कतारों का असली दर्द मध्य वर्ग को नहीं पता

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Image caption लाइन का दर्द सच में समझता है मध्य वर्ग

उस दौर को बीते बहुत लंबा समय नहीं हुआ है जब भारतीय ज़रूरी सामान और सेवाओं के लिए लाइनों में घंटों खड़े रहते थे. मुझे याद है कि 'उचित कीमत' वाली दुकानों, सड़क के किनारे लगे नलों, सिनेमा घरों और बिजली ऑफ़िस के बाहर कैसे लंबी लाइनें लगती थीं.

लोग सस्ती खाद्य सामग्री और ईंधन, पानी भरने, सिनेमा और बिलों के भुगतान के लिए लंबी लाइनों में लगते थे. पोस्ट ऑफ़िस से पत्र भेजने के लिए भी लाइन में इंतजार करना पड़ता है.

इसमें स्टैंप खरीदने और पत्रों की जांच के लिए लाइन में लगकर इंतज़ार करना शामिल है. यहां तक कि मरने के बाद अंत्येष्टि के लिए भी लाइन में खड़ा होना पड़ता है.

भारतीय अर्थव्यवस्था अभावों में ही रही है. यहां तक कि संपन्न लोगों को एक कार और टेलीफ़ोन के लिए भी सालों इंतजार करना पड़ता था. इन लाइनों का सीधा संबंध आपूर्ति में कमी से है.

जब आप लंबी दूरी का फ़ोन लगाते थे तो जर्जर हालत में सरकारी नेटवर्क से एक ऑटोमैटिक आवाज़ आती थी कि आप कतार में हैं. ये सारी लाइनें बहुतों को व्लादिमीर सोरोकिन के उपन्यास के 'द क्यू' का याद दिलाती है.

इसमें स्टालिन के समय में सोवियत यूनियन में उन अंतहीन लाइनों का जिक्र है. इस उपन्यास में लिखा गया है कि पूरा सोवियत यूनियन कतारों में तब्दील हो गया है.

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इंडिया पिछले 25 सालों से आर्थिक तरक्की की राह पर है. इस तरक्की के क्रम में जिन्हें लाइनों की आदत थी वे गायब होते गए. हालांकि लाइनों में फिर भी लोग बचे हुए हैं. पूजा के लिए श्रद्धालुओं की लंबी लाइनें खत्म नहीं हुई हैं.

शौचालयों में लाइन लगती है. अब भी भारत अभावग्रस्त है. पिछले दो हफ्तों से भारत में लगने वाली लाइनें काफी सुर्खियों में हैं.

सरकार ने देश की करेंसी के दो बड़े नोटों (500 और 1000) को अमान्य करार दिया था. सरकार के इस फ़ैसले के कारण कुल करेंसी का 86 फ़ीसदी हिस्सा बेकार हो गया था. इन नोटों को बदलने के लिए बैंकों के बाहर लंबी लाइनें लग रही हैं.

ये लाइनें किसी समाजवादी नियंत्रण वाली अर्थव्यव्स्था की याद दिलाती मालूम पड़ती हैं.

Image caption अभावग्रस्तता से जूझ रही है भारतीय अर्थव्यवस्था

कैश के लिए लगने वाली लाइनों पर भारत में चर्चा गर्म है. हालांकि इसमें कुछ भी हैरान करने वाला नहीं है.

बहुतों का मानना है कि सरकार के इस क़दम से ग़रीबों को बहुत ज़्यादा नुकसान हुआ है.

विपक्ष के एक नेता ने ट्वीट कर कहा, 'ज़ाहिर है स्टैंडअप इंडिया को भारी कामयाबी मिली है. सभी भारतीय एक लाइन में खड़े हैं.'

अन्य लोगों ने सरकार पर निशाना साधा कि लोग अपना ही पैसा नहीं निकाल सकते हैं. लाइन ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि भारतीयों में सब्र है.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा आगाह किए जाने के बावजूद लाइनों में कोई फसाद नहीं हुआ.

हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि तीन दर्जन से ज़्यादा लोगों ने लंबे समय तक लाइन में लगने कारण दम तोड़ दिया. हालांकि लोगों ने काफी हद तक ख़ुद को सब्र के साथ व्यवस्थित रखा.

ग़रीब लोग तो ख़ुद को कंबल में लपेटे बैंकों को बाहर तड़के ही लाइन में लग जाते हैं ताकि कुछ पैसे निकाल वो अपनी दैनिक ज़रूरतें पूरी कर सकें.

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Image caption भारत में लाइन में घंटों इतजार करना कोई नई बात नहीं है

लाइनों में भारतीयों ने अपने लिए जुगाड़ का भी खूब इस्तेमाल किया.

लोगों ने पैसे देकर अपना काम कराने के लिए दूसरों को लाइन में लगाया.

इस काम के लिए 90 रुपये प्रति घंटे भुगतान किया गया. ये लाइनें सामाजिक जुड़ाव के रूप में भी सामने आईं.

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ लोगों को पुराने दोस्त मिले और उन्होंने अगली मुलाक़ात की योजना बनाई. लोग लंबे इंतजार के कारण मैट और लंच बॉक्स भी साथ में लाने लगे.

रिपोर्ट्स के अनुसार ये लाइनें लोगों के लिए सुस्ताने, सामाजिक रूप से जुड़ने और साथ होने का ज़रिया बन गईं. लोगों की मदद पहुंचाने में दिलचस्पी रखने वालों ने पानी, चाय, बिस्कुट और अन्य ज़रूरी चीज़ों को मुफ्ट में बांटना भी शुरू कर दिया.

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इन लाइनों के साथ कुछ परेशान करने वाली चीज़ें भी जुड़ीं. आर्थिक तंगी के कारण एक दूल्हा अपनी शादी के दिन ही ख़ुद को असहाय पाया.

एक महिला ने लाइन में अपने पूर्व प्रेमी को देखा और उसने अपने परिवार वालों को फ़ोन कर दिया. पूर्व प्रेमी को लाइन में ही पीट दिया गया.

एक जानी-मानी लेखिका ने लिखा है वह लाइन में लगने से परेशान नहीं होती हैं. वह लोगों के अगले उपन्यास के मसाला के रूप में देखती हैं.

अजय गांधी पुरानी दिल्ली में लगने वाली लाइनों पर 19 महीनों से रिसर्च कर रहे हैं. वह भारत में लगने वाली लाइनों में सब्र, कुंठा, संतोष और मज़ाकिया माहौल देखते हैं. यह मध्यवर्ग के लिए दूसरों की ज़िंदगी को समझने का मौका भी है.

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Image caption 500 और 1000 को नोटों को रद्द करने से अफरातफरी

एक पत्रकार लाइन लगे बिल्कुल साधारण और संकोची चेहरों को याद करते हुए कहती हैं कि उनके पास न तो काला धन है और न ही सफेद. ये अच्छाई और ईश्वर पर भरोसा करने वाले लोग हैं.

ये हंसते हैं, रोते हैं, चिल्लाकर बात करते हैं. ये हर तरह के जुगाड़ जानते हैं. ये जहां ज़रूरत पड़े वहां मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं. एक और ने लिखा है कि कैश लाइन में पहली बार उन्होंने इस देश के नागरिक की तरह व्यवहार करना सीखा. एक दोस्त ने कहा कि कैश लाइन ने सबको एक समतल ज़मीन पर खड़ा कर दिया.

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हालांकि यह पूरी तरह से सच नहीं है. वाकई में मध्य वर्ग और संपन्न लोग कभी भारत में लगने वाली लाइनों का हिस्सा नहीं रहे.

बंटे हुए और विषम समाज में परिवार, जाति और परिजनों के नेटवर्क के कारण इन्हें हमेशा बिना पसीना बहाए चीजों को हासिल करने में मदद मिली है. इसके साथ ही लाइनें अक्सर जेंडर और सामाजिक दबदबे के हिसाब से रही हैं.

महिला, वीआईपी, पेंनशभोगी और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए अलग लाइनें रही हैं. मतदान करने के लिए ही एक ऐसी लाइन भारत में लगती है जिसमें सारे लोग एक साथ होते हैं.

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Image caption विमुद्रीकरण के बाद विपक्ष के निशाने पर है सरकार

दिल्ली में रहने वाले समाजविज्ञानी संजय श्रीवास्तव ने मुझसे कहा कि लाइनों से लोकतंत्र और समतावाद को बढ़ावा मिलता है, यह भारत के लिए धोखा है.

उन्होंने कहा, ''मध्य वर्ग और मीडिया कई बार लाइनों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करता है. यह हम सबके लिए एक अस्थायी मामला है. यदि हमें हर दूसरे दिन ज़रूरी सामनों के लिए ऐसा करना पड़े तो ऐसी प्रतिक्रिया नहीं होती.''

संजय बिल्कुल सही हैं. जिन्हें लगता है कि कैश कतार के कारण एक नए समाज और नागरिकबोध का जन्म हो रहा है, तो वो इसे बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहे हैं. उन्हें ऐसा लगता है तो सरकारी हॉस्पिटलों की लाइनों का हिस्सा बनना चाहिए. कोर्ट में लगने वाली लाइनों में शरीक होना चाहिए.

इन दोनों जगहों पर लाखों लोग इलाज और इंसाफ के लिए इंतजार कर रहे हैं. जो रातों में जगकर पानी के लिए लाइन में लग रहे हैं वहां इन्हें जाना चाहिए. मैंने सूखे प्रभावित भारत के हिस्सों में ऐसी स्थिति देखी है. लाइन में लगने का असली दर्द ये जानते हैं. इन लाइनों से वे अब भी दूर नहीं हो पाए हैं.

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