#100Women: मां का वो 10 रुपये का नोट और रियो में गोल्ड

तमिलनाडु के सेलम ज़िले का एक छोटा सा गांव थीवातिपत्ती को सितंबर 2016 से पहले देश और दुनिया में शायद ही कोई जानता हो.

इस गांव के मरियप्पन थंगावेलु ने रियो डी जनेरियो में सितंबर में हुए पैरालिंपिक में स्वर्ण पदक हासिल किया था. उन्होंने ऊंची कूद में यह स्वर्ण पदक हासिल किया था.

पैरालिंपिक में शारीरिक रूप से विकलांग लोग हिस्सा लेते हैं. पैरालिंपिक खेल, ओलंपिक गेम्स के ठीक बाद होता है और इसके लिए ओलंपिक स्टेडियमों और दूसरी सुविधाओं का इस्तेमाल किया जाता है.

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21 साल के मरियप्पन थंगावेलु ने एक दुर्घटना में अपना दायां पांव गंवा दिया था. उस वक्त वो महज पांच साल के थे.

लेकिन शारीरिक रूप से अपंग होने पर भी उनके हौसले में कोई कमी नहीं आई.

मरियप्पन की मां सरोजा ने उनकी परवरिश सब्जियां बेचकर अकेले ही की हैं.

उनकी मां सरोजा कहती हैं, "मेरे कई रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने मुझे अपमानित किया. यहां तक कि मेरा बहिष्कार भी किया गया क्योंकि मैं एक विकलांग बच्चे को पाल रही थी. ऐसे मुश्किल वक़्त में मेरे पति ने भी मेरा साथ छोड़ दिया था."

वो अपने मुश्किल वक़्त के बारे में बताती हैं, "मेरे लिए किराए पर घर लेना भी मुश्किल हो गया था. ज्यादातर मकान मालिक ऐसे थे जो मेरी जैसी हालात की मारी औरत को घर नहीं देना चाहते थे. दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम करने लिए जूझना पड़ रहा था. ऐसे भी दिन थे जब मेरे पास अपने तीनों बेटों को खिलाने के लिए सिर्फ़ थोड़ा सा दलिया हुआ करता था. वे दोपहर में स्कूल में सरकार की ओर से मिलने वाले खाने पर पले-बढ़े हैं."

आज सरोजा का सिर गर्व से ऊंचा है. एक परंपरागत समाज में अकेली मां के तौर पर उनके लिए ज़िंदगी चुनौतियों से भरी हुई थी.

वीडियो में देखें:- पैरालिंपिक खेलों का आग़ाज़

इन चुनौतियों के साथ उन्होंने लगातार जीवन भर संघर्ष किया. उनका कहना है कि वो इन मुसीबतों का सामना इसलिए कर पाई क्योंकि तीन बेटों वाले उनके परिवार में आपस में बहुत प्यार और एक-दूसरे का ख्याल रखने की भावना है.

वो बताती हैं, "मुझे पता चल गया था कि मेरे बच्चों को खेल-कूद में विशेष रुचि है. मुझे लगा कि मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं है कि मैं अपने बच्चों को वही करने दूं जो उन्हें पसंद है. जब मरियप्पन इनाम जीतता था तब मेरे पास इतना समय नहीं होता था कि मैं उसके पुरस्कार वितरण समारोह में जा सकूं. उस समय मैं दिहाड़ी मजदूरी करने में लगी रहती थी."

सरोजा कंस्ट्रक्शन साइट्स पर मजदूरी किया करती थीं. वो सुबह से शाम तक अपने परिवार का पेट पालने के लिए जी तोड़ मेहनत किया करती थीं.

वो कहती हैं, "अभी कुछ दिनों पहले ही एक समय ऐसा भी आया जब मैं गरीबी और समाज के ताने से परेशान होकर ख़ुदकुशी करने के बारे में सोचने लगी थी. मेरे बेटे ने कई प्रतियोगिताओं में जीत हासिल की थी और ढेर सारे मेडल भी घर ला चुका था लेकिन फिर भी समाज की ओर से खारिज किए जाने के रवैये से हम निराश थे. समाजिक हैसियत में अब भी हम नीचे थे. लेकिन हमने अपने अच्छे दिनों के आने का इंतज़ार किया."

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मरियप्पन जब ब्राज़ील जा रहा थे तब सरोजा ने उन्हें दस रुपये का नोट दिया था. उन्होंने यह नोट ऐसे ही किसी बड़े दिन के लिए बचा कर रखे थे.

जब मरियप्पन के रियो में जीतने की ख़बर आई तब पूरा थीवातिपत्ती गांव और आस-पास के गांव झूम उठे थे. पटाखे छोड़े जा रहे थे.

जब गांव में दूर-दूर से मीडिया वाले हाथ में माइक और कैमरे लिए आ रहे थे तब अजनबी लोग भी झूम-झूमकर जीत की खुशी मनाने में लगे हुए थे.

सरकार की ओर से भी अधिकारी फूल लेकर आए थे और मदद करने का वादा किया था.

सरोजा कहती हैं, "मेरी आंखों में सिर्फ़ आंसू थे. मैं बहुत समय तक संशय में रही कि कैसे ख़ुद को बयां करूं. मेरे बेटों की भी यही हालत थी."

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गेमिंग की मलिकाएं

जब मरियप्पन भारत लौटे तब उन्हें उपहार और अवार्ड देने का तांता लग गया था. तमिलनाडु की सरकार ने उन्हें दो करोड़ रुपये का पुरस्कार दिया है.

केंद्र सरकार ने 75 लाख रुपये देने की घोषणा की है और सचिन तेंदुलकर ने भी मरियप्पन को गिफ़्ट दिया है.

लेकिन सरोजा की ख़ुशी की सबसे बड़ी वजह कुछ और ही है. वो इस बात को लेकर ज्यादा ख़ुश है कि अब जब मरियप्पन कहीं बाहर जाएंगे तो वो उन्हें दस की नोट से ज्यादा दे पाएंगी.

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