क्या रेप जितनी बड़ी समस्या है 'डोमेस्टिक वायलेंस'?

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ये सवाल आपको विचलित भी कर सकता है और उत्तेजित भी, पर इसे पूछने की एक ख़ास वजह है.

रेप यानी बलात्कार को हम सभी हिंसा का एक गंभीर रूप मानते हैं. साल 2015 में भारत में बलात्कार के 34,651 मामले पुलिस के पास दर्ज हुए.

लेकिन उसी साल महिलाओं के ख़िलाफ़ उनके 'पति या उसके रिश्तेदारों की बर्बरता' या जिसे आम भाषा में 'डोमेस्टिक वायलेंस' कहते हैं, उसके 1,13,403 मामले पुलिस में दर्ज हुए.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (नैशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो) के दस साल पुराने आंकड़े भी देखें तो भी ये अनुपात ऐसा ही दिखेगा.

पुलिस में दर्ज मामलों में 'डोमेस्टिक वायलेंस' की तादाद बलात्कार के मामलों से कहीं ज़्यादा दोगुनी या तिगुनी तक रही है.

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लेकिन 'डोमेस्टिक वायलेंस' के बारे में ज़िक्र कम होता है और उससे जूझ रही महिला को बलात्कार की पीड़ित महिला जैसी सहानुभूति तो बिल्कुल नहीं मिलती.

समाज उन पर हिंसा को छिपाने और शादी को बचाए रखने का दबाव बनाता है. ज़्यादातर औरतें या तो शिकायत ही नहीं करती हैं या कई सालों तक लगातार हिंसा झेलने के बाद कुछ कहने की हिम्मत कर पाती हैं.

ऐसा रवैया सिर्फ़ भारत में ही नहीं है. पिछले हफ़्ते अफ़्रीकी देश मोरोक्को के एक टीवी चैनल ने एक कार्यक्रम में महिला के चेहरे से मेक-अप के ज़रिए घरेलू हिंसा के निशान मिटाने की टिप्स दीं.

सोशल मीडिया में तीखी आलोचना के बाद ही चैनल ने माफ़ी मांगी और वो वीडियो अपनी वेबसाइट से हटाया.

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घरेलू हिंसा की बर्बरता यदि शादी में बलात्कार का रूप ले ले, तब तो इसे छिपाने का दबाव और बढ़ जाता है.

संयुक्त राष्ट्र पॉपुलेशन फ़ंड के मुताबिक़ भारत में 75 फ़ीसदी विवाहित महिलाओं के पति उनका बलात्कार करते हैं.

भारत में 'मैरिटल रेप' ना बलात्कार की क़ानूनी धारा में शामिल है और ना ही पति या उसके रिश्तेदारों की बर्बरता की आईपीसी धारा 498(ए) में शामिल है.

हाल ही में महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने 'मैरिटल रेप' को बलात्कार के क़ानून में शामिल करने से असहमति जताई थी.

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उन्होंने कहा था, "भले ही पश्चिमी देशों में मैरिटल रेप की अवधारणा प्रचलित हो लेकिन भारत में गरीबी, शिक्षा के स्तर और धार्मिक मान्यताओं के कारण शादीशुदा रेप की अवधारणा फिट नहीं बैठती."

ऐसी सूरत में अगर कोई औरत पति के ख़िलाफ़ यौन हिंसा या बलात्कार का आरोप लगाना चाहे तो धारा 498(ए) के तहत उसे बस बर्बरता का नाम दे सकती है.

498(ए) की धारा में पति या उसके रिश्तेदारों के ऐसे सभी बर्ताव को शामिल किया गया है जो किसी महिला को मानसिक या शारीरिक नुक़सान पहुंचाए या उसे आत्महत्या करने पर मजूबर करे.

दोषी पाए जाने पर इस धारा के तहत पति को अधिकतम तीन साल की सज़ा का प्रावधान है. बलात्कार के क़ानून में अधिकतम उम्र क़ैद और जघन्य हिंसा होने पर मौत की सज़ा का प्रावधान है.

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1983 की आईपीसी धारा 498(ए) के दो दशक बाद साल 2005 में सरकार ने घरेलू हिंसा की शिकायतों के लिए 'प्रोटेक्शन ऑफ़ वुमेन फ़्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस' नाम का एक नया क़ानून भी बनाया.

इसमें गिरफ़्तारी जैसी सज़ा नहीं बल्कि जुर्माना और सुरक्षा जैसी मदद के प्रावधान हैं. क़ानून लाए जाने के बाद भी साल 2015 में इस धारा में 461 मामले ही दर्ज हुए.

जानकारों के मुताबिक महिलाएं जब शादी के अंदर हो रही हिंसा की पुलिस में शिकायत करती हैं तो साथ रहने के तरीकों की जगह जेल की सज़ा जैसी मदद चाहती हैं.

लेकिन ये साफ़ है कि औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा के पैमाने पर, घर की चारदीवारी के अंदर होनेवाली बर्बरता अब भी सामाजिक दबाव के चलते किसी निचले पायदान पर ही है.

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