड को पितृसत्तातमक न कौसर मानती हैं न ललित और शानदार, क्वीन और स्टूडेंट ऑफ़ दि इयर जैसी फ़िल्मों के गीत लिखने वाली अन्विता भी बॉलीवुड का पक्ष लेती हैं, "मेरे, कौसर, प्रिया जैसी गीतकारों से कई सालों पहले सरोज मोहिनी नैय्यर, माया गोविंद जैसी महिलाएं थीं और वो थीं क्योंकि वो टैलैंटड थीं."

अन्विता कहती हैं, "आज टॉप 10 महिला गीतकारों में तीन स्थान महिलाओं के पास हैं ऐसा किसी पुरुष प्रधान समाज में नहीं हो सकता था. चाहे एक पुरूष गीतकार हो या महिला, हमें एक निर्देशक बुलाता है क्योंकि हम ही उस मूड का गाना लिख सकते हैं."

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फ़िल्म 'टशन' में करीना कपूर पर फ़िल्माया एक गीत 'छलिया' अन्विता ने लिखा था वहीं अक्षय और करीना पर फ़िल्माया एक और गीत 'फ़लक तक' कौसर ने लिखा था और टाइटल गीत 'टशन में' विशाल भारद्वाज और पीयूष मिश्रा ने लिखा था.

अन्विता कहती हैं, "इस फ़ील्ड में काम करने वाले लेखक और लेखिकाएं आपस में दोस्त हैं. कोरा काग़ज़ हम सभी के लिए एक मुश्किल है जिससे जूझते हुए हम एक दूसरे फ़ोन करते हैं, एक दूसरे की मदद करते हैं और यह सिर्फ़ बॉलीवुड में ही संभव क्योंकि यहां लोग खुले हैं और अपने टैलेंट से यहां मौजूद हैं इसलिए काफ़ी सुरक्षित महसूस करते हैं, क्योंकि जो वो लिखते हैं, कोई और नहीं लिख सकता."

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वो जोड़ती हैं, "लिंग असमानता दुनिया में हर कहीं है और यह भारतीय फ़िल्म जगत में भी हो सकती है लेकिन मैं इसे ऐसे नहीं देखती, मेरे लिए मैं महिला या पुरुष गीतकार नहीं एक गीतकार हूं जिसे अपना काम करना है. अगर आप यह पहले ही मान लेंगे की इस क्षेत्र में असमानता है तो आप आगे नहीं बढ़ पाएंगे, अगर आप ख़ुद पर भरोसा करें और आप में वाकई टैलेंट हुआ, तो इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप पुरुष हैं या महिला. आप आगे बढ़ सकते हैं."

हालांकि कौसर और अन्विता की बातों से अलग राय रखते हुए लेखक स्वानंद किरकिरे मानते हैं कि बॉलीवुड में महिलाओं को उनका श्रेय मिलने में देरी हुई है.

स्वानंद के मुताबिक़ "कई बार किसी महिला के लिखे गीत को सुनते वक़्त समझ आता है कि शायद यह एंगल गाने में एक पुरूष डाल ही नहीं सकता था. वो हमारे गीतों को एक नया आयाम देती हैं."

स्वानंद कहते हैं, "बॉलीवुड में लेखक औरतों को ऑब्जेक्टिफ़ाई कर देते हैं, शरीर पर बात होती है, रूप पर बात होती है लेकिन उनकी सोच के बारे में तो वही बात कर सकती हैं. बॉलीवुड में उनकी कमी बताती है कि उनके साथ थोड़ी नाइंसाफ़ी तो हुई है"

Image caption सोना मोहपात्रा

बॉलीवुड को ब्वॉयज़ क्लब की संज्ञा देते हुए गीतकार और गायिका सोना मोहपात्रा कहती हैं, "महिलाएं बॉलीवुड ही नहीं लगभग हर क्षेत्र में ऑब्जेक्टिफ़ाई हो जाती हैं. यह महिला है और कुछ निर्धारित काम कर सकती है, यह सोच हमारे समाज में इतनी गहरी व्याप्त है कि आप इसे रातों रात नहीं बदल सकते."

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बॉलीवुड का उदाहरण देते हुए वो कहती हैं, "ऐसा नहीं कि लोग यहां महिलाओं के आने पर पाबंदी लगाते हैं लेकिन कई लोग हैं जो महिलाओं को कुछ क्षेत्रों में काम करते हुए नहीं देख सकते. लोगों को समझना होगा कि महिलाओं के कई रंग है और वो हर क्षेत्र में काम कर सकती हैं. हमें उन्हें आज़ादी देनी होगी, जो अभी घुटन से भरी है."

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महिलाओं की आज़ादी का समर्थन करते हुए कौसर भी कहती हैं, "बॉलीवुड में तो आपको टैलेंट जगह दिला देगा, भले ही आप मर्द हों या औरत, लेकिन समाज में अभी इसके लिए काफ़ी कुछ करना होगा. घरवालों को अपनी घर की महिलाओं का साथ देना होगा. पतियों या साथियों को उन्हें देवी या दासी की उपाधि देने से बचना होगा."

यह बात बिल्कुल सही है कि बॉलीवुड में काम करने के तरीके अलग अलग हैं और इनकी कोई समय सीमा या नियम पाबंदी नहीं है, ऐसे में परिवार की ज़िम्मेदारियों के साथ गाने लिखना मुश्किल हो जाता है, लेकिन संगीतकार अनु मलिक के शब्दों में, "मुश्किल तो सारे ही काम हैं, मुश्किलों से आगे बढ़ने वाला ही यहां (बॉलीवुड) में जगह बनाता है."

बॉलीवुड में लगभग 10 महिला गीतकार सक्रिय हैं जिनमें कौसर मुनीर, अन्विता दत्त, प्रिया पांचाल, सोना मोहापात्रा, शिवानी कश्यप, रश्मि विराग प्रमुख हैं.

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