'भारत से मोहब्बत करते थे फ़िदेल कास्त्रो'

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Image caption करीब 50 सालों तक फ़िदेल कास्त्रो को ने क्यूबा में शासन किया

90 साल की उम्र में क्यूबा के क्रांतिकारी नेता फ़िदेल कास्त्रो ने दुनिया को अलविदा कह दिया. क्यूबा भले ही दुनिया के मानचित्र पर छोटा सा देश है लेकिन कास्त्रो उतने ही बड़े नेता थे. उनका भारत के साथ अच्छा ताल्लुक था. गुटनिरपेक्ष आंदोलन में कास्त्रो ने सक्रिय भूमिका अदा की थी. कास्त्रो से जुड़ी यादों पर पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह और सीपीआई नेता डी राजा से बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय से बात की.

नटवर सिंह

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कास्त्रो से जुड़ी नटवर सिंह की यादें

मैं फ़िदेल कास्त्रो से चार-पांच दफे मिला था. उनसे दिल्ली और हवाना (क्यूबा) दोनों जगहों पर मिला था. दिल्ली में वह 1983 में आए थे. तब वह गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में हिस्सा लेने आए थे. उस दौरान वह तीन से चार दिनों तक भारत में रहे थे. मैं तब महासचिव था और इंदिरा जी चेयरपर्सन थीं.

ज़ाहिर है उनसे काफी बातचीत हुई थी. हमलोग तब मिलते रहते थे. वह एक छोटे से मुल्क के थे पर उन्होंने दुनिया भर में अपना नाम कर लिया था. 60 साल तक सीआईए ने उनकी हत्या की कोशिश की पर उसे सफलता नहीं मिली.

कास्त्रो दुनिया की बड़ी हस्ती थे. क्यूबा छोटा सा देश है लेकिन अमरीका उसे कभी दबा नहीं पाया. कास्त्रो की छवि अंतरराष्ट्रीय थी. वह जब बयान देते थे तो दुनिया भर में छपता था. उनकी लोग बड़ी इज्जत करते थे. जहां कहीं भी वह जाते थे उन्हें तवज्जो मिलती थी. उन्हें भारतवर्ष से काफी मोहब्बत थी.

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Image caption बतिस्ता को अमरीका का समर्थन हासिल था

क्यूबा में आर्थिक संकट होना बहुत अस्वभाविक नहीं है. अमरीका ने चौतरफा प्रतिबंध लगा दिया था. वहां कुछ जा नहीं सकता था. वहां न दवाई जा सकती थी और न ही खाने के लिए कुछ भेजा जा सकता था. ऐसे में क्यूबा क्या करता. इसके बावजूद 100 फ़ीसदी लोग शिक्षित हैं. सभी नागरिकों को मुफ्त में मेडिकल सुविधा मिलती है. क़ानून व्यवस्था काफी दुरुस्त है. मैं यह नहीं कह रहा कि वहां कोई कमी नहीं थी. उन्होंने अपने विरोधियों को जेल भेजा था.

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अमरीका ने दुनिया भर में कितने तानाशाहों को बढ़ाया है. कास्त्रो के पहले क्यूबा में बतिस्ता था, जो कि अमरीका का चमचा था. उसने काफी लोगों की हत्या की थी. कास्त्रो होशियार नेता थे. आख़िरी वक्त में वह अपनी सेहत से जूझ रहे थे. उन्होंने देख लिया था कि दुनिया इतनी बदल गई है और उनकी विचारधारा ही काफी नहीं है. उन्होंने अपने भाई से कहा कि जिम्मेदारी संभाल लीजिए.

उनकी जगह अब कोई नहीं ले सकता है. फ़िदेल कास्त्रो तो एक ही था. कास्त्रो क्यूबा था और क्यूबा कास्त्रो था. अब उनकी जगह कोई आ ही नहीं सकता है. क्या कोई महात्मा गांधी की जगह ले सकता है? मैं यह नहीं कह रहा कि कास्त्रो महात्मा गांधी थे. मैं बस इस मामले में मिसाल दे रहा हूं. क्यूबा में इनकी जगह कोई ले ही नहीं सकता है. कास्त्रो को दुनिया भूल नहीं पाएगी.

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Image caption कास्त्रो की सेना 1959 में हवाना पर धावा बोला था

डी राजा

फ़िदेल कास्त्रो दुनिया के बड़े कम्युनिस्ट नेता थे. यह केवल क्यूबा के लिए ही नुकसान नहीं है बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है. क्यूबा में क्रांति कर कॉमरेड कास्त्रो ने दुनिया को एक नई राह दिखाई थी. कास्त्रो के नेतृत्व में क्यूबा एक आधुनिक समाजवादी राष्ट्र बना था.

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कास्त्रो का निधन पूरी दुनिया के लिए क्षति: डी राजा

कास्त्रो का तीसरी दुनिया के देशों के साथ गहरा लगाव था. वह इंडिया से प्यार करते थे. अफ़्रीकी देशों के साथ भी कास्त्रो का अपनापन वाला लगाव था. ज़ाहिर है फ़िदेल कास्त्रों का नहीं रहना बड़ा नुक़सान है. लेकिन उन्होंने अपने पीछे एक महान विरासत छोड़ी है. वह एक महान हस्ती थे. वह क्रांति की आकांक्षा रखने वाले सभी लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं. दुनिया भर के पीड़ितों में उम्मीद का नाम कास्त्रो है.

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Image caption क्यूबा में कास्त्रो की लोकप्रियता सिर चढ़कर बोलती है

फ़िदेल कास्त्रो कालजयी महान नेता रहेंगे. इसमें कोई शक नहीं है. वह 20वीं और 21वीं शताब्दी के महान नेता थे. ऐसा इसलिए है कि वह समर्पित क्रांतिकारी थे. उनमें किसी भी तरह का कोई स्वार्थ नहीं था. कास्त्रो जननेता थे. लोगों ने कास्त्रो को काफी प्यार दिया. दुनिया की राजनीति में कास्त्रो का अहम योगदान रहा है. गुटनिरपेक्ष आंदोलन में कास्त्रो ने बढ़ चढ़कर भूमिका अदा की थी.

उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ मिलकर अच्छा काम किया था. उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के साथ विकाकशील देशों को जोड़ा था.

उन्होंने क्यूबा में मेडिकल और शिक्षा को लेकर जो काम किया वह दुनिया भर के लिए मिसाल है. क्यूबा के डॉक्टर अफ्रीकी देशों में काम कर रहे हैं.

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जब कास्त्रो ने इंदिरा गांधी को गले लगाया

1978 में मैंने क्यूबा में एक रैली में उन्हें सुना था. उस स्पीच के बाद जो कॉमरेड कास्त्रो की मेरे मन में छवि बनी वह आज भी कायम है. उन्हें भारत और भारतीयों से काफी प्यार था. आज दुनिया भर की पूंजावादी अर्थव्यवस्था संकट में है. ऐसे में एक विकल्प की तलाश है और कास्त्रों ने इस विकल्प पर काफी वक्त दिया था.

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