बस्तर में आसान नहीं औरत होना

अमूमन संघर्ष वाले इलाक़ों में यूं तो आम लोग ही पिसते रहते हैं, मगर महिलाएं इसका ज़्यादा दंश झेलती हैं. पूर्वी और मध्य भारत के आदिवासी बहुल इलाक़ों में तो औरतें कई भूमिकाएं निभाती हैं.

यहां कई सालों से माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष चल रहा है जिसकी वजह से आम जनता का जीवन ख़ासा प्रभावित है.

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बस्तर का 'नो एंट्री ज़ोन'

इस इलाक़े की महिलाएँ आजीविका का इंतज़ाम भी करती हैं. बच्चों की देखभाल भी करती हैं. ये आदिवासी महिलाएं हर वो काम करती हैं जो आम तौर पर पुरूष ही करते हैं.

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मध्य भारत के छत्तीसगढ़ में माओवादी छापामारों और सुरक्षा बलों के बीच कई दशकों से संघर्ष चल रहा है.

इस संघर्ष ने यहाँ के रहने वाले आदिवासियों की ज़िंदगी को मुश्किल बना दिया है. आदिवासी महिलाओं की ज़िंदगी और भी संघर्ष वाली है.

बस्तर के जंगली इलाक़ों में मनोरंजन के साधन नहीं हैं. ना बिजली है. ना सड़क. और ना ही मोबाइल की 'कनेक्टिविटी'.

यहां न खेलकूद का कोई इंतज़ाम है और ना ही सिनेमा का.

इसलिए सभी के लिए साप्ताहिक हाट ही मनोरंजन का एकमात्र साधन हैं.

साप्ताहिक हाटों में आदिवासी महिलाएं जंगल के उत्पादों को लाकर बेचती हैं.

वो जंगल के अपने गांवों में 'महुआ' और चावल की शराब बनाती हैं. फिर वो इस शराब को हाट में लाकर बेचती हैं.

फिर इसे बेचकर जो पैसे मिलते हैं, उससे वो सप्ताह भर का इंतज़ाम कर घर ले जाती हैं. जैसे कपडे, नमक, चावल, तेल साबुन आदि.

संघर्ष के इलाक़ों में आदिवासी महिलाएं लकीर के दोनों तरफ मिल जाएंगी. चाहे वो माओवादी छापामार के रूप में हों या फिर सुरक्षा बलों में.

इस संघर्ष में भी हिंसा का शिकार सबसे ज़्यादा महिलाएं ही हैं

परिस्थितियों ने बस्तर की आदिवासी महिलाओं को पुरुषों की तुलना में ज़्यादा ज़िम्मेदार और हिम्मत रखने वाली के रूप में अपनी पहचान बनाने में भी मदद की है.

लेकिन पिछले कुछ वर्षों से आदिवासी महिलाएं भी वहां से पलायन कर रही हैं.

वो संघर्ष में पिस्ते रहने की बजाय अब अपने परिवार के साथ देश के दूसरे हिस्सों में पलायन कर रहीं हैं ताकि उनके बच्चे और परिवार के अन्य लोग कम से कम सुरक्षित रह सकें

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