#100Women: 'बिना मौके को भुनाए औरत पहचान नहीं बना सकती'

"आमतौर पर केक बनाना, कुकिंग करना महिलाओं का जन्मजात काम माना जाता है और इसे लोग गंभीरता से नहीं लेते. लेकिन मेरे चार कैफ़े हैं और आपको बता दूं कि इन्हें चलाने के लिए मुझे 13-14 घंटे काम करना पड़ता है."

मुंबई की मशहूर बेकरी और कैफ़े 'ल 15' की मालकिन पूजा धींगरा से बीबीसी ने बातचीत में कहा कि महिलाएं पुरुषों से काफ़ी ज़्यादा काम करती हैं.

वो कहती है कि इसके बावजूद, क्योंकि ख़ाना बनाना घरेलू काम है, इसलिए इसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है.

सात साल पहले मुंबई के बांद्रा इलाके से एक पेस्ट्री और मैकरून शॉप की शुरूआत करने वाली पूजा के घर में ख़ाना बनाना या बेकिंग कोई पेशा नहीं था.

उनका कहना है, "मेरी मां को केक बनाने का शौक था और उनके साथ ही मुझे भी यह लत लग गई."

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वो आगे कहती हैं, "मेरे घरवालों ने देखा कि मुझे इस काम में मज़ा आता है तो उन्होंने मुझे सलाह दी की मुझे इसके बारे में पढ़ाई करनी चाहिए. घर से इतना सपोर्ट मिला और मुझे पढ़ने के लिए पेरिस भेजा गया जहां से मैंने यह सीखा."

मुंबई में पूजा के चार कैफ़े में 80 लोग काम कर रहे हैं.

वो कहती हैं, "मुझे खासी ज़िम्मेदारी का एहसास होता है, मैं जानती हूं कि कैसे हमारे देश में लोग महिलाओं के हाथों में बड़ी जिम्मेदारी सौंपने में संकोच करते हैं. ऐसे में समाजिक दबाव तो है ही, साथ ही इन 80 लोगों के मन में यह भरोसा बनाए रखना होता है कि वो एक सक्षम व्यक्ति के साथ काम कर रहे हैं."

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पूजा के साथ काम करने वाली चांदनी कहती हैं, "महिला बॉस के साथ काम करने के फ़ायदे हैं. वो एक महिला होने के नाते आपको समझती हैं. एक मालिक होने के नाते उन्हें जितना ग़ुस्सा करना चाहिए वो करती हैं, लेकिन वो बेवजह ग़ुस्सा नहीं करती हैं और उनको देखकर मुझे भी प्रेरणा मिलती है."

पूजा मानती हैं कि पुरूष-प्रधान समाज में जगह बनाने के लिए ज़्यादा ज़रूरी है कि महिलाएं अपने काम को गंभीरता से लें.

वो कहती हैं, "आज महिलाओं को मौके मिल रहे हैं. अपने अनुभव से मैं आपको बताती हूं कि जब मेरे पिता ने पूछा कि क्या तुम कुकिंग को एक व्यवसाय के रुप में अपनाना चाहोगी, तो मैंने इंकार नहीं किया."

पूजा कहती हैं, "महिलाओं को भी समझना होगा कि वो जो भी काम कर रही हैं, उस काम में उन्हें पूरी मेहनत और मन लगाना होगा. बिना मौकों को भुनाए और काम किए वो पहचान नहीं हासिल कर सकती हैं."

वो बताती हैं कि भारतीय समाज में बॉलीवुड और अन्य क्षेत्रों की तरह व्यावसाय के लिए कुकिंग में भी पुरूषों का बोलबाला था.

पूजा बताती हैं, "अगर दो या तीन कैफ़े को छोड़ दें तो ज़्यादातर कैफ़े पुरूषों के हैं या पारिवारिक सहयोग से चल रहे हैं. लेकिन घरों में तो खाना बनाना महिलाओं का ही काम है. तो फिर वो क्यों नहीं उसे अपनी आजीविका का साधन बनाएं?"

पूजा चाहती हैं कि एक अकेली लड़की के 'मैकरून क्वीन' बनने की कहानी से यदि कोई महिला प्रेरित होती है तो उनकी मेहनत का एक फल वह भी होगा.

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