#100 Women: एक दलित लेखिका का 'अपना कोना'

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वर्जीनिया वुल्फ की किताब 'A Room of One's Own' का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निज को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है.

अपने कमरे को हासिल करने की इसी छटपटाहट को कौशल पंवार अपने जीवन यात्रा के जरिए बता रही हैं:-

मेरा भी घर मे एक कोना होता, उसमें एक टेबल और कुर्सी होती, मै हमेशा इसके लिए तरसती थी. पर मेरे लिए वह कोना सुनिश्चित होना घर के एक हिस्से को घेरे रखने के बराबर होता.

इसमें मेरे मां- बाप की कोई ग़लती नहीं थी, उन्होंने भी तो सारी उम्र घर की इसी कोठरी में बिता दी थी. यह घर ही इसलिए कहलाया गया था क्योंकि इसी घर में सब मिलकर रहते थे, चाहे वह बकरी हो, मुर्गे हों या फ़िर एक कोने में रखा चूल्हा ही क्यों न हो, उसी के साथ सटे रहते थे एल्मुनियम के कुछ बर्तन.

उसी कोठरी में एक कोने में पीने के पानी के लिए एक मटका रखा रहता था, और एक कोने में अनाज को रखने का एक खुटला (एक तरह से मिट्टी की बनी अनाज को संग्रहित करने की टंकी) तो ये थी हमारी कोठरी, जो अन्दर और बाहर से थी जिसका हर एक कोना निश्चित था, इसलिए मेरे लिए उस कोठरी में एक कोना स्थाई रूप से बनना ही बहुत मुश्किल था.

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उस समय का ये मेरा सबसे बड़ा सपना बन गया था कि मुर्गे और बकरी की तरह ही सही मेरा भी एक कोना बना रहे, जो हर दिन मुझे बदलना न पड़े पर नहीं बन सका था. उसी कमरे में मां, दादी और मेरे लिए भी एक कोना नहाने का बन जाता था, जिससे नहाने के बाद साफ़ कर दिया जाता था और उसी में चूल्हे पर खाना भी बनता था.

मैं अपने पढने के लिए खाट पर बैठकर घुटनों को मोड़कर ही उस पर किताब रख कर पढ़ लिया करती थी.

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पढ़ने का जुनून बचपन से ही मैने पाल लिया था. घर में बाहर से कोई सामान कागज में लपेट कर भी आता था तो मैं उस मुड़े-तुड़े कागज को पढने में लग जाती थी.

मेरे चाचा ( मेरे पिता को मैं चाचा ही कहती थी) मेरी इस लगन से बहुत प्रभावित थे. जब भी उनके आगे मैं बैठकर घुटना मोड़कर कभी इधर, कभी उधर करती और किताब लिए घूमना पड़ता तो उनको देखकर अच्छा नहीं लगता था.

एक दिन चाचा ने पूछा कि मुझे क्या चाहिए, मैंने मना कर दिया कि मुझे तो किसी चीज की कोई ज़रूरत नहीं है. वे उठकर बाहर चले गये. कैसे उनको बताती कि मुझे एक कुर्सी और मेज चाहिए जिस पर मैं बैठकर कुछ लिख सकूं और पढ़ सकूं. घर के हालात ऐसे थे नहीं कि मैं उन्हें कह पाती.

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यह घर के लिए भी अनावश्यक चीज थी, जिसे रखने के लिए जगह निश्चित करना भी मुश्किल था. चाचा शाम को घर लौटे तो उनके हाथ में छोटा सा स्टूल था और छोटी सी प्लास्टिक की कुर्सी. मुझे देखकर बहुत हंसी आई. मैं पेट पकड़कर हंसती रही.

चाचा चुपचाप मेरी ओर देखते रहे. जब मैं चुप हुई तो उन्होंने कहा ये लो इस पर पढ़ा करो. ज़मीन पर रखकर बाहर चले गये थे. मैं हंसने के बाद रोने लगी थी, मुझे अजीब सी ग्लानि हुई थी उस वक़्त. जब घर में खाने तक के लाले पड़े थे तो चाचा ये सब मेरे लिए कर रहे थे.

सोचती रही थी कि कही मेरे हंसने से चाचा को बुरा न लगा हो. पर फिर भी मैं बहुत खुश हुई थी, अब मेरा कोना घर में निश्चित हो गया था. हांलाकि स्टूल और कुर्सी का साइज़ छोटा था और मैं अब बड़ी हो चुकी थी, पर चाचा के लिए मैं आज भी छोटी ही थी.

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मां ने कहा भी कि अब ये छोटी नहीं रही इस स्टूल में से पैर बाहर निकल रहे हैं और कुर्सी पर धंस कर बैठी है. चाचा हंसी का कारण समझ गये थे और खुद भी मुस्कराने लगे थे. पर मैं बहुत खुश थी, मेरे मन की मुराद पूरी हुई थी.

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इस तरह मेरा कमरा, यानी वह प्लास्टिक की कुर्सी और छोटा स्टूल , बन गया था पर 'मल्टी परपज' भी बना साथ मे ही. जब भी कोई मेहमान आता था मेरी किताबों को वहां से उतारकर उस पर चाय रखने के लिए दे दी जाती, जिससे मुझे बड़ा खराब लगता था. चाय पी लेने के बाद फ़िर वह मेरा ही बन जाता.

समय गुजरता चला गया और मैं दसवीं में आ गयी थी, पर पढ़ाई के साथ - साथ में अब जो भी आस-पास घट रहा होता, मेरे घर परिवार में जो भी हो रहा होता मैं उसे अब कागजों पर उतारने लगी थी.

जब अपने गुस्से को शांत कर जाती, यूं कहे कि वो पल गुजर जाते, जो मन को बहुत विचलित करते थे, तो उन्हीं कागजों को फ़ाड़ देती थी. मेरे हम उम्र सब जानते थे कि मैं कुछ न कुछ पढ़ाई के अलावा लिखती भी रहती हूं, कभी-कभार वे पढ़ते और मुझे कहते कि अगर किसी ने पढ़ लिया तो बहुत मारेंगे तुझे, स्कूल से निकाल लेंगे और मैं ओर भी डर जाती और फ़ाड़ देती.

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अपने मन की बात कहने और घर के आए दिन झगड़ों से परेशान होकर अपने मन की भड़ास मैं इन कागज के टुकड़ों पर ही निकालती और इसके अलावा अपने भाई सुभाष, जो मुझे दूर रहता था उसे चिट्ठी लिखती रहती. उसमें सब का ज़िक्र होता.

उससे पिछली बार मिलने के बाद की सारी आस -पास घटी घटनाओं को बहुत विस्तार से वर्णन होता, और जब भी वह मिलता तो मैं उसे दे देती थी. ऐसे ही वह भी करता. हमारा एक दूसरे को लिखे पत्र-व्यवहार आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं.

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मैं और मेरा वह स्टूल और कुर्सी, जो अब केवल किताबें रखने के काम आता था, एक ज़रूर और आवश्यक अंग बन गए थे घर का. पर जिसे एक जगह से दूसरी जगह रख दिया जाता था, ठीक उसी तरह जैसे मैं भी अब उसे छोड़कर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पीछे बनी झुग्गी में रहने के लिए आ गयी थी. पर पूरे परिवार में वह स्टूल मेरे नाम से ही जाना गया था.

मैं अब गांव में नहीं थी, पर मेरा स्टूल, मेरा वह कोना, दोनों मैं अपनी विरासत के रूप में अपनी पहचान के रूप में छोड़कर चली आयी थी. विश्वविद्यालय के छात्रावास की फ़ीस बहुत ज्यादा थी, जो मेरे और चाचा के बूते की बात नहीं ही थी.

एमए करना ही था तो पहले कुछ महीने राजौंद और कुरुक्षेत्र के बीच में पड़ने वाले फ़रल, पुंडरी में नानकों के घर पर बिताए जहां पर नानी दूसरों के घरों में काम करके अपनी ज़िन्दगी बिता रही थी.

मुझे भी नानी के साथ बहुत बार सफ़ाई और मैला उठाने के लिए जाना पड़ता था. हम दोनों के लिए रोटी और आचार या कभी कभी सब्जी भी उस गंध को अपने सिर पर ढोकर ले जाने के बदले मिल जाती थी. इस पर विस्तार से कभी फिर लिखूंगी.

ऐसे में मेरी पढ़ाई को नुकसान हो रहा था, तो मैंने चाचा के साथ बात करके वहीं विश्वविद्यालय के छात्रावास के पीछे पड़ने वाली झुग्गी में रहकर पढ़ने की बात की. घर से राशन पानी और छोटा स्टोव और एक थाली, चम्मच, गिलास आदि ये सब लेकर गई.

जितने कम से कम खर्च हो पाए इसकी मेरी कोशिश रही. मां और चाचा की आर्थिक स्थिति क्या है, मैं जानती थी. सबने मना किया था आगे पढ़ने के लिए, बहुत सारे कारणों के साथ एक कारण यह भी तो था कि विश्वविद्यालय की पढ़ाई का खर्चा पूरा नहीं होगा, यह बात मैं और चाचा दोनों ही जानते थे, पर दोनों को ही दृढ़ विश्वास था कि कम से कम खर्च में मैं अपनी आगे की पढ़ाई पूरी कर सकती हूँ.

किताबों पर खर्च करने के अलावा ऐसा कोई खर्च था भी नहीं जो झेला न जा सके. ना कभी अपने आपको सुन्दर दिखाने के लिए प्रयोग होने वाले क्रीम आदि का मुझे शौक था न किसी और चीज का ही शौक़ था, और न ही तन ढकने के अलावा कपड़ों का ही शौक़ था, इसलिए चाचा की सहमति से मैं आ गई थी इस झुग्गी बस्ती में जो चूहड़ों की बस्ती के नाम से भी जानी जाती थी.

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पूरी बस्ती का एक ही टायलेट था और एक ही नल, सुबह के समय बहुत परेशानी होती थी. इन सब का सामना करते हुए मैं अपने बारे में बहुत कुछ लिखती थी. कई डायरियां भर दी. जब कभी सुभाष आता तो उसे दे देती पढ़ने के लिए, जिसमें हर दिन गुजरने वाली पीड़ा, दुःख -तकलीफ़ अभाव भरा हुआ था.

कुछ मन की कोमल भावनाएं होतीं और वह अगली बार मिलता तो खूब रो लेता और अपनी असमर्थता जता जाता, हौसला देता, अपने सपने पूरे करने की कसमें दे जाता, चाचा के खून-पसीने से निकलने और मेरे लिए उंचाई पर पंहुचने के उनके अरमानों को पूरा करने की दुहाई दे जाता. बस अब यही उद्देश्य बन चुका था.

अब मेरा कमरा था मेरे पास, मेरी वह चालीस रुपये में किराये पर ली झुग्गी, जिसे मैं वहीं आस-पास के छात्रों को ट्यूशन पढ़ाकर दे दिया करती थी, उन छात्रों के हालत भी मेरे जैसे ही रहती थी, इसलिए कई बार इस कमरे का किराया भी नहीं दे पाती थी. जिसके कारण बहुत कुछ सुनना भी पड़ता था.

एमए के इस कठिन दौर में मेरे सुख-दुख का साथी, मेरा भाई, मुझे छोड़कर चला गया- टूट गया था, बहुत कुछ अंदर से, कदम भी लड़खड़ा गये थे, पर उसका वह वाक्य कि 'अपनी पढ़ाई को बीच में नहीं छोड़ना, कुछ बनना है, सपनों को पूरा करना है चाहे कुछ भी हो जाए, थकना नहीं, हारना नहीं.'

बहुत कुछ लिखा इस दौरान, मेरे पाठयक्रम की पढ़ाई के अलावा मैं और भी बहुत कुछ करती, यूपीएससी की तैयारी के साथ कविता, कहानियां बल्कि यूं कहूं कि अपना दर्द कागजों पर उतारने लगी थी. पर इनको सहेजने का ख्याल न मुझे पहले आया था, और न इस दौरान, बस अगर इधर-उधर कॉपियों पर लिखा रह गया था थोड़ा बहुत.

अभी समय को एक और झटका देना बाकी था. एमए का पहला साल पास कर लिया था, फ़ाइनल में प्रवेश ले लिया था. मेरे इस झुग्गी वाले कमरे के हर कोने में कुछ साहित्यक पत्र पत्रिकाएं जमा होने लगी थीं. नेट की तैयारी दिन रात कर रही थी.

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लाइब्रेरी खुलते ही दूसरे तले के कोने की कुर्सी पर जाकर बैठ जाती थी और बन्द होने तक वहीं रहती थी. साथ ही साथ यूपीएससी, जो मेरे अपना -सपना था, उसकी भी तैयारी चल रही थी.

चाचा स्कूल में मैडम और सबसे बड़ी डिग्री लेने का सपना देख रहे थे, सुभाष कॉलेज के लेक्चर स्टैंड पर लेक्चर देते हुए देखना चाहते थे और नीचे पटरी रखकर उस पर चढकर भाषण देने का सपना देखते थे- मेरी हाइट छोटी थी, इसलिए पटरी का साहरा लेकर लेक्चर देने का बिम्ब रचते. और मैं- मेरा सपना था यूपीएससी पास करना और बड़ी अधिकारी बनना, जिसके लिए मुफ़्त में चलने वाली कोचिंग भी मैंने चाचा को बिना बताये शुरु कर रखी थी.

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और एक दिन वह भी अपने सपने के साथ इस सफ़र में साथ छोड़कर चले गये अनजान दुनिया में, कभी वापिस न आने के लिए.

बस अब मैं और मेरा कमरा ही रह गये थे, मतलब वह किराये की झुग्गी. अब कुछ भी करने का मतलब नहीं रह गया था, न अब सुभाष का साथ था और न चाचा. बाकी जितने भी रिश्ते थे, वे खून के रिश्ते जरूर थे पर उनसे कभी अपनेपन के दो शब्द नहीं मिले.

अगर कुछ भी मिला था तो वह शक करने वाली निगाहें थीं, जो मेरे गांव आने पर मानो एक ही सवाल पूछती थी कि मैं ......मेरे अन्दर लड़की होने का शेष कुछ बचा भी है या.......सब. और मैं मानो तसल्ली देने के लिए उनसे अपनी सफ़ाई देती कि मैं पढ़ रही हूं और बहुत मेहनत कर रही हूँ- हर बार कि अग्नि परीक्षा, जो मेरे हौसले को तोड़ने के लिए काफ़ी होती थी.

पर अब क्या? सब कुछ ख़त्म..... तीन महीने लगे मुझे इस सदमे से बाहर आने के लिए. पर सबने जैसे अब मेरा साथ देने का मन भी बना लिया था, और सबसे ज्यादा मां मेरे साथ पूरी तरह से जुट गई थी, मानो चाचा ने मां को अब उनकी जगह लेने की कसम दे दी हो, दोनों भाई भी अब मेरे फ़ैसले के साथ थे.

और इस सफ़र में हमसफ़र बनकर आया मेरी जिन्दगी में मुकेश, जिसने मेरे अन्दर के खालीपन को भर दिया, उन्होंने चाचा और भाई का प्यार तो नहीं दिया पर कमी जरूर पूरी कर दी थी, उस मंजिल और सपने को पूरा करने में मेरा साथ दिया.

फिर चाचा के सपने को ज़िन्दगी का मकसद बना लिया और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. हारना मानो मैने बिसरा ही दिया. चाचा का एक एक शब्द अब मेरे जीने के लिए काफ़ी था.

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झुग्गी अब छूट गयी थी, एमए के बाद अब बीएड करने करनाल आ गयी थी. यहां पर भी किराये का अपना कमरा ले लिया था, जब भी मकान मालिक को पता चलता कि मैं 'चूहड़े' समाज की हूं, कमरा छोड़ना पडता. इसी दौरान हमसफ़र को ताउम्र हमसफ़र बनाने का निर्णय लिया और हमने शादी कर ली. शादी के दूसरे दिन ही वापिस उसी कमरे में लौटना हुआ. बीएड करने के बाद एम फ़िल रोहतक से किया और फिर जेएनयू तक का सफ़र.

अपना कमरा न होते हुए भी इन्हीं कमरों में लेखन कार्य चलता रहा.

अब मैं एक अध्यापिका बन गई थी, वो भी चंडीगढ़ जैसे बडे शहर में. पर यहां भी अपना कमरा तो था, लेकिन किराये का. कभी रामदरबार का कमरा तो कभी डड्डूमाजरा का कमरा.

इन सब को पार करते हुए पंहुच गयी थी दिल्ली विश्वविद्यालय में. पर यहां भी कमरा तो मिला पर अपना नहीं, और इसी दौरान जाति व्यवस्था से जूझते हुए अपना घर, अपना कमरा लेने के लिए मजबूर होना पड़ा-पर अटल निश्चय था और सामने मंज़िल.

मैंने सहूलियत न होते हुए भी अपना घर और उस घर में मेरा कमरा हो, ऐसा ठान लिया था. और आज मेरे पास अपना कमरा है, उस कमरे में अपनी पसंद की कुर्सी और टेबल है, पूरा कमरा ही मेरी लाइब्रेरी है, जिसमें पूरे घर के सामान को मिलाकर सबसे ज्यादा जो बनता है, वह पुस्तकें ही हैं. अब मेरे पास मेरा कमरा है, और उसके साथ चाचा की यादे हैं, जो मुझे निरन्तर आगे बढ़ने को प्रेरित करती हैं.

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