नोटबंदी : जाने माने अर्थशास्त्री और बौद्धिक क्या कहते हैं

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर की रात 500 और 1000 के नोटों को बंद करने का ऐलान किया. नोटबंदी के फ़ैसले पर किसी ने सवाल उठाए तो किसी ने समर्थन किया.

जहां तक देश के जाने-माने अर्थशास्त्रियों की बात है, वे नोटबंदी के मसले पर बंटे हुए हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह

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मैं नोटों को रद्द किए जाने के उद्देश्यों से असहमत नहीं हूं, लेकिन इसे ठीक तरीके से लागू नहीं किया गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दलील दे रहे हैं कि काले धन पर लगाम कसने, जाली नोटों के प्रसार को रोकने और चरमपंथी गतिविधियों को मिलने वाले पैसों को नियंत्रित करने का यह तरीका है. मैं इन उद्देश्‍यों से असहमत नहीं हूं. लेकिन मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि नोटबंदी की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर कुप्रबंधन किया गया है. इसके बारे में समूचे देश में कोई दो राय नहीं है.

ये कहा जा रहा है कि लंबी अवधि में इस कदम का फायदा होगा. ऐसा कहने वालों को मैं जाने माने अर्थशास्त्र के दार्शनिक कीन्स के शब्द याद दिलाता हूं कि आखिर में तो हम सबको मर ही जाना है.


नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले की आलोचना की.

उन्होंने सरकार के नोटबंदी के इरादे और उसे लागू करने के तरीके पर सवाल उठाया है. उन्होंने कहा है यह "निरंकुश कार्रवाई" जैसी है.

केवल एक सत्तावादी मानसिकता वाली सरकार ही लोगों को इस तरह की तकलीफ दे सकती है. लोगों को अचानक बताना कि उनके पास जो करेंसी है उसका इस्तेमाल नहीं हो सकता, सत्तावादी प्रवृति को जाहिर करता है. लाखों बेगुनाह लोग अपने खुद के पैसे वापस लाने की कोशिश में पीड़ा,असुविधा और अपमान झेल रहे हैं.


नंदन निलकेणी ने एनडीटीवी से कहा है कि नोटबंदी से डिजिटल लेन-देन बढ़ेगा.

नोटबंदी के लंबी अवधि में फायदे भी होंगे. निलकेणी कांग्रेस सरकार में आधार कार्ड योजना के प्रमुख थे और उन्हें कैबिनेट दर्ज़ा प्राप्त था.

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500 और 1000 के पुराने नोट के चलन को बंद करने से दिक्कत तो होनी ही थी. लेकिन यह वित्तीय समावेशन के लिहाज से बड़ा कदम है. इससे अर्थव्यवस्था में लोगों की भागीदारी बढ़ेगी. लेन-देन के डिजिटल होने से अल्पकालिक मंदी के लिए फायदेमंद होगा. और तकनीक को अपनाने से लंबी अवधि के फायदे मिलेंगे. भुगतान का एक तरीका होने से देश को बड़े पैमाने पर फायदा होगा.

यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह ने आधार सिस्टम शुरू किया था. मैं प्रधानमंत्री मोदी के प्रति भी आभारी हूं कि वे इस सिस्टम को आगे बढ़ाया और कई योजनाओं में लागू किया.


अरविंद पनगड़िया, जाने-माने अर्थशास्त्री और नीति आयोग के उपाध्यक्ष

नकदी की दिक्कत तीन महीने तक रहेगी.

केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले से देश के भीतर आर्थिक गतिविधियां और वृद्धि दर प्रभावित होंगे. और ऐसा हो रहा है. यह सिस्टम में नकदी की कमी के कारण हो रहा है. ये कमी तीन महीने तक बनी रह सकती है.

समस्या धीरे-धीरे सुलझाई जा रही है, प्रणाली में नकदी डाली जा रही है. साथ ही उन्होंने कहा कि सिस्टम में नकदी की स्थिति एक पखवाड़े पहले की तुलना में अब काफी बेहतर है.


ज्यां द्रेज का कहना है कि एक विकसित होती अर्थव्यवस्था में डिमॉनिटाइजेशन रेसिंग कार की टायर में गोली मार देने जैसा है.

केवल विमुद्रीकरण (डीमॉनिटाइजेशन) से ग़ैरक़ानूनी आमदनी बंद नहीं हो सकती. इससे केवल ग़ैरक़ानूनी ढंग से जमा बैंक नोट को निशाना बनाया जा सकता है, लेकिन ऐसे नोट शायद बहुत ज़्यादा नहीं होंगे. क्योंकि ऐसी आमदनी वाले लोग सूटकेस में पैसा रखने से बेहतर उपाय जानते हैं. वे इन पैसों को खर्च कर देते हैं, निवेश करते हैं, दूसरों को कर्ज़ दे देते हैं या फिर दूसरे तरीकों से उसे बदल लेते हैं. वे इन पैसों से ज़मीन जायदाद खरीदते हैं, शाही अंदाज़ में शादी करते हैं, दुबई जाकर ख़रीददारी करते हैं या फिर राजनेताओं का समर्थन करते हैं.

नज़रिया : नोटबंदी लोगों के ऊपर खेला गया जुआ है.

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नोटबंदी के फ़ैसले को बढ़चढ़ कर बताने वाली सरकार इसके नुक़सान को कमतर बताने की कोशिश कर रही है. कुछ नुकसान तो साफ़ दिखाई दे रहे हैं- लंबी कतारों में लोग समय जाया कर रहे हैं, गैर संगठित क्षेत्रों में पैसों की कमी हो गई है, मज़दूरों का काम छिन गया है और कई लोगों की मौत भी हुई है.

अर्थव्यवस्था पर इसके गंभीर परिणाम भी जल्द महसूस किए जाएंगे. कुछ रिपोर्टों में बताया जा रहा है कि ग्रामीण बाज़ार में मंदी महूसस की जा रही है.


रुचिर शर्मा, मॉर्गन स्टेनली के मुख्य वैश्विक रणनीतिकार

उनका कहना है कि इससे भले आज कुछ छिपा हुआ धन खत्म हो जाए लेकिन संस्कृति और संस्थाओं में गंभीर बदलाव नहीं होने से आने वाले कल में काले धन की अर्थव्यवस्था फिर से पैदा होगी.

अपने सिस्टम से सिर्फ काले धन को मिटाकर भारत विकास की उम्मीद नहीं कर सकता है. निश्चित रूप से कोई दूसरा देश भी नहीं है जहां ऐसा हुआ हो. रुचिर का कहना है कि दूसरे कम आय वाले देशों की तरह भारत की इकानॉमी कैश पर निर्भर करती है. भारत की बैंकिंग और कर संस्थाओं में कमी है. लेकिन ये कमी इतनी भी नहीं है कि भारत में नोटबंदी जैसे कदम की जरूरत थी.

सोवियत संघ, उत्तरी कोरिया और ज़िम्बाब्वे जैसे देश बड़े बिल खत्म करने के लिए कठोर कदम उठा चुके हैं लेकिन ज्यादा से ज्यादा देशों में नतीजा अति मुद्रा स्फीति जैसी स्थिति हुई है.

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प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है.

देशभर में एक खास तरह का राष्ट्रवादी प्रोजेक्ट फैलाया जा रहा है, हर तरह के व्यक्तित्व को खांचों में बांटा जा रहा है.

हर नागरिक को या तो देशभक्त या अपराधी के रूप में देखा जा रहा है. उनके व्यक्तिगत जीवन का इतिहास, उनके बैंक खाता कहां है, कितना कैश वे इस्तेमाल करते हैं या वे एटीएम से कितनी दूर रहते हैं, इस पूरी प्रक्रिया में इन सवालों को दरकिनार कर दिया गया है.

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